ध्यानाकर्षण
ध्याननाकर्षण
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आच्छादित प्रकाश से पल पल
उजियारे का भान हुआ
उसके कर कमलों से मेरी
निद्रा का अवसान हुआ
जागूँ भोर भँवर गुंजित है
फूल बाग़ के हैं मुस्काते
तुम मेरे,,,,,,
महका महका सब कुछ लगता
यहाँ कोइ खुश्बू आइ है
जानें किस सौन्दर्य रूप में
हँसती मेरी अँगड़ाइ है
भूल गया मैं स्वयं कहाँ हूँ
बीत गइ क्या काली रातें
तुम मेरे,,,,,,
सुखद सुवास सुसज्जित बेला
मेरे मन को खूब लुभाती
प्राप्त हुई जैसे निधि कोइ
संसर्गों से हम सुख पाते
गाने को दिल करता है अब
स्पंदित होता है सुर साँचे
तुम मेरे,,,,,,
ना मैं राजमहल का वासी
ना हि हूँ प्रासाद निवासी
मैं तो केवल मनुज सरल हूँ
मेरे अंदर है सुखराशी
जगत ब्याप्त वह अंतर्यामी
का हि केवल ध्यान लगाते
तुम मेरे,,,,,
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आलोक रंजन
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