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Showing posts from July, 2020

वो मुलाकात हम न भूलेंगे

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गज़ल नुरानी ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,  वो मुलाकात हम न भूलेंगे जिससे चेहरे पे ये रवानी है उनका गम हमको रूला देता है चाहतों की ये मेहरबानी है वो मुलाकात,,,,,,,, जख्म कोइ मिले मगर अब तो हमनें इंशानियत की ठानी है वो मुलाकात,,,,,,,, वो बहक जाते हैं नशे की तरह आदतें उनकी खानदानी है वो मुलातात,,,,, देर तक कब खुशी संभलती है इसकी सेहत तो आनी जानी है वो मुलाकात,,,,,, दुश्मनों तुमको मुबारक महफिल ये मेरी तुमपे मेहरबानी है वो मुलाकात,,,, बाद मरने के कौन मरता है जिंदगी की यही कहानी है वो मुलाकात,,,,,,, इश्क करके हुआ न कौन तबाह आशिकों नें ये बात मानी है वो मुलाकात,,,,,,, नज्म पढ़कर न जो संभलते हैं नज्म के साथ बेइमानी है वो मुलातात,,,,, जिंदगी हम भी जीते हैं आलोक देख लो चेहरा ये नुरानी है वो मुलाकात,,,,,,,, आलोक रंजन शास्त्री इन्दौर 9425069983

वफा तुम्हारी हमारे दिल में

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मेरा चांद 5 वफा तुम्हारी हमारे दिल में चराग बनकर यूं जल रही है तुम्हारी आंखों में मैने देखा हमारी चाहत मचल रही है वफा,,,,,,, चलो जलायें दिये खुशी के ये प्यार अब तो बसा रबों में जनम जनम की ये आस अपनी दिलों में कबसे बहल रही है वफा तुम्हारी,,,,,,, तुम्हारे नाजुक से होठ प्यारे ये प्रेम अमृत टपक रहे हैं तुम्हारी जुल्फों की हर अदायें इधर उधर से बदल रही है वफा तुम्हारी,,,,,,,, कदम तेरे घुंघरू के स्वरों से हृदय पटल को संदेश देते तुम्हारे आनें की एक झलक से हमारी नजरें अचल रही है वफा  तुम्हारी,,,,,,,, बदन तुम्हारा है चांद जैसा तू चांदनी बनके आ गइ हो मृगानयन  दूर अब जाना ये दूरियां कबसे खल रही है वफा तुम्हारी, ,,,,,,,,,, तू मेरी राधा मै तेरा मोहन ये, प्यार अपना बहुत है पावन तेरे लिये कबसे मेरी बंशी हृदयके उपवन में बज रही है वफा तुम्हारी,,,,,,,,, आलोक रंजन शास्त्री इन्दौर 9425069983

चांद जरा तुम आकर देखो

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चांद से प्रार्थना  ,,,,,,,,,,, ,,,,,,,,,,,,  चांद जरा तुम आकर देखो ब्यथा धरा की कैसी है अमृत कितना बरसाते हो फिर भी प्यासी बैठी है भूख निरंतर बढ़ती जाती प्यासी तृष्णा गला सुखाती दुर्लभ होता जाता जीवन मानव ढूंढ़ रहा है स्वाती प्रकृति भरी है संसाधन से फिर अतृप्त क्यो रहती है अमृत कितना,,,,,,,,,,,,,, औषधियां निर्मूल हो रही कैसी हमसे भूल हो रही जीवन के स्थितियां कैसे जीवन के प्रतिकूल हो रही प्राण  वायु क्यो बाधित होकर मंद गती से बहती है । अमृत कितना,,,,,,,,,,,,, नग्न मृत्यु खेलती घूमती नाच रही मदहोश यहां इंशानों का बुरा हाल है तड़प रहे हैं यहां वहां बरसा दो जीवन रस अब तो चीखें आज निकलती है अमृत कितना,,,,,,, आलोकजी शास्त्री इन्दौर 9425069983

घिर गइ दुनियां, मुसीबत जाल में

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लाचारी ,,,,,,,,,,,,,  घिर गइ दुनियां मुसीबत  जाल में सबकी बुद्धी फेल है इस हाल में इटली और स्पेन अमेरिका फ्रांस और लंदन भी चीखा सबकी यही पुकार पड़ी है कोरोना बन मौत खड़ी है दो हजार उन्नीस सदी इस साल में सबकी बुद्धी,,,,,,,, बड़े बड़े वैग्यानिक हारे औषधियों के पड़ गये लाले कोइ नही उपचार है हर मानव लाचार है समा रहे है सभी काल के गाल में सबकी बुद्धी,,,,,,,,, घर में कैद सभी हैं अपने मिलना जुलना हो गये सपने वेबस जीवन काट रहे हैं फोन पे दुखड़ा बांट रहे हैं रक्षा करो,प्रभू आकर जंजाल में सबकी बुद्धी,,,,,,,,, आलोकजी शास्त्री इन्दौर 9425069983

मेरे चांद

मेरे चांद २ ,,,,,,,,,,,,,,,,,,, निर्जन वन सा मेरा जीवन इसको आज सजा जाना खाली है दिल का सिंहासन प्रियतम मेरे आ जाना मधुर गीत मधुरस मधु ब्यंजन तेरे सम्मुख रख दूंगा मै तो बस होठों का अमृत थोड़ा थोड़ा चख लूंगा मै मधुमास बनूं कबतक इतना सा बतला जाना खाली है,,,,,,,,,,,,, नैनो की डोली में बैठी रहना सुबहो शाम प्रिये अपनी प्यारी सी चितवन से देते रहना जाम प्रिये प्रेमामृत की हल्की हल्की बूदें कुछ टपका जाना खाली है,,,,,,,,, जैसे चांद चादनी के संग और चमकता जाता है जैसे भवरा फूलों के संग मधुर पराग सजाता है मेरे जीवन के उपवन में अपना फूल खिला जाना खाली है,,,,,,,,,,,, प्रेम तपस्या साथ करेगे मिलकर बाग संवारेगे जीवन की नइया को मिलकर संग मे पार लगायेगे अमिट प्रेम की गौरव गाथा दुनिया को दिखला जाना खाली है,,,,,,,,, आलोकजी शास्त्री इन्दौर 9425069983

मेरे प्रियतम आ जाना खाली है दिल का सिंहासन

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मेरे चांद २ ,,,,,,,,,,,,,,,,,,, निर्जन वन सा मेरा जीवन इसको आज सजा जाना खाली है दिल का सिंहासन प्रियतम मेरे आ जाना मधुर गीत मधुरस मधु ब्यंजन तेरे सम्मुख रख दूंगा मै तो बस होठों का अमृत थोड़ा थोड़ा चख लूंगा मै मधुमास बनूं कबतक इतना सा बतला जाना खाली है,,,,,,,,,,,,, नैनो की डोली में बैठी रहना सुबहो शाम प्रिये अपनी प्यारी सी चितवन से देते रहना जाम प्रिये प्रेमामृत की हल्की हल्की बूदें कुछ टपका जाना खाली है,,,,,,,,, जैसे चांद चादनी के संग और चमकता जाता है जैसे भवरा फूलों के संग मधुर पराग सजाता है मेरे जीवन के उपवन में अपना फूल खिला जाना खाली है,,,,,,,,,,,, प्रेम तपस्या साथ करेगे मिलकर बाग संवारेगे जीवन की नइया को मिलकर संग मे पार लगायेगे अमिट प्रेम की गौरव गाथा दुनिया को दिखला जाना खाली है,,,,,,,,, आलोकजी शास्त्री इन्दौर 9425069983

