अरुणिमा
अरूणिमा
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तुम प्रातः बनकर आती हो
मुझको नित्य जगाने को
अपनी कुछ नवीन उर्जा से
मेरी शक्ति जगाने को
मैं विभोर हो जाता हूँ प्रिय
ऐसी घूँट पिला जाते
तुम मेरे,,,,,
बेला है कुछ कर जानें की
अपनी क्षमता दिखलाने की
रोम रोम में ब्याप्त तेरी रूत
आ जाती है दिल बहलाने
जगमग रोशन हो जाता मैं
मुझमें जोश जोश जगा जाते
तुम मेरे,,,,,,,,,
झुर झुर बहती पवन देख
मैं आत्म मुग्ध हो जाता हूँ
तेरे सुर में अपना सुर ये
लिखकरके बतला देता हूँ
चिड़िया वही गीत दुहराते
जो तुम उन्हें सिखा जाते
तुम मेरे,,,,,
रूप और माधुर्य बरसता
मेरे घर आँगन में
तेरे आने से इतराती
फुलझड़ियाँ इस मन में
समुचित दिब्य गहन सुन्दरता
अद्भुत दर्श करा जाते
तुम मेरे,,,,,,
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आलोक रंजन
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