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गीत

 एक अनूठी राग बनकर जिंदगी में छा गई मैं खुशी  से झूमता हूं गीत ऐसा गा गई मैं बहुत मजबूर था तन्हाइयों के साथ में वक्त का था मैं सताया कुछ नहीं था हाथ में रात दिन सुनसान राहों पर सफर करता रहा बेगुनाही की सजा पर आह भी भरता रहा एक खुशबू की तरह वह मुझको भी महका  गई मैं खुशी में,,,,,, जिंदगी के रूप कितने जान पाया भी नहीं कोई सिर पर हाथ रख कर के बताया भी नहीं मैं अकेला ही लड़ा लहरों की लंबी जंग को हाथ मेरा पकड़ने को कोई आया भी नहीं एक जिज्ञासा हमारे भाग्य को चमका गई मैं खुशी में,,,,, सत्य संकल्पों का दीपक हाथ में मेरे रहा दृढ़ प्रतिज्ञा का पिटारा साथ में मेरे रहा मंजिलों तक पहुंचने का ही जुनून छाया रहा कर्म पथ का आकलन भी पास में मेरे रहा मेरी किस्मत मेंहनतों के रंग से नहला गई मैं खुशी में,,,,, आलोक रंजन इंदौरी

वक्त का सिलसिला गीत

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दीप जलता रहा रोशनी के लिए पर हवाएं बुझाने की कोशिश में थी वक्त का सिलसिला यूं ही चलता रहा आंधियां घर जलाने की कोशिश मे थी वक्त का सिलसिला,,, मैं अकेला कदम साध कर चल दिया मंजिलों की तरफ मेरा संकल्प था राह में कितनी ठोकर मिली गम नही इतना कमजोर मेरा भी वो तप न था तेज काली घटाएं घिरी थी बहुत वो तो मुझ को डराने की कोशिश में थी वक्त का सिलसिला,,,, आजमाइश मेरी एक चाहत रही मेरे दिल में बसी उसकी तस्वीर है मेरे ख्वाबों की रानी मेरी दिल्लगी बस वही मेरे सपनों की जागीर है इश्क में जो कदम मेरे बढ़ते रहे वो भी दिल से लगाने की कोशिश में थी वक्त का सिलसिला,,, मुझको मेरी मुकद्दर ने धोखा दिया हार मानी न मैंने कभी राह में बनके खुशबू मुझे ऐसे वो मिल गई एक दिन आ गई थी मेरी बांह में मैं महकता रहा और हंसता रहा सारी दुनिया रुलाने की कोशिश में थी वक्त का सिलसिला,,, आलोक रंजन इंदौरी