नज़रें गज़ल हम अपनी राह मुकम्मल मुकाम करते हैं

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नज़रे गज़ल ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,  हम अपनी राह मुकम्मल मकाम करते हैं नजर  के सामने बातें तमाम करते हैं वफा की राह में बदनामियां भी मिलती हैं कदम कदम पे हम उनको निशान करते हैं शहर में कौन है जो दर्द की दवा दे दे हम उनके वास्ते नीदें हराम करते हैं कहानियां हैं बहुत खाश दिल जले कहते हर एक दिल को मुहब्बत के नाम करते हैं उदास चेहरे की पढ़करके खामोशी अब तो खुशी की चादरों का इंतजाम करते हैं वजा ना पूछो मेरे मेरे दिल की तंगहाली का सुबह कहीं तो कहीं अपनी शाम करते हैं वो हमसे रूठें हैं उनको मनाने की तरकीब हम अपनी जिंदगी अब उनके नाम करते हैं ग़जल की नज्र उन्हें आज मुबारक कहना कोइ आलोक तुम्हें एहतराम करते हैं आलोक रंजन शास्त्री इन्दौर 9425069983

सप्तम भाव और वैवाहिक जीवन

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सप्तम भाव और वैवाहिक जीवन,,,,,,  कई बार दाम्पत्य जीवन आर्थिक दृष्टिकोण की वजह से, अन्य संबंधों के चलते भी टूट जाता है। शंका भी दाम्पत्य जीवन में दरार का कारण बनती है। कभी-कभी पारिवारिक तालमेल का अभाव भी एक कारण बनता है। इन सबके लिए सप्तम भाव, लग्न, चतुर्थ, पंचम भाव के साथ-साथ शुक्र-शनि-मंगल का संबंध भी महत्वपूर्ण माना गया है। चतुर्थ भाव में यदि शनि सिंह राशि का हो या मंगल की मेष या वृश्चिक राशि का हो या राहु के साथ हो तो पारिवारिक जीवन कलहपूर्ण रहता है।  शनि-मंगल का दृष्टी संबंध हो या युति हो तो भी पारिवारिक जीवन नष्ट होता है। कोई भी नीच का ग्रह हो तब भी पारिवारिक कलह का कारण बनता है। यदि ऐसी स्थिति हो तो उस ग्रह से संबंधित वस्तु को जमीन में गाड़ देवें। लग्न का स्वामी नीच का हो या लग्न में कोई नीच ग्रह हो तो वह जातक को बुरी प्रवृति का बना देता है।  आलोकजी शास्त्री इन्दौर 9425069983

कुंडली से जानें भूत प्रेत का साया और अवसाद की स्थिति

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चंद्रमा लग्न, लग्नेश अष्टमेश पर पाप प्रभाव इन ग्रहों की पाप ग्रहों के साथ युति अथवा कुंडली में कहीं कहीं पर चंद्र की राहु-केतु के साथ युति यह दर्शाती है कि जातक पर भूत-प्रेत का प्रकोप हो सकता है।  चंद्र केतु की युति यदि लग्न में हो तथा पंचमेश और नवमेश भी राहु के साथ सप्तम भाव में है तो यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि जातक ऊपरी हवा इत्यादि से ग्रस्त होगा। फलतः उसके शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, स्वास्थ्य तथा आयु पर निश्चित रूप से प्रभाव पड़ेगा। ऐसे में प्रायः लोग मानसिक अवसाद से ग्रस्त रहते हैं। उन्हें नींद भी ठीक से नहीं आती है। एक अनजाना भय प्रति क्षण सताता रहता है। ऊपरी हवा या प्रेत बाधा भी अकारण नहीं होती। वस्तुतः ये आंतरिक और बाहय कारण जीवन में अनेक रूपों में व्यक्त होते हैं और समुचित जयोतिषीय योगों द्वारा व्यक्ति के प्रेत बाधा से ग्रस्त होने के बारे में जाना जा सकता है। आलोकजी शास्त्री इन्दौर 9425069983 

चांद अब इंतजार तेरा है

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मेरा चांद ,,,,,,,,,,,,,,,, चांद अब इंतजार तेरा है मुझको लगता है अब तु मेरा है रात जश्नें बहार लगती है मुझको किस रोशनी ने घेरा है चांद,,,,,,,,, दिल को बहलानें की वजह तुम हो इश्क का ये नया सबेरा है चांद,,,,,, हमनें तनहाइयों को देखा है दिल में ये कौन राग छेड़ा है चांद,,,,,,,, सब्जबागी नही हकीकत है मैनें इस आग में भी खेला है चांद,,,,,,, वक्त का तजुर्बा बताता है हर तरफ मतलबी बसेरा है चांद ,,,,,, हम भी नादान हैं कि समझे नही कौन दिल का मेरे लुटेरा है चांद अब,,,,,,, आलोक रंजन शास्त्री इन्दौर 9425069983

गजल

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इश्क आंसा नहीं ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,  ,,,,,,, प्यार करना कोइ खेल जैसा नही बात आंखों से दिल में उतर जायेगी ढूंढ लेता है ये जिंदगी की डगर और फिर जिंदगी भी संवर जायेगी प्यार करना,,,,,,,, ख्वाब कितने सजाये थे हमने यहां अब तलक उनकी मंजिल मिली हि नही इश्क के मामले कुछ पेंचीदे से हैं जान जाओ तो आंखें भी भर आयेगी प्यार करना,,,,,,, ओ वहां अपनी मस्ती में मशगूल हैं हम जियें  तो जियें कैसे बतलाइये हर सुबह बात खत की करूं आजकल कब तलक मेरी जानें गज़ल आयेगी प्यार करना,,,,,,, दर्द दिल का कहूं या कहूं फासले बात इतनी सी है उनको दिल दे दिया राज दिल में छुपाये फिरूं हर घड़ी क्या पता मेरी मंजिल किधर जायेगी प्यार करना,,,,,,,, आंख में अश्क लेकर कोइ कह रहा प्यार में गम जुदाइ का ओ सह रहा देखकर हमको उसने लगाया गले सोचकर गम की दुनियां बदल जायेगी प्यार करना,,,,,, कोइ आलोक दिल की दवा दीजिये प्यार का कोइ कुछ तजरबा दीजिये हम भी नादानियां करके देखेगे अब मेरे दिल में भी दर्दे जिगर आयेगी प्यार करना,,,,,, आलोक रंजन शास्त्री इन्दौर 9425069983

