प्यार का कैसा सलीक़ा सिखा गया कोई
प्यार का कैसा सलीक़ा सिखा गया कोइ
ढूँढनें जायें कहाँ मेरा दिल चुरा गया कोइ
अब कहीं चैन न मिलता है ना करार कोइ
कैसा ये रोग वो मुझको लगा गया कोइ
छुपाके रक्खा था बेदाग़ हमारा ये दिल
आज इस दिल का हि परदा उठा गया कोइ
जहाँ में तेरे सिवा और ना कोइ मेरा
बात लिखकरके हाथ में थमा गया कोइ
ये कंवारे थे मेरे हाथ खाली खाली से
अपनें हि नाम की मेंहदी रचा गया कोइ
मेरी बेताबी अब हद से भी गुज़र जायेगी
शहर इन्दौर का रंजन बता गया कोइ
आलोक रंजन इन्दौरी
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