ग़ज़ल रास्ता
रास्ता
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अजनवी कौन है मेरे दिल के क़रीब
उसकी परछाइयाँ देखता हूँ बहुत
दिल धड़कने का ये भी ख़याले बयाँ
अपनी तनहाइयाँ भेजता हूँ बहुत
दर्द की और किससे सिकायत करूँ
कह न पाता मगर सोचता हूँ बहुत
बन गये हैं जो मेरे दिलों में अजीज़
याद में अश्क को रोकता हूँ बहुत
आँख में किरकिरी सी है छाइ यहाँ
गम के किरदार को टोकता हूँ बहुत
ये सफर काँट का फूल बन जाये भी
रात दिन मेहनतें झोंकता हूँ बहुत
उनके अहले करम पर भरोसा मुझे
अब न तकदीर को नोचता हूँ बहुत
प्यार के सिलसिले जब शुरू हो गये
अपना दर्दे जिगर खोजता हूँ बहुत
इत्मिनानी से कट जाये ये जिंदगी
पाई पाई को मैं जोड़ता हूँ बहुत
जो थे अपने हुये दूर मुझसे यहाँ
फिर भी उनकी जुबाँ बोलता हूँ बहुत
नफरतों से न रंजन सुकूँ मिल सका
रास्ता प्यार में मोड़ता हूँ बहुत
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आलोक रंजन शास्त्री इन्दौर
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