प्यारा भारत देश हमारा

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भारत प्यारा ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,  प्यारा भारत देश हमारा हिम गिरि मुकुट शान है इसकी स्वर्ग धरा सा न्यारा प्याराभारत,,,,,, पावन मिट्टी गंगा जल सा देवभूमि कण कण  है अविरल सिंचित नदियां करती भक्ति भाव अविचल है महिमा मंडित जग ने माना सारा प्यारा भारत देश,,,,,,,,, संस्कृति मधुर गीत है गाती विश्व विजय सी इसकी थाती दीप जलाकर हम करते हैं ये प्राणों से प्यारा प्यारा भारत,,,,,,, इसकी मर्यादा में हम अपना सर्वस्व लुटा देते है़ हम भारत वासी जन जन में देशकी भक्ति जगा देते हैं बलिदानों का तारा प्यारा भारत देश हमारा आलोक त्रिपाठी इन्दौर 9425069983

गज़ल

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गज़ल, ,,,,, तुम मिले नजरें, मिली मेरी तपस्या है सफल कुछ भी लिखता हूं मगर अब बन हि जाती है गज़ल।। तुम मिले,,,,,,  कर दिया था इस जहां ने मुझको अपनों से खफा दोस्ती के सिलसिले ने कर दिया राहें सरल ।। तुम मिले,,,,,,,  भावनायें हम भी रखते हैं मुहब्बत के लिये भावना में बह गया हूं क्या कहूं मै आजकल।। तुम मिले,,,,,,,  चलिये कुछ गम बांटने का सिलसिला कर दें शुरू क्यों करें हम दूसरों के काम में ऐसे दखल।। तुम मिले,,,,,,,,,,  आंख के ये अश्क भी कुछ बोलते हैं सुन भी लो आपकी नजरें इनायत हो तो हम जायें संभल भ।। तुम मिले,,,,,,,,,,  शहर में दुश्वारियों का दौर है घर में रहें। मुशकिलों से चल रहा है कुछ गरीबों का बसर।। तुम मिले,,,,,,,,,,  आइनें में देखकर आलोक चेहरे की खनक हम कदम आगे बढाते ये मुहब्बत का असर।। तुम, मिले,,,,,,,,,,,  आलोक रंजन शास्त्री इन्दौर 9425069983

सच्चे गीत मेरे

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सच्चे गीत ,,,,,,,,,,,,,,,,, जीवन में सबकुछ मिल जाये पर जीवन का सार कहां है। सामाजिक उत्थान बहुत है पर लोगों में प्यार कहां है ।। संचित यौवन बिखर रहा है यहां अनैतिक रूपों में सदाचार अपनापन खोया मीठा सा ब्यवहार कहां है बंधक से हैं रीत रिवाजें रिस्ते भय में पलते हैं। अपनें भी अपने नहि लगते रिस्तों का आधार कहां है।। स्वैच्छाचार फैलता जाता शहरों की हर गलियों में। मनमानी करते रहते हैं प्रतिबंधों की ढार कहां हैं।। भ्रम में जीने लगी पीढि़यां सस्ती उन्नति को पाकर । अपनी जड़ से उखड़ रहे हैं अनुचित उचित विचार कहां है।। आलोक शास्त्री इन्दौर 9425069983

नज्म जि़ंदा है मेरी सायरी एक कल्पना

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नज्म जिंदा है ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,  जो हैं, मशहूर अपनी अदा के लिये बन गये ओ हमारे सदा के लिये बात इतनी सी थी राह में मिल गये कुछ सिकायत थी उनकी हमारे लिये बात खुलती गइ नजरें मिलती गइ दिल की धड़कन बढ़ी कुछ खता के लिये ओ जो मशहूर ,,,,, नज्म की रोशनी में नहाकर मिले हमको देखा तो नज्में सुनाने लगे इश्क का गौर परदे के पीछे छुपा हम भी सर को हिलाये सजा के लिये ओ जो मशहूर,,,,,,,, खामियां कुछ न थी उनमें क्या मै कहूं आबरू का भरम सोचकर कह दिये हमने होठों पे अहले करम पढ़ रहे हम भी खामोश थे इस रजा़ के लिये ओ जो मशहूर,,,,,,,, हुस्न जुल्फेंं बिखेरे खड़ी सामने धड़कनें हो गइ तेज ये देखकर नज्म काी नायिकाआज है सामने अब तलक खुश हैं हम इस वजा के लिये आलोकजी शास्त्री इन्दौर 9425069983

पथिक एक अन्तर यात्रा जो मानव को परम तत्व तक पहुचा देती है

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पथिक ,,,,,,,,,,,  पथ कोइ चुन लो जीवन में अपने सुख की खातिर नौका लेकर वही पहुचती देर सबेर तो पहुचोगे मन में धैर्य धारणा का कुछ ऐसा परिणाम होगा जन्मों की यात्रा का सत्पथ पर चलकर हि विश्राम होगा पथिक सोच में मत पड़ना मंजिल दूर दिखाइ देती है गहरी खाइ टूटे रस्ते सांय सांय आवाजें तुझे डरायेगी पर साहस खोना नही तुम्हारा काम बाधायें तो स्वयं तुम्हें समझायेगी तुम परम ध्वेय लेकर आये हो अद्भुत क्षमता है तुममें यही उपासना की पद्धति तुझे उस परम तक पहुंचायेगी राही पहुच सकोगे उस तक जो तेरा पोषक है वर्तमान में जो कुछ तुम ये देख रहे हो ये केवल शोषक है ये तो केवल शोषक है आलोकजी शास्त्री इन्दौर 9425069983

प्रिये एक कविता जो केवल मेरी कल्पना है

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प्रिये ,,,,,,,,  प्रिये जरा मद तो छलका दो मद का प्यासा मुझे बुझा दो तृष्णा की बढ़ती सांसों में प्रेम मधुर रस को टपका दो नैनों में भरकर सुरभित कण मुझको अब सुगंध लौटा दो बरबस हि  में आ जाता हू नैनों में  विश्राम  करा दो प्रिय,,,,  खुशियों से है ब्याप्त हृदय में संचित यौवन की किलकारी मुग्ध प्रफुल्लित होकर मैनें तेरी कबसे बाट निहारी तन मन के सौहार्दं पलों का हल्का सा एहसास करा दो प्रिये,,,,,,,,, सावन की हरियाली जैसी पावन मधुर प्रेम बगिया है प्रेम तृषा की अद्भुतबेला संगम का सौपान बना दो प्रिये,,,,,,, लघु कदमों से पायल बाजे तेरी आहट मिल जाती है मधुर मिलन की सोच मेरे इस पटल में खिल जाती है स्पर्शों से झंकित करती कोइ ऐसी तान सुना दो प्रिये,,,,,,,, तुम धरती बनकर बिछ जाना अम्बर मुझको मिलजायेगा तेरा यही समर्पण मेरे अंतस्तल में सिल जायेगा मैं हू प्रेमपुजारी मुझको प्रीत जगत में तुम चमका दो प्रिये ,,,,,  आलोक रंजन इन्दौर मप्र

