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Showing posts from August, 2020

महबूबा

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महबूबा 🌺🌺🌺 वो सिर्फ मेरे दिल में बसा हुआ था उसे तो बस पल का नशा हुआ था मेरे नज़दीक वो खुद आकर बैठा मैंने एक बार हि उसको छुआ था मुहब्बत के बरबाद लम्हें याद हैं मुझे ज़िंदगी का वो भी कैसा जु़वा था नज़र कहाँ कहाँ तलाशती रही उसे मगर रास्ते में बस धुवाँ धुवाँ था ज़वाँ दिलों का हश्र ऐसा भी होता है एक तरफ खाइ एक तरफ कुवाँ था दुवायें हैं कि ख्वाब पूरे हो तेरे रंजन खुश रहे वो तेरा जो महबुबा था 🌺🌺🌺🌺 आलोक रंजन

सच्ची हँसी

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सच्ची हँसी 🌺🌺🌺🌺🌺 ,,,,,,,,,,,,,,,,,, मेहनत जब मिट्टी से जुड़ जाती है चेहरे पर बस ऐसी हँसी लाती है दिखता है पूरा चेहरा चन्दा सा अपने आप खुशी बस झलकाती है मेहनत से,,,,,  मिट्टी से जुड़ने वाले हि जानेंगे कठिन तपस्या है वो पहचानेंगे जीवन तपकर कुंदन भी बन जाता है जब हम कुछ करने की ठानेंगे जोश होश में मस्ती छा जाती है मेहनत जब,,,,,,,, हर आसान मुश्किलें हो जाती सिकवा और सिकायत धुल जाती रस्ते हो जाते आसान सुगमता से किस्मत की कुंजी भी देखो मिल जाती अपने आप पहुँच जाते हैं मंजिल तक एक आत्म विश्वास सदा लहराती है मेहनत से,,,,,, खाक ग़रीबी का रोना रोयेगा कौन मखमल के ऊँचे गद्दे पर सोये कौन घास फूस की कुटिया महल सी लगती है रोकर करके किस्मत पर आँख भिगोये कौन लिखकरके किस्मत अपनी चमकाती है मेहनत,,,,,, 🌺🌺🌺🌺🌺 आलोक रंजन

तेरे हवाले

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तेरे हवाले 🌺🌺🌺 वफा के नाम पर कितने बड़े घोटाले हैं तुम्हारे शौक तो बर्बाद करने वाले हैं मुझे ख़बर है मुझे चाहते हो तुम बहुत इन्हीं ख़यालों में रातों को सोने वाले हैं जख़म दिखाकर तुम याद क्यूँ दिलाते हो इन्हीं जख्मों ने दिये मेरे दिल में छाले हैं मैं तेरे हर ग़म का अब हिसाब रखता हूँ तुम्हें पता है ग़म हम कितने पीने वाले हैं नायाब ज़िन्दगी के उसूल हैं कुछ सुन लो वफा के किस्से बहुत दर्द देने वाले हैं तका़जा़ अब नही उनसे कभी करूँगा मैं दिलों नें जिनके मेरे राज़ छुपा डाले हैं वक्त की बात है किससे सिकायतें करता हैं कुछ अफ़साने जो रंजन के हि हवाले हैं 🌺🌺🌺🌺 आलोक रंजन

