प्रिये ,,,,,,,, प्रिये जरा मद तो छलका दो मद का प्यासा मुझे बुझा दो तृष्णा की बढ़ती सांसों में प्रेम मधुर रस को टपका दो नैनों में भरकर सुरभित कण मुझको अब सुगंध लौटा दो बरबस हि में आ जाता हू नैनों में विश्राम करा दो प्रिय,,,, खुशियों से है ब्याप्त हृदय में संचित यौवन की किलकारी मुग्ध प्रफुल्लित होकर मैनें तेरी कबसे बाट निहारी तन मन के सौहार्दं पलों का हल्का सा एहसास करा दो प्रिये,,,,,,,,, सावन की हरियाली जैसी पावन मधुर प्रेम बगिया है प्रेम तृषा की अद्भुतबेला संगम का सौपान बना दो प्रिये,,,,,,, लघु कदमों से पायल बाजे तेरी आहट मिल जाती है मधुर मिलन की सोच मेरे इस पटल में खिल जाती है स्पर्शों से झंकित करती कोइ ऐसी तान सुना दो प्रिये,,,,,,,, तुम धरती बनकर बिछ जाना अम्बर मुझको मिलजायेगा तेरा यही समर्पण मेरे अंतस्तल में सिल जायेगा मैं हू प्रेमपुजारी मुझको प्रीत जगत में तुम चमका दो प्रिये ,,,,, आलोक रंजन इन्दौर मप्र
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