वृषभ राशि गुण और स्वभाव जानें अपनी राशि कुंडली में

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बृषभ राशि वालों के गुण और स्वभाव वृष राशि वाले जातकों में सहनशीलता बहुत अधिक होती है। ये अपने कार्यों को शिथिलतापूर्वक पूर्ण करते हैं। वृष राशि वाले जातक आरामतलब व थोड़े आलसी किस्म के होते हैं। इनकी राशि का स्वामी शुक्र होने के कारण इस राशि वाले जातक दिखने में बहुत आकर्षक व सुंदर होते हैं। इनका स्वभाव सौम्य होता है किन्तु यदि इन्हें अत्यधिक प्रताड़ित किया जाए तो ये बहुत आक्रामक हो जाते हैं।    वृष राशि वाले जातक थोड़े रूढ़िवादी विचारों वाले होते हैं। ये वैभव-विलासिता वाला जीवन जीना पसन्द करते हैं। इन्हें फैशन अधिक प्रभावित करता है। इन्हें फिल्में, गीत-संगीत एवं नृत्य इत्यादि में विशेष रूचि होती है। वृष राशि वाले जातक भोग-विलास में बहुत रूचि लेते हैं। इनका स्वभाव कामुक होता है।    यदि शुक्र पर क्रूर ग्रहों का प्रभाव हो तो वृष राशि वाले जातकों को व्यभिचारी बनते देर नहीं लगती। प्राय: इनके प्रेम संबंध सफल होते हैं। ये अत्यधिक धनार्जन करना पसंद करते हैं। आकर्षक भवनों व महंगी गाड़ियों में घूमना-फिरना इन्हें पसन्द होता है।

जानिये किस उम्र में शनी लाभदायक होता है आपके लिये

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जानिये किस उम्र में शनी लाभदायक होता है आपके जीवन में ,,,,,,,,,,, शनि सूर्य का पुत्र है। इसकी माता छाया एवं मित्र राहु-बुध हैं। शनि के दोष को राहु और बुध दूर करते हैं। शनि दंडाधिकारी भी है। यही कारण है कि यह साढ़ेसाती के विभिन्न चरणों में व्यक्ति को उसके कर्मों के अनुसार फल देकर उसकी उन्नति व समृद्धि प्रदान करते हैं। किसान, मजदूर एवं न्याय विभाग पर भी शनि का विशेष असर रहता है। जब गोचर में शनि बलवान होता है तो इससे संबंधित लोग उन्नति करते हैं। शनि कुंडली के भाव 3, 6,10, या 11 में शुभ प्रभाव प्रदान करता है। प्रथम, द्वितीय, पंचम या सप्तम भाव में हो तो अशुभ होता है। चतुर्थ, अष्टम या द्वादश भाव में होने पर ज्यादा अशुभ होता है। यदि व्यक्ति का जन्म शुक्ल पक्ष की रात में हुआ हो और उस समय शनि वक्री हो तो शनिभाव बलवान होने के कारण शुभ फल प्रदान करता है। शनि सूर्य के साथ 15 अंश से कम रहने पर अधिक बलवान होता है। व्यक्ति की 36 एवं 42 वर्ष की उम्र में शनि अति बलवान होकर शुभ फल प्रदान करता है। इस अवधि में शनि की महादशा एवं अंतर्दशा लाभदायक होती है।

दान की वास्तविकता जानें

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*सामान्यतया आदमी दान का मतलब किसी को धन देने से लगा लेता है। धन के अभाव में भी आप दान कर सकते हैं। तन और मन से किया गया दान भी उससे कम श्रेष्ठ नहीं।*     *किसी भूखे को भोजन, किसी प्यासे को पानी, गिरते हुए को संभाल लेना, किसी रोते बच्चे को गोद में उठा लेना, किसी अनपढ़ को इस योग्य बना देना कि वह स्वयं हिसाब किताब कर सके।  यह भी किसी दान से कम नहीं है।*     *हम किसी को उत्साहित कर दें, आत्मनिर्भर बना दें या साहसी बना दें, यही भी दान है। अगर आप किसी को गिफ्ट का ना दे पायें तो मुस्कान का दान दें, आभार भी काफी है। किसी के भ्रम-भय का निवारण करना और उसके आत्म-उत्थान में सहयोग करना भी दान है।*    *जो इंसान अच्छे स्वास्थ्य का आनंद लेता है, वही सबसे बड़ा अमीर है।*                                           

जानिये कुंडली से किस महादशा का क्या फल मिलता है

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भावानुसार फल - *  लग्नेश की महादशा - स्वास्थ्य अच्छा, धन-प्रतिष्ठा में वृद्धि *  धनेश की महादशा - अर्थ लाभ मगर शरीर कष्ट, स्त्री (पत्नी) को कष्ट *  तृतीयेश की महादशा - भाइयों के लिए परेशानी, लड़ाई-झगड़ा *  चतुर्थेश की महादशा - घर, वाहन सुख, प्रेम-स्नेह में वृद्धि *  पंचमेश की महादशा - धनलाभ, मान-प्रतिष्ठा देने वाली, संतान सुख, माता को कष्ट *  षष्ठेश की महादशा - रोग, शत्रु, भय, अपमान, संताप *  सप्तमेश की महादशा - जीवनसाथी को स्वास्थ्‍य कष्ट, चिंताकारक *  अष्टमेश की महादशा - कष्ट, हानि, मृत्यु भय *  नवमेश की महादशा - भाग्योदय, तीर्थयात्रा, प्रवास, माता को कष्ट *  दशमेश की महादशा - राज्य से लाभ, पद-प्रतिष्ठा प्राप्ति, धनागम, प्रभाव वृ‍द्धि, पिता को लाभ *  लाभेश की महादशा - धनलाभ, पुत्र प्राप्ति, यश में वृद्धि, पिता को कष्ट *  व्ययेश की महादशा - धनहानि, अपमान, पराजय, देह कष्ट, शत्रु पीड़ा

कुछ लोग

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कुछ लोग ,,,,,,,,,,,,,, अपने सुख की खातिर वो ऐसा माहौल बना देते हैं देकर दर्द किसी को भी अपनी खुशियों को हवा देते हैं मिलती हैं बद्दुवा किसी की फिर भी हंसते रहते है लूट पाट से  सारा जीवन सिंचित करते रहते हैं मुझसे कौन भिड़ेगा कहकर अपना मन समझा लेते हैं अपने सुख,,,,,,,,,,,, अभिलाषायें बढ़ती जाती क्रूर कर्म के जालों से अगड़ित शत्रु बनाकर रखते घिरकर अपनें कालों से मर्यादायें भूलकर सारी अपनी राह बना लेते है अपने सुख,,,,,,,,,,,,, रंजिश की तलवारें उनके हाथ खड़कती रहती है उनके डर से आजादी दूजों की मरती रहती है औरों की तो क्या अपनें लोगों को भी तड़पा देते ह अपने सुख,,,,,,,,,, मानव बनकर मानवता का गला घोटते रहते हैं हड़प दूसरों के हिस्से पर फूले फूले रहते हैं जीवन को क्या समझें वो खुद अपनी मौत बुला लेते हैं अपने सुख,,,,,,, आलोकजी शास्त्री इन्दौर 9425069983