बिन तेरे जीवन श्रीमती रीतू राय की कविता

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तुझसे विछड़कर जीने की  सौगात लेकर क्या करूँगी चाँद जब ना साथ हो चाँदनी रात लेकर क्या करूँगी विन तेरे कैसा सफर विन तेरे कैसी डगर विन तेरे ना है मेरा कोई तुम सा हमसफर आये सावन की घटा या आये मधुमास फिर विन तेरे इन मौसमों की बरसात लेकर क्या करूँगी तुझसे विछड़कर जीने की सौगात लेकर क्या करूँगी अवनि दुल्हन बनी है ओढ़कर धानी चुनर नीले गगन में भी  चाँदनी का है पहर  तुम कहाँ चले गये हो फेर लिए क्यों नजर  ढूढती निगाहें है  तुमको आठो पहर   विन तेरे इन साँसों की रफ्तार लेकर क्या करूँगी चाँद जब साथ ना हो चाँदनी रात लेकर क्या करूँगी   यादों में डेरा तेरा उर में बसेरा तेरा तम ही तम आसमां में ना है सवेरा मेरा   जोगन बनी  मै ढूढ़ती तुझको फिरूँ आशियाने में मेरे ना है बसेरा तेरा विन तेरे मै खुशियों की बारात लेकर क्या करूँगी जिन्दगी में तू नही तो तेरा एहसास लेकर क्या करूँगी। रीतू राय (आजमगढ़) उत्तर प्रदेश 

मेरे अजी़ज़

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मेरे अज़ीज़ 🌺🌺🌺 वो छत पे जब खड़ी होकर इशारे मुझको करती है किताबें हाथ में लेकर घुमाकर मुझसे कहती है हमारे घर चले आना जनम दिन आज मेरा है वो दिलवर है मेरी साँसों में अब हर पल हि रहती है। कइ दिन हो गये दिखती नही क्या बात है जानें खबर कुछ चल नही पाती भला अब कैसे हम जानें मेरे खत का इशारा वो समझ पाइ नही लगता उसी की याद में अब लिख रहा हूँ अपने अफसाने। नज़र मेरी उसी को देखती रहती है रस्ते में बनाकर प्रेम के गीतों को रखता हूँ मैं बस्ते में समय तो हो गया जानें कहाँ वो रूक गइ होगी बड़ी नादान है दिल ले  गयी मेरा वो सस्ते में। किताबों में छुपाकर खत रखा है कल हि लिख करके मेरा दिल ले गइ थी  वो ज़रा सी मुझको दिख करके मैं कितना बावरा सा हो गया हूँ याद में उसकी किसी शायर की प्यारी शायरी आया हूँ सिखकरके 🌺🌺🌺🌺🌺 आलोक रंजन

संगम तुम मेरे गीतों में आते

संगम 🌺🌺🌺 गहरा नाता चंदा से है तेरा मुझको लगता है तेरा चेहरा चंदा जैसा पूरा पूरा लगता है चांदनी तेरे परितः होती जिसमें तुम जुल्फें लहराते तुम मेरे,,,,,,, अंबर तुझको देख देखकर बादल को आदेश दिया है वर्षा की बूदों में  चेहरा पहले से भी और खिला है भींगे होठ चुनरिया भींगी आँचल और भीगे लिपटाते तुम मेरे,,,,, भींगे बदन झलकते तन में कामद मादक बढ जाती है जब तेरी जुल्फें चेहरे पर अपनी गरिमा लटकाती है सारी प्रकृति तुझे बस देखे बिन देखे कैसे रह पाते तुम मेरे,,,,,, तरूणाइ है कितनी प्यारी कदम कदम पर छाइ है नई नवेली शुभ सगुनों में तेरे रूप में आइ है संगम होता तेरा मेरा  और बहुत सी होती बातें तुम मेरे,,,,,,, आलोक रंजन

