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Showing posts from June, 2021

उसनें दिल में मुझे बसाया है

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दिल में उसने मुझे बसाया है जिसको अपनी ग़ज़ल सुनाया है दोस्त ही है मेरा कहां फिर भी फ़र्ज़ अपना नहीं निभाया है आप रिश्तों की बात करते हो मुझको तो हर कोई हमारा है देश दुनियां में कैसी हलचल है किसने हर सक्स को डराया है आप  मेरे  क़रीब आ  जाओ मैंने  हर   दर्द  आजमाया  है रास्ता कोई   भी कहां  देता मैंने   खुद रास्ता   बनाया है गम है किस बात का तुम्हें रंजन दर्द  का  गीत  गुनगुनाया  है आलोक रंजन इंदौरवी

ग़ज़ल बहुत खूबसूरत डगर हो गई

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बड़ी खूबसूरत डगर हो गई मेरे दिल पेउनकी नजर हो गई  मिले हो तो अब लग रहा है मुझे  हमारी मोहब्बत अमर हो गई   हवायें उदासी की चलने लगी  अरे जिंदगी क्यों जहर हो गई  न जाने कहां से हवा आ गई  समझ ही नहीं पाए कहर हो गई  मुहब्बत से देखा जो तुमने मुझे  मुहब्बत मेरी राहबर हो गई  मुझे इश्क का कुछ तजुर्बा नहीं  तेरी याद ही मुख्तसर हो गई इरादे मेरे नेक थे जानें क्यूं फिर ये मेरी दुआ बेअसर हो गई निरुपमा त्रिवेदी इन्दौर मप्र

अपने दिल की बात बताना अच्छा लगता है।

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अपने दिल की बात बताना अच्छा लगता है सपनों में एक ख्वाब सजाना अच्छा लगता है तेरे बारे में जब जब भी मैं लिखता हूं  धड़कन में यादों का आना अच्छा लगता है और नहीं कुछ तुझसे कुछ भी मैं चाहूंगा अपनें गम को और बढ़ाना अच्छा लगता है कैसे कैसे दिन गुजरे हैं तुम बिन भी तुम्हें हसाकर खुद  रो लेना अच्छा लगता है रंजन किसको अपना कहकर प्यार करूं तनहा अपनी धुन में रहना अच्छा लगता है आलोक रंजन इन्दौरवी

आशा की किरण

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आशा की किरण  एक किरण आशा की आई आज फिर बरषों के बाद। रश्मियां सज धज के आई आज फिर बरषों के बाद।। कनक आभूषण से मंडित  चंवर  अम्बर ने  सजाये। नयन  मूंदे  भोर  आई  आज  फिर  बरषों के बाद ।। पत्ते - पत्ते  खिल गये  दिनकर की  छवि में ढल गये। तितलियों की टोली आई  आज फिर बरषों के बाद।। गुङहल ने  ज्यों  अनुबंध  खोले  मस्त ले अंगङाइयां। सूरजमुखी भी मुसकुराई  आज फिर बरषों के बाद।। बादलों के दल सुसज्जित व्योम आच्छादित  कलश। प्रेम  रस  बरसाने  आई  आज  फिर बरषों के बाद।। चादर  लपेटे  चांदनी ज्यों आकाश की  दुल्हन बनी।  रात -रानी खिलखिलाई  आज फिर बरषों के बाद।।  जंगल में मंगल छा गया चूजों  की खुशियाँ  देखकर। चोंच  से  चुग्गा  खिलाई  आज  फिर बरषों के बाद।।  अठखेलियाँ  करती  पवन  सांसों  को  सांसे  दे गई। नूतन  नवल  संदेश  लाई  आज फिर बरषों के बाद।। ...

प्रेम स्पंदन

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एक  प्रेम श्रृंगार  गीत सुनें ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, तुम जब मुझसे मिलने आते खूब जमाना अच्छा था मीठी मीठी बात सुनाते खूब जमाना अच्छा था खट्टी मीठी तकरारें थीं  और मोहब्बत की बातें हम तुम दोनों भीग रहे थे याद आती है बरसातें  बचपन और जवानी का एहसास कभी ना हो पाया तेरे मेरे दिल में कुछ आभास कभी ना हो पाया हम तुमको जब घर पहुंचाते खूब जमाना अच्छा था जब तुम,,,,,,,, पुरवइया की मंद हवाओं का मौसम भी प्यारा था बाग में बैठे-बैठे तुमको कितनी देर निहारा  था जुल्फों के साए में तेरा चेहरा खूब सुहाना था अपनी बात सुनाने का वो तेरा एक बहाना था पीला दुपट्टा तुम लहराते खूब जमाना अच्छा था जब तुम ,,,,,,,,, रोज सुबह तुम छत पर  आकर मुझे बुलाया करते थे अपनी खुशबू से मुझको मदमस्त बनाया करते थे बात इशारों में होती थी कोई समझ नहीं पाता कुछ बातें कॉपी में लिख कर मैं तुमको  खुद दे जाता साथ-साथ विद्यालय जाते खूब जमाना अच्छा था जब तुम,,,,,,, आलोक रंजन इंदौरवी