राधा कृष्ण रास बंशी की धुन

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गीत ,,,,,,, होठ पर छेड़कर बांसुरी की ये धुन कृष्ण सब गोपियों को बुलाने लगे हो गइ बेसुधी ब्रज की सब नारियां चैन दिल का कन्हैया चुराने लगे होठपर,,,,,  गोपियां सोचती क्या करूं ना करूं मन कहां जा रहा कैसे काबू करूं दिल की धड़कन बढ़ी सांस थमने लगी प्यारे मोहन खयालों, में आनें लगे होठ पर,,,,  चल पड़े हैं कदम धुन की आवाज सुन आज यमुना भी खोयी हुइ कृष्ण में रास की रागिनी बज रही है मधुर देेवता देखकर मुस्कराने लगे होठ पर,,,,,, चांदनी रात है चन्द्रमा है धवल खिल रहे चांदनी में हजारों कमल कुछ समझ ना सकी भोली ब्रज की लली अंग बाहों में लेकर घुमाने लगे होठपर,,,,,,,, दिब्य है प्रेम अद्भुत छंटा क्या कहूं भक्ति खुद प्रेम का रूप धर आइ है प्रेयसी बनके  परमात्मा के लिये अपना सब कुछ उन्ही पर लुटाने लगे होठ पर,,,,,,,,, मेरे मोहन मेरे प्राण प्यारे सजन कहके सब गोपियां हो गइ हैं, मगन आज जन्मों की अभिलाष पूरी हुई प्रेम चरणों में सिर को झुकाने लगे होठ पर,,,,, आलोक त्रिपाठी इन्दौर मप्र

गीत कृष्ण गोपी मिलन रास प्रसंग

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निर्गुण गीत  ,,,,,,,,,,,,, मुहब्बत हम भी करते हैं वफा के सामने रोकर संभल जाते हैं मिल जाये अगर राहों, में कुछ ठोकर जो गम को गर्दिशें समझे उन्हें मंजिल कहां, मिलती मुझे सब कुछ मिला देखो मेरा सब कुछ यहां खोकर सहारे ओ हमें देंगे गलत फहमी ये मत पालो करो कर्मों की खेती को जियो बेफिक्र सा होकर ये दुनियां रंग बिरंगी है सभी चेहरे नकाबों में मतलबी लोग मिलते हैं यहां देखो नहा धोकर मुहब्बत हम भी,,,,,,,,,, आलोकजी शास्त्री इन्दौर 9425069983

मुहब्बत हम भी करते, हैं

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निर्गुण गीत  ,,,,,,,,,,,,, मुहब्बत हम भी करते हैं वफा के सामने रोकर संभल जाते हैं मिल जाये अगर राहों, में कुछ ठोकर जो गम को गर्दिशें समझे उन्हें मंजिल कहां, मिलती मुझे सब कुछ मिला देखो मेरा सब कुछ यहां खोकर सहारे ओ हमें देंगे गलत फहमी ये मत पालो करो कर्मों की खेती को जियो बेफिक्र सा होकर ये दुनियां रंग बिरंगी है सभी चेहरे नकाबों में मतलबी लोग मिलते हैं यहां देखो नहा धोकर मुहब्बत हम भी,,,,,,,,,, आलोकजी शास्त्री इन्दौर 9425069983

कुंडली में राजयोग कारक ग्रहों की स्थिति जानें

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कुडंली में राजयोग के कारक ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,  1-    जब तीन या तीन से अधिक ग्रह अपनी उच्च राशि या स्वराशि में होते हुए केन्द्र में स्थित हों। 2-    जब कोई ग्रह नीच राशि में स्थित होकर वक्री और शुभ स्थान में स्थित हो। 3-    तीन या चार ग्रहों को दिग्बल प्राप्त हो। 4-    चन्द्र केन्द्र में स्थित हो और गुरु की उस पर दृष्टि हो। 5-    नवमेश व दशमेश का राशि परिवर्तन हो। 6-    नवमेश नवम में व दशमेश दशम में हो। 7-    नवमेश व दशमेश नवम में या दशम में हो।

धनवान बनने का योग आपकी कुंडली में जानें

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धनवान बनने के कई लक्षण आपकी कुण्डली मे होते हैं जो कुण्डली देखने से पता चलता है दस प्रकार के राजयोग जो आपको अप्राप्य की भी प्राप्ती करा देते हैं जानने के लिए कुंडली परामर्श करायें पं आलोक त्रिपाठी ज्योतिष एवं वास्तु विशेषज्ञ

मेष लग्न और जातक का स्वभाव जानें

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ज्योतिष कुंडली में मेष लग्न के जातक और स्वभाव ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, मेष लग्न चर लग्न है और अग्नितत्व भी है इसलिए आप सदा जल्दबाजी में रहते हैं और निर्णय लेने में एक पल नहीं लगाते हैं जबकि आपको एक बार दूरगामी परिणामो पर ही एक नजर डालनी चाहिए. मेष लग्न होने से आप आदेश सुनना कतई पसंद नहीं करते हैं और अपनी मनमानी ही चलाते हैं लेकिन आप बात सभी की सुनेगे लेकिन करेगें वही जो आपके मन में होता है. आपको किसी के दबाव में रहना नही भाता है और स्वतंत्र रुप से रहना पसंद करते हैं. अपनी स्वतंत्रता के साथ किसी तरह का कोई समझौता आप नहीं करते हैं. आपको अति शीघ्र ही क्रोध भी आता है और आप एकदम से आक्रामक हो जाते हैं. यहाँ तक की मरने - मारने तक पर आप उतारू हो जाते हैं लेकिन आपके भीतर दया की भावना भी मौजूद रहती है. आप दृढ़ निश्चयी होते हैं, आप व्यवहार कुशल भी होते हैं. आप जो भी बात कहते हैं उसे बिना किसी लाग लपेट के स्पष्ट शब्दों में कह डालते हैं. चाहे किसी को अच्छा लगे या बुरा लगे. इससे कई बार आपको लोग अव्यवहारिक भी समझते हैं. आप बहुत जिद्दी होते...