तुम मेरे गीतों में आते ७०

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[8/21, 9:00 PM] आलोक त्रिपाठी: प्रायश्चित्तं 🌺🌿🌺🌿🌺 ये जीवन है उड़नखटोला जाने कब उड़ जायेगा तेरा नाता परम पिता से इक क्षण में जुड़ जायेगा ये जीवन,,,,,,, तुमने कितने कर्म किये हैं तुमको बतलाना होगा प्रभु समक्ष अपनी चतुराई से दूरी रहना होगा वो है अंतर्यामी जग का भेद सभी खुल जायेगा ये जीवन है,,,,,, जन्मों से अपने मन की  यूँ हि करते आये हो दुख में किसी मनुज को बोलो क्या सहाय बन पाये हो तेरा तुझको प्रभु देता है करम तेरा तुल जायेगा जीवन है,,,,,, अब संकल्प करो तनमन से शुभता की शुरुवात करोगे जिससे कोइ दुख पाता है क्या तुम ऐसी बात करोगे दुख देने से दुख मिलता है सुख से सुख मिल जायेगा जीवन है,,,,,, प्रतिबंधों में मन को कर लो बहक बहक मत जाना तुम गर्भ में जैसे सच्चे मन थे वैसे हि बन जाना तुम रंजन तेरा भवबंधन से सब बंधन छुट जायेगा जीवन है,,,, 🌺🌿🌺🌿🌺🌿 आलोक रंजन [8/22, 12:15 AM] आलोक त्रिपाठी: तुम मेरे गीतों में आते शायद हम तुमको लिख पाते 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 कैसे करें प्रतिक्षा उसकी उल्टी पुल्टी दिक्षा उसकी जाने कब क्या कह जायेगा होगी नही समीक्षा उसकी आदत से...

ध्यानाकर्षण

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ध्याननाकर्षण 🌺🌺🌺🌺🌺 आच्छादित प्रकाश से पल पल उजियारे का भान हुआ उसके कर कमलों से मेरी  निद्रा का अवसान हुआ जागूँ भोर भँवर गुंजित है फूल बाग़ के हैं मुस्काते तुम मेरे,,,,,, महका महका सब कुछ लगता यहाँ कोइ खुश्बू आइ है जानें किस सौन्दर्य रूप में हँसती मेरी अँगड़ाइ है भूल गया मैं स्वयं कहाँ हूँ बीत गइ क्या काली रातें तुम मेरे,,,,,, सुखद सुवास सुसज्जित बेला मेरे मन को खूब लुभाती प्राप्त हुई जैसे निधि कोइ संसर्गों से हम सुख पाते गाने को दिल करता है अब स्पंदित होता है सुर साँचे तुम मेरे,,,,,, ना मैं राजमहल का वासी ना हि हूँ प्रासाद निवासी मैं तो केवल मनुज सरल हूँ मेरे अंदर है सुखराशी जगत ब्याप्त वह अंतर्यामी का हि केवल ध्यान लगाते तुम मेरे,,,,, 🌺🌺🌺🌺 आलोक रंजन

अरुणिमा

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अरूणिमा 🌺🌺🌺 तुम प्रातः बनकर आती हो मुझको नित्य जगाने को अपनी कुछ नवीन उर्जा से मेरी शक्ति जगाने को मैं विभोर हो जाता हूँ प्रिय ऐसी घूँट पिला जाते तुम मेरे,,,,, बेला है कुछ कर जानें की अपनी क्षमता दिखलाने की रोम रोम में ब्याप्त तेरी रूत आ जाती है दिल बहलाने जगमग रोशन हो जाता मैं मुझमें जोश जोश जगा जाते तुम मेरे,,,,,,,,, झुर झुर बहती पवन देख मैं आत्म मुग्ध हो जाता हूँ तेरे सुर में अपना सुर ये लिखकरके बतला देता हूँ चिड़िया वही गीत दुहराते जो तुम  उन्हें सिखा जाते तुम मेरे,,,,, रूप और माधुर्य बरसता मेरे घर आँगन में तेरे आने से इतराती फुलझड़ियाँ इस मन में समुचित दिब्य गहन सुन्दरता  अद्भुत दर्श करा जाते तुम मेरे,,,,,, 🌺🌺🌺🌺 आलोक रंजन