सावन सूना लागे

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सावन सूना ,,,,,,,,,,,, कैसा सावन कैसा झूला कैसा कजली गीत रे रिमझिम की बरसातें कैसी कैसा मधुबन प्रीत रे सावन के झूले सूनें हैं सूनी माधवन की बगिया गोपिन के पनघट स्तनों हैं सूना है संगीत रे रिमझिम ,,,,,,,,, मेले की रंगरेली सूनी मौसम की रंगत सूनी बारातों की चहक सूनी गलियां सूनी सूनी हैं मन का गुंजन सूना सूनी है संगीत रे ,,,,,,,, रिमझिम ,,,,,, होटल की रौनक सूनी सूने सब चौराहे हैं चाचा की चट्टी सूनी है सूनी सभी निगाहें है कैसी है आपदा छिन गाइ हर चेहरे की जीत रे रिमझिम ,,,,,,,, आलोक त्रिपाठी इंदौर 9425069983

बारवें भाव में मंगल और फल जानें

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मंगल और परिवार में बारहवें भाव | बारहवें भाव में मंगल होने से मांगलिक दोष निर्मित होता है जिसके कारण व्यक्ति को जीवन साथी का वियोग पड़ जाता है यह वियोग कई रूप में हो सकता है यथा - जीवन साथी की / का मृत्यु हो जाना, विधवा या विदुर होने से। जीवन साथी के साथ शारीरिक सम्बन्ध से दुराव हो जाना। अकर्ण छोटे-छोटे बातो को लेकर लड़ाई-झगड़ा होना। जीवन साथी के साथ तलाक होने से। कई बार तो पारिवारिक और सामाजिकता निभाने के लिए केवल साथ रहता है। आलोकजी शास्त्री इन्गौर मप्र 9425069983

बंशीवाला

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बंशीवाला ,,,,,,,,,,,,,, रोजी रोटी की खातिर कुछ करना होगा बंशी लेकर जगह जगह अब चलना होगा चढती धूप पसीने से तर बदन फिरे वह मेहनत की अग्नी में इसको जलना होगा यह बांसुरी सुरों में मोहन नाम पुकारे होकर सजग कर्म पथ पर कदमों को डारे होकर निर्भय भ्रमण करे नित चार पहर तक क्योकि बीबी बच्चे हैं बस इसको प्यारे पोषण करने की खातिर ये घूम रहा है सच्चाइ से इसका चेहरा झूम रहा है लेकर प्रभु का नाम कर्मयोगी सा रामू होठों से बंशी को अपने चूम रहा है हे प्रभु ऐसे पथ पर चलने वालों को ऐसे मेहनत कस सच्चें परिवारों को अपनी कृपा दृष्टि से बंचित मत करना इनकी झोली खुशियों से तुम भर देना आलोक त्रिपाठी इन्दौर 9425069983

प्रजनन क्षमता कुंंडली के द्वारा कैसे जानें

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कुंडली मे प्रजनन क्षमता न होने के कइ कारण होते हैं इनमे शनी और शुक्र का एक दूसरे से 2-12 वे भाव मे होना मुख्य है जो संतान प्राप्ती मे बाधक भी बना देता है । astro alok 9425069983

गोपीगीतम्

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गोपी गीत जयति तेऽधिकं जन्मना ब्रजः श्रयत इन्दिरा शश्वदत्र हि। दयित दृश्यतां दिक्षु तावका स्त्वयि धृतासवस्त्वां विचिन्वते॥ (१) भावार्थ:- हे प्रियतम प्यारे! तुम्हारे जन्म के कारण वैकुण्ठ आदि लोको से भी अधिक ब्रज की महिमा बढ गयी है, तभी तो सौन्दर्य और माधुर्य की देवी लक्ष्मी जी स्वर्ग छोड़कर यहाँ की सेवा के लिये नित्य निरन्तर यहाँ निवास करने लगी हैं। हे प्रियतम! देखो तुम्हारी गोपीयाँ जिन्होने तुम्हारे चरणों में ही अपने प्राण समर्पित कर रखे हैं, वन-वन मे भटककर तुम्हें ढूँढ़ रही हैं। (१) शरदुदाशये साधुजातसत् सरसिजोदरश्रीमुषा दृशा। सुरतनाथ तेऽशुल्कदासिका वरद निघ्नतो नेह किं वधः॥ (२) भावार्थ:- हे हमारे प्रेम पूरित हृदय के स्वामी! हम तुम्हारे बिना मोल की दासी हैं, तुम शरद ऋतु के सुन्दर जलाशय में से चाँदनी की छटा के सौन्दर्य को चुराने वाले नेत्रों से हमें घायल कर चुके हो। हे प्रिय! अस्त्रों से हत्या करना ही वध होता है, क्या इन नेत्रों से मारना हमारा वध करना नहीं है। (२) विषजलाप्ययाद्‍ व्यालराक्षसाद्वर्षमारुताद्‍ वैद्युतानलात्। वृषमयात्मजाद्‍ विश्वतोभया दृषभ ते वयं रक्षिता मुहुः॥ (३)...

वह मृगनयनी मेरी कवितायें

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वह मृगनयनी ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,  पानी का घट सिर पर चलती इठलाकर आंचल पवन हिलोरे थोड़ी सी शरमाकर नयनों के तिरछे वाणों से पड़ती  दृष्टी घायल कर देती है वो मृगनयनी आकर पायल की छनछन सी लगती मधुर तरंगे विस्मित होकर श्रवण रन्ध्र स्तब्धित हू मै विरह अग्नि की ज्वाला जलती है मन में ब्रम्हचर्य में विघ्न हुआ अचंभित हू मैं यौवन सी छलकाती मुर्छित कर देती है नई नवीन उमंगें मन में भर देती है बिह्वल सा में तृप्त हो रहा  रूप सुधा से हृदय कुंज में चंचलता ये भर देती है सोच रहा हूं इस सरिता में बह जाऊ मै निर्मल होकर प्रेम रंग में रंग जाऊं मैं अंबर से कुछ किरणें उसको देकरके हृदय पटल पर अंकित उसको कर पांऊ मैं प्रेम सहज जीवन का ये उद्गार है मेरा प्रेम पवन सा बहता  हार है मधुर गीत का उद्भव अद्भुत बेला है ये प्रेम हि मेरे जीवन का बस सार है आलोकजी शास्त्री इन्दौर 9425069983

सदाशिव भगवान शिव जिन्हें मृत्युंजय कहा जाता है

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* भगवान शिव हम सभी के ईष्ट हैं। वे सभी की पीड़ा, दर्द को समझते हैं। * शिव के सिर पर गंगा है, उनके सिर पर चंद्रमा विराजते हैं, उन्हें 'चंन्द्रमौलि' कहते हैं। * शिव की आराधना, साधना, उपासना से मनुष्य अपने पापों एवं संतापों से इसी जन्म में मुक्ति पा सकता है। * सोमवार चंद्रवार है, इसीलिए चंद्रमा को तृप्त करने के लिए कावरिए अपनी कावरों में घंटियां बांधे हुए 'हर बम' 'हर हर महादेव', 'बम बोले बम' 'ॐ नम: शिवाय' आदि कहते हुए शिवधाम जाते हैं। * भगवान शिव मात्र एक लोटा जल, बेलपत्र, मंत्र जप से ही प्रसन्न हो जाते है। अत: मनुष्य अगर शिव का इतना भी पूजन कर लें तो पाप कर्मों से सहज मुक्ति प्राप्त हो जाती है।

विश्वनाथाष्टकम्

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काशी विश्वनाथाष्टकम् गङ्गा तरङ्ग रमणीय जटा कलापं गौरी निरन्तर विभूषित वाम भागं नारायण प्रियमनङ्ग मदापहारं वाराणसी पुरपतिं भज विश्वनाधं ‖ 1 ‖ वाचामगोचरमनेक गुण स्वरूपं वागीश विष्णु सुर सेवित पाद पद्मं वामेण विग्रह वरेन कलत्रवन्तं वाराणसी पुरपतिं भज विश्वनाधं ‖ 2 ‖ भूतादिपं भुजग भूषण भूषिताङ्गं व्याघ्राञ्जिनां बरधरं, जटिलं, त्रिनेत्रं पाशाङ्कुशाभय वरप्रद शूलपाणिं वाराणसी पुरपतिं भज विश्वनाधं ‖ 3 ‖ सीतांशु शोभित किरीट विराजमानं बालेक्षणातल विशोषित पञ्चबाणं नागाधिपा रचित बासुर कर्ण पूरं वाराणसी पुरपतिं भज विश्वनाधं ‖ 4 ‖ पञ्चाननं दुरित मत्त मतङ्गजानां नागान्तकं धनुज पुङ्गव पन्नागानां दावानलं मरण शोक जराटवीनां वाराणसी पुरपतिं भज विश्वनाधं ‖ 5 ‖ तेजोमयं सगुण निर्गुणमद्वितीयं आनन्द कन्दमपराजित मप्रमेयं नागात्मकं सकल निष्कलमात्म रूपं वाराणसी पुरपतिं भज विश्वनाधं ‖ 6 ‖ आशां विहाय परिहृत्य परश्य निन्दां पापे रथिं च सुनिवार्य मनस्समाधौ आधाय हृत्-कमल मध्य गतं परेशं वाराणसी पुरपतिं भज विश्वनाधं ‖ 7 ‖ रागाधि दोष रहितं स्वजनानुरागं वैराग्य शान्ति निलयं गिरिजा सहायं माधुर्य धैर्य सुभगं गरल...

कुंडली से जानें लकवा रोग क्यो होता है किस ग्रह के प्रभाव से

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कुंडली से जानें लकवा रोग ,,,,,,,,,,,,,,, कुंडली से जाना सकता है कि लकवा प्रभाव क्यो होता है ।कुंडली मे यदि शनी की दृष्टि बुध पर हो और बुध कमजोर होतो ऐसा होता है कुंडली में रोगेश पर यदि शनी की दृष्टि हो तो भी संभावना होती है कुंडली में यदि मंगल शनी का षडाष्ट योग हो और शनी की अपेक्षा मंगल बलवान हो तो भी संभावना होती है इन योगों के कारण पैरों में कमजोरी या चलने की समस्या हो सकती है ।आलोकजी शास्त्री इन्दौर 9425069983

कुंडली में सूर्य की खराब स्थिति से जानें क्या होता है

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कुंडली मे सूर्य का खराब प्रभाव जानें सूर्य जन्म कुंडली में जिस भाव में होता है, उस भाव से जुड़े फलों की हानि करता है।    यदि सूर्य पंचमेश, नवमेश हो तो पुत्र एवं पिता को कष्ट देता है। सूर्य लग्नेश हो तो जातक को सिरदर्द, ज्वर एवं पित्त रोगों से पीड़ा मिलती है।    मान-प्रतिष्ठा की हानि का सामना करना पड़ता है।    किसी अधिकारी वर्ग से तनाव, राज्यपक्ष से परेशानी आदि।    यदि न्यायालय में विवाद चल रहा हो, तो प्रतिकूल परिणाम।    शरीर के जोड़ों में अकड़न तथा दर्द। किसी कारण से फसल का सूख जाना।    व्यक्ति के मुंह में अक्सर थूक आने लगता है तथा उसे बार-बार थूकना पड़ता है।    सिर किसी वस्तु से टकरा जाता है। तेज धूप में चलना या खड़े रहना पड़ता है।

सियासत की सच्चाइ दुनियां कहां जानती

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सियासत ,,,,,,,,,,,,,,,,,  इज्जत से जीने वाले लुट जाते हैं इज्जत की खातिर हर गम सह जाते हैं  बदनामी से कोसों दूर बसें भी तो दुनियां वाले कुछ छीटे  छिट जाते हैं शर्म हया को सड़कों पर बिकते देखा चाहे कितनी बार भी ओ पिट जाते हैं बनकरके हमदर्द छुपे रूस्तम की तरह सीने मे खंजर कुछ तो घुप जाते हैं सच्चाइ का मोल ये दुनिया क्या जाने सच्चे चेहरे परदे मे ढक जाते हैं कब तक रहमों करम दिखायेगे हम पर नेताजी से रोज जो मिलने जाते हैं बेशब्री से देख रहा हू न्याय की राह तारिख पर तारिख फिर भी बढ जाते हैं रोजी रोटी कौन बतायेगा उनको आगे की थाली आइ छिन जाते हैं रब्बा दुनियां खौफ के मारे मर जाये बीमारी पर कितना डर फैलाते हैं हम तो हैं आलोक बिखेरे चेहरे पर संकट में चादर खुद ढल जाते हैं आलोकजी शास्त्री इन्दौर 9425069983

विबाह और सप्तमेश शनी क्या फल देता है जानें

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विवाह और सप्तमेश शनी ,,,,,,,,,,,, ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, किसी भी कन्या की कुंडली के सातवें भाव से उसके होने वाले जीवनसाथी का विचार किया जा सकता है। युवतियों में अक्सर यह जिज्ञासा रहती है कि उनकी शादी कैसे होगी, उनका पति कैसा होगा और उसके साथ उनका तालमेल कैसा रहेगा? यहां पेश है कुछ मूलभूत जानकारी कुंडली के सातवें भाव (जीवनसाथी भाव) के बारे में:  * सप्तम भाव का स्वामी राहु से पीड़‍ित‍ हो तो उसका पति व्यसनी होगा।  * सप्तमेश लग्न में हो तो ऐसी कन्या स्वविवेक से विवाह करती है।  * सप्तम भाव का स्वामी नीच का होकर बैठ जाए तो उसे अपने पति से लाभ की गुंजाइश नहीं रहेगी।  * सप्तम भाव का स्वामी दशम भाव में उच्च का हो तो ऐसी कन्या का भावी जीवनसाथी व्यापारी या राजनीतिज्ञ भी हो सकता है, लेकिन मोटे शरीर वाला होगा।  * सप्तम भाव में सूर्य, बुध, शुक्र हो तो ऐसी कन्या का पति किसी भी योग्य न होगा। × * सप्तमेश अष्‍टम भाव में हो तो विवाह देर से होगा व पति का सामान्य रंग-रूप का परिश्रमी होगा।  * सप्तमेश षष्ट भाव में हो तो ऐसी कन्या का विवाह देरी से होगा व अनेक बाध...