सावन सूना लागे

सावन सूना लागे ,,,,,,,,,,,, कैसा सावन कैसा झूला कैसी कजली गीत रे रिमझिम की बरसातें कैसी कैसी मधुबन प्रीत रे सावन के झूले सूनें हैं सूनी मधुवन की बगिया गोपिन के पनघट सूनें हैं सूना है संगीत रे रिमझिम,,,,,,,,,,, मेले की रंगरेली सूनी मौसम की रंगत सूनी बारातों की चहकन सूनी गलियां हैं सूनी सूनी मन का गुंजन सूना लागे सूनी है संगीत रे,,,,,,,,,,, रिमझिम,,,,,,,, बाजारों की रौनक सूनी सूने  सब चौराहे हैं चाचा की चट्टी सूनी है सूनी सभी निगाहें है कैसी है आपदा छिन गइ हर चेहरे की जीत रे रिमझिम,,,,,,,,,, आलोक त्रिपाठी इन्दौर 9425069983

चश्मे नासूर

चश्में नासूर 🌺🌺🌺🌺 मौसम है ये रंगीन मज़ा लीजिये हूजूर गुलशन ये है नमकीन मजा लीजिये हुजूर मौसम है,,,, सच्चाइ भटकती है गलियों में हारकर पागल से हो रहे हैं वो कुरते उतारकर रंजिश में यहाँ कौन पूछता है उनका हाल जख्मों को दबाये वो फिर रहे हैं फटे हाल मुश्किल सी है तालीम मजा लीजिये हुजूर मौसम है,,,,,,, साजिश सी हो रही वतन केलिये वहाँ गम का मखौल उड़ रहे देखो कहाँ कहाँ भूखे गरीब सो रहे सड़कों पे देखिये बेहाल कर रही ये तबाही तो देखिये ख़बरे तजारीन मज़ा लीजिये हूजूर मौसम है,,,,,, कुरसी को बचानें के लिये बिक गये जनाब नफरत की दिवारों पे हि अब टिक गये जनाब जो कहते थे हम देश को आगे बढायेगे अब तकन हुआ वो भी करके दिखायेगे बिकने लगी ज़मीन मज़ा लीजिये हूजूर मौसम हैं ,,,,, मँहगाइ छू रही है यहाँ आसमान को रोकोगे कैसे बोलो तुम इस तुफान को खुदगर्ज हो गये हैं सियासत के सिपाही जनता हि दे रही है उन्हें उनकी गवाही कानून है प्राचीन मजा लीजिये हुजूर मौसम है,,,, 🌺🌺🌺🌺 आलोक रंजन

तुम मेरे गीतों में आते

तुम मेरे गीतों में आते ३ शायद हम तुमको लिख पाते 🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺 श्रद्धा की एक नाव बनाकर हम दोनों उसमें विरजेंगे साहस की पतवारें होंगी पथ में अब हम नही रुकेंगे शरणागत होकर चरणों में प्रभु को अपनी प्रीत सुनाते तुम मेरे गीतों,,,,,,, बंशी की धुन पर नाचेंगे गायेंगे गोविन्दम् वृंदम् शीश नवाकर अपनें कर से करते रहेगे बंदन नित्यम् आँखों से जल बरसायेंगे और कहेगे जगत पिता से तुम मेरे,,,,,,, देर रात में ध्यान करेंगे इष्टों का आह्वान करेगे अपनें भावों को पुष्टित कर कुछ आदान प्रदान करेगे नित्य हमारा नीयम होगा हर क्षण हि बस आते जाते तुम मेरे,,,,,, रो रोकर स्तुति गायेंगे श्रद्धा सुमन चढा़ देगे जब प्रसाद देने आयेगे अपनें हाथ बढ़ा देगे दर्शन से निर्मल पावक में हम दोनों निरमल हो जाते तुम मेरे,,,, 🌺🌺🌺🌺 आलोक रंजन

जागृति पुनः चिंतन

जागृति पुनः चिन्तन 🌺🌺🌺🌺🌺 नज़र में हो धोखा अगर दोस्ती में तो फिर दोस्ती ये कहां तक चलेगी समझ जाइये ये बनावट की बातें किसी दिन बुरी जाल साजी करेगी नज़र में,,,,,,,  मुहब्बत में उनको पता भी न चलता के महबूब बनकर सुबह शाम रहता खयालों में जिनके गुजारी हैं रातें इन्हीं के हि हाथों से एक दिन जलेगी नज़र में,,,,,,, ये मासूम चेहरे बनाकर हैं रहते बहुत साफगोइ है बातों से दिखते अमीरों की तरहा बना शान शौकत सराफत की चादर से खुद हैं ढंकते बनाकर करके महबूब जालों में लेते कि वो उम्र भर हाथ यूँ हि मिलेगी नज़र में,,,,,,,, ज़रा हालते गम इन्हें देखिये अब ये सब कुछलुटाकर न जीतो न मरते ज़माने में कोइ नही है सहारा ये बस अपनें कर्मों पे यूँ आह भरते जो दहलीज घर की बहक लाँघते हैं उन्हें उनकी रूहें न माफी करेगी नज़र,,,,,, 🌺🌺🌺🌺 आलोक रंजन

अमन चैन का गुलशन मेरा भारत

मेरा भारत 🌺🌺🌺 अमन और चैन का गुलशन ये भारत हम भी देखेंगे सरसता समता का मधुबन ये भारत हम भी देखेंगे अमन और,,,, गली चौराहे होंगे स्वच्छ नदियाँ दूध सी होंगी मुहल्ले प्रेम बरसायेगे गलियाँ महकती होगी बरसते मेघ के  सावन ये भारत हम भी देखेगे अमन और,,,,,,,,, मिटेगी धर्म की दूरी मनुजता फिर से छायेगी सभी मिलकर रहेगे देश भक्ती जाग जायेगी गले मिलते हुये बचपन ये भारत हम भी देखेंगे अमन और,,,,,,, जाति दूषित विचारों का समापन हो हि जायेगा हर एक बंदा हर एक के सुख में दुख में खो हि जायेगा न होगी अब कोइ अड़चन ये भारत हम भी देखेंगे अमन और,,,,, मुलाजिम अपनी जिम्मेदारियाँ को अब निभायेगे हुकूमत नेक नजरों से हुकुम अपना चलायेगे बराबर हक का अनुमोदन ये भारत हम भी देखेगे अमन और,,,, 🍀🍀🍀 आलोक रंजन

भाव रस भजन

भाव रस 🍀  चलो भक्ति का कुछ जतन  ढूँढते हैं वो माँता पिता के चरन ढूँढते हैं बरसती रहेगी कृपा उस चमन पे जो राधाकिशन की शरन ढूँढते हैं जो आँखों से आँसू निकलते हैं तेरे समर्पित तुम्हारा बदन ढूँढते हैं ये दुनियाँ का रोना तो चलता रहेगा इबादत का कोइ चमन ढूँढते हैं जो आबाद है तेरे दिल में ये साँसे चलाता है जो वो सजन ढूँढते हैं विधाता हि सब कुछ बनाता मिटाता चलो उसका पावन सृजन ढूँढते हैं जो दिल को तसल्ली दिला देगी रंजन चलो कोइ ऐसा भजन ढूँढते हैं 🍀 आलोक रंजन

ग़ज़ल रास्ता

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रास्ता 🌺🌺 अजनवी कौन है मेरे दिल के क़रीब उसकी परछाइयाँ देखता हूँ बहुत दिल धड़कने का ये भी ख़याले बयाँ अपनी तनहाइयाँ भेजता हूँ बहुत दर्द की और किससे सिकायत करूँ कह न पाता मगर सोचता हूँ बहुत बन गये हैं जो मेरे दिलों में अजीज़ याद में अश्क को रोकता हूँ बहुत आँख में किरकिरी सी है छाइ यहाँ गम के किरदार को टोकता हूँ बहुत ये सफर काँट का फूल बन जाये भी रात दिन मेहनतें झोंकता हूँ बहुत उनके अहले करम पर भरोसा मुझे अब न तकदीर को नोचता हूँ बहुत प्यार के सिलसिले जब शुरू हो गये अपना दर्दे जिगर खोजता हूँ बहुत इत्मिनानी से कट जाये ये जिंदगी पाई पाई को मैं जोड़ता हूँ बहुत जो थे अपने हुये दूर मुझसे यहाँ फिर भी उनकी जुबाँ बोलता हूँ बहुत नफरतों से न रंजन सुकूँ मिल सका रास्ता प्यार में मोड़ता हूँ बहुत 🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺 आलोक रंजन शास्त्री इन्दौर