मर्यादा पुरुषोत्तम परम आराध्य भगवान राम

आदर्श राम ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,  राम मेरी आन हैं औ राम मेरी शान हैं कंठ में घुले हुये स्वरों में मेरे राम हैं थक न जाऊं राह में वो देखते हैं गौर से भेजते हैं शक्ति मुझे वो तो अपनी ओर से कंठ लड़खडा़ये न जाये बंद हो न ये जुबां इसलिये स्वरों में सदा गूंजता ये नाम हैं राम मेरी,,,,,,,,,,,, संस्कृति का मोल कौन दूसरा बतायेगा राम के बिना तो यहां कौन पूजा जायेगा स्वल्प साधनों से कैसे कार्य हो महान सुनो राम की महानता न कौन  गुनगुनायेगा बैरियों को अंत समय दे दिये हैं मोक्ष धाम ऐसे बीर कृपा सिधु करूणा निधान हैं राम मेरी,,,,,,,,,, देश ये पुकारता धरा सनाथ राम से धर्म है जिवंत सदा राम के हि काम से कर्म की उपासना की प्रेरणा मिली सदा भावना चरित्र की पवित्र सदा राम से जगत का प्रपंच मिटे राम की उपासना से करके सारे कर्म सदा ये बने अकाम हैं राम मेरी,,,,,,,,,, भाव जगत भूल जाये राम की कृपा जो होय कष्ट कटे दुख मिटे संत सभी गाते हैं बेसहारों कों सदा गले लगाते मेरे राम हि वेद और पुराण यही सर्वदा सुनाते हैं गर्व है सनातनी परंपरा के मूलरूप भारतीयता की एक राम हि पहचान हैं आलोकजी शास्त्री इन्दौर 9425069983

शुक्र और मंगल का योग कुंडली में क्या करता है जानें

शुक्र जातक को हर प्रकार का भोतिक सुख देता है और मुख्य रूप से काम सुख का कारक होता है लेकिन जब तक शरीर में मंगल की उतेजना न हो उस सुख का पूर्ण आनन्द जातक के द्वारा नही लिया जा सकता | शुक्र पुरुष की कुंडली में पत्नी का कारक होता है तो मंगल स्त्री की कुंडली उसके पुरुष मित्र का कारक होता है और इसी कारक यदि पुरुष की कुंडली में ये योग हो और शुभ सिथ्ती में हो तो उसे स्त्री वर्ग से विशेष सुख दिलाता है जबकि स्त्री की कुंडली में उसके पुरुष मित्रों से सुख दिलवाता है लेकिन स्त्री की कुंडली में ये पति पत्नी के विचार आपस में बहुत कम मिलने देता है और दोनों में आपसी तनाव पैदा करता है क्योंकि मंगल अंहकार कका कारक ग्रह भी होता है ऐसे में महिला जातक में अंहकार की भावना सामान्य से ज्यादा होती है । . मंगल हमारे शरीर में खून का कारक ग्रह है और शुक्र वीर्य का | जब तक शरीर में खून की उचित मात्रा नही होगी वीर्य की कमी का सामना जातक को करना पड़ जाता है। . शुक्र घी तो मंगल शहद होता है और जैसे अलग अलग बीमारियों में इन दोनों का अनुपान भेद से प्रयोग किया जाता है लेकिन जब इन दोनों को समान मात्रा में मिला दिया जाता ह...

कुंडली में कामेच्छा और नपुंसकता योग

ज्योतिष में कामेच्छा और नपुंसकता योग,,,,,,,, काम शक्ति - काम इच्छा - और ज्योतिष   काम शक्ति - काम इच्छा - और ज्योतिष हमारे पुरुष प्रधान समाज में पौरुष का आकलन व्यक्ति के लैंगिक प्रदर्शन पर अक्सर किया जाता रहा है. इस विषय पर लोग आज भी खुल कर बात नहीं करते किन्तु दबी जुबां में चर्चा समाप्त भी नहीं होती है. इस लेख में मैं प्रयास करूंगा की यदि आप यौन दुर्बलता आदि से ग्रस्त हैं तो उसके ज्योतिषीय उपाय क्या हो सकते हैं. ज्योतिष बहुत ही विस्तृत विज्ञान है और मनुष्य की हर बात को इस से समझा जा सकता है. आज के युग में जिसमें की शुक्र की प्रधानता बढती जा रही है , हम रोज़मर्रा के जीवन में देखते है की सम्भोग शक्ति से सम्बंधित दावा और मशीनें बढती जा रही है जो की कुछ नहीं है , लोगों की शर्म का मनोवैज्ञानिक आर्थिक दोहन है. सम्भोग की समयसीमा की अधिकता पौरुष का मार्का बन गयी है. जब हम किसी दवाई की दूकान में जाते हैं तो सामने ही हमें पुरुषों की सम्भोग शक्ति बढाने वाले तेल , पाउडर , कैप्सूल , गोली और स्त्रीयों के वक्ष बढाने वाले उत्पाद दीखते हैं , जीवन रक्षक और आवश्यक दवा पीछे कहीं पड़ी रहती है. लोग भी अं...

जानें आपकी कुंडलीमें पितृदोष क्यों कैसे

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पितृ दोष के कई कारण और प्रकार होते हैं। पूर्वजों के कारण वंशजों को किसी प्रकार का कष्ट ही पितृदोष माना गया है ऐसा नहीं है और भी कई कारणों से यह दोष प्रकट होता है। इसे पितृ ऋण भी कह सकते हैं। आओ जानते हैं कि पितृदोष और ऋण क्या होता है। जानने में ही समाधान छुपा हुआ है। ज्योतिष के अनुसार पितृ दोष और पितृ ऋण से पीड़ित कुंडली शापित कुंडली कही जाती है। ऐसे व्यक्ति अपने मातृपक्ष अर्थात माता के अतिरिक्त मामा-मामी मौसा-मौसी, नाना-नानी तथा पितृपक्ष अर्थात दादा-दादी, चाचा-चाची, ताऊ-ताई आदि को कष्ट व दुख देता है और उनकी अवहेलना व तिरस्कार करता है। जन्म पत्री में यदि सूर्य पर शनि राहु-केतु की दृष्टि या युति द्वारा प्रभाव हो तो जातक की कुंडली में पितृ ऋण की स्थिति मानी जाती है। इसके अलावा भी अन्य कई स्थितियां होती है। हालांकि इसके अलावा व्यक्ति अपने कर्मों से भी पितृदोष निर्मित कर लेता है। विद्वानों ने पितर दोष का संबंध बृहस्पति (गुरु) से बताया है। अगर गुरु ग्रह पर दो बुरे ग्रहों का असर हो तथा गुरु 4-8-12वें भाव में हो या नीच राशि में हो तथा अंशों द्वारा निर्धन हो तो यह दोष पूर्ण रूप से घ...