कहानी लघु कथा (दूसरी माँ)

दूसरी मां  ,,,,,,,,,,,,, एक लघु कथा ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, प्रकाश आज घर से निकलते वक्त टिफिन बरामदे में रखे सोफे पर भूल गया पत्नी  घर के सारे काम के साथ टिफिन बनाने में प्रेम और हृदय से पति के प्रति पूरा समर्पित भाव से तल्लीन रहती है छोटी बच्ची अभी ढाइ साल की है छोटी सी गृहस्थी बड़े प्रेम से कट रही है ।पत्नी विभा घरेलू कार्य के साथ साथ सामाजिक उत्सव से लेकर पोलीटिकल भागीदारी भी लोगों के साथ उतनी हि जिमेमेदारी से निभाती है चाहे वो वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाना हो राशन कार्ड बनवाना हो विजली के बिल कम करवाना हो सबमें लोगों के साथ खड़ी रहती है बहुत कम ऐसा होता है कि घर की लक्ष्मी घर के साथ साथ सामाजिक दायित्वों को पूरी निष्ठा से निभाने में सक्षम हो । समाज से जुड़े रहना विभा को अच्छा लगता है यदा कदा प्रकाश पत्नी की पूरी मदद करता है ।कुल मिलाकर पति पत्नी में सामंजस्य बहुत बढिया है । एक दूसरे को संतुष्टि है अपने दांपत्य जीवन से ।आज सादी की साल गिरह है प्रकाश आफिस से आते समय विभा की पसंद के बंगाली मिठाइ लेकर आया और सुन्दर सी साड़ी । साड़ी पहनकर विभा नें पती को प्यार से बाहों में लेकर च...

लघु कथा (मेरा भाइ)

पर्यावरण दिवस पर विशेष  ,,,,,,,,,,,, ये पेड़ नही मेरा भाइ है । ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, लघु कथा ,,,,, वर्षों पुरानी बात है पर्यावरण पर चर्चा हो रही थी गांव के कुछ बुद्धजीवी लोग अक्सर मेरे घर पर पिताजी के साथ राजनीति से लेकर समाज खेती बाड़ी को लेकर अपने विचारों को आदान प्रदान करते ।आज पर्यावरण की चर्चा हुइ और तय हुआ कि शास्त्र में भी आया है कि ,प्रत्येक मनुष्य को अपने जीवन में कम से कम पांच पौधे लगाना हि चाहिये ।पिताजी ने कहा चलो पोखरे वाले खेत पर चलते हैं कुछ पौधे रोपना है ।हम दोनो तीनों भाइ फावड़ा और घर के बगल में जो गली थी ,उसमें आम के जमें हुये पौधे लेकर पोखरे पर जा पहुचे।गढ्ढा खुदाइ करके  हम सबने अपने अपने हाथों से नौ पौधे लगा दिये । पानी देकर मिट्टी दबाकर चारो ओर से ऊचा करके घर आ गये । पिताजी के साथ कभी कभी हम भी पौधों को पानी देकर खुश होते । और अपने लगाये पौधे को बढता देखकर अपनेपन के भाव से मन हि मन बड़ी तृप्ति मिलती । समय बीतता रहा हम पढाइ पूरी करके नौकरी करने नागपुर आ गये । इस बीच हमारा लगाया हुआ पौधा पेड़ का रूप ले चुका था , और उसमेंं आम के फल भी आने लगे...