लघु कथा (मेरा भाइ)

पर्यावरण दिवस पर विशेष 
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ये पेड़ नही मेरा भाइ है ।
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लघु कथा ,,,,,
वर्षों पुरानी बात है पर्यावरण पर चर्चा हो रही थी गांव के कुछ बुद्धजीवी लोग अक्सर मेरे घर पर पिताजी के साथ राजनीति से लेकर समाज खेती बाड़ी को लेकर अपने विचारों को आदान प्रदान करते ।आज पर्यावरण की चर्चा हुइ और तय हुआ कि शास्त्र में भी आया है कि ,प्रत्येक मनुष्य को अपने जीवन में कम से कम पांच पौधे लगाना हि चाहिये ।पिताजी ने कहा चलो पोखरे वाले खेत पर चलते हैं कुछ पौधे रोपना है ।हम दोनो तीनों भाइ फावड़ा और घर के बगल में जो गली थी ,उसमें आम के जमें हुये पौधे लेकर पोखरे पर जा पहुचे।गढ्ढा खुदाइ करके  हम सबने अपने अपने हाथों से नौ पौधे लगा दिये । पानी देकर मिट्टी दबाकर चारो ओर से ऊचा करके घर आ गये । पिताजी के साथ कभी कभी हम भी पौधों को पानी देकर खुश होते । और अपने लगाये पौधे को बढता देखकर अपनेपन के भाव से मन हि मन बड़ी तृप्ति मिलती । समय बीतता रहा हम पढाइ पूरी करके नौकरी करने नागपुर आ गये । इस बीच हमारा लगाया हुआ पौधा पेड़ का रूप ले चुका था , और उसमेंं आम के फल भी आने लगे।हम जब भी उस पेड़ के पास जाते , अपने पन के एहसास से भर जाते ।गरमी की छुट्टी में तो अवश्य हि जाते वर्ष में एक बार ।इस बीच कइ बर्ष बीत गये मैं गांव जा न नही पाया बच्चों की पढाइ नौकरी और आपाधापी में समय नही मिला , ओर सच बात ये है कि पिताजी के नही रहने से न जाने क्यों गांव जानें का मन नही रहा। जब भी जाते पिताजी की यादें बस समृति में उतकर आंखे भिगा देती ।आज बहुत वर्षों के बाद गांव आना हुआ । बच्चें भी अब बड़े हो गये ।,सोचा बच्चों को अपने खेत और अपने लगाये पौधों की कहानी बताकर दिखा लायें , जो दादाजी के साथ हम लगाये थे ।बच्चों को लेकर पोखरे वाले खेत में एक आत्मिक प्रसन्ननता के साथ पहुचे ।
पर वहां जाकर अपने लगाये पेड़ को देखकर  मन क्षुब्ध हो गया ,वो जो पेड़ हमने लगाया था, रात में तेज चली आंधी के कारण उसकी डालें टूट कर गिरी थी ,और पेड़ अपने टूटे अंगों पर मानों आंसू बहाता मेरी प्रतिक्षा कर रहा था , कि आओ मुझे संभालो । पेड़ की ऐसी दशा देखकर मेरे आखों में आंसू बह निकले ,और मैं पेड़ से जाकर लिपट गया । बच्चे शायद मेरी हृदयात्मक अनुभूति को नही समझ रहे थे । पर मैं अपने आपमें उस पेड़ से जुडी भावना को ब्यक्त करने में असमर्थ होकर स्तब्ध था । बच्चों ने पूछा पापा आप क्यो रो रहे हैं । क्या एक पेड़ की डाल टूटने पर कोइ रोता है ? मैने कहा बेटा ये पेड़ नही मेरा भाइ है । इसे मैने पानी देकर सींचकर बड़ा किया है इसके साथ पिताजी यानी तुम्हारे दादाजी की यादें जुड़ी हैं ।आज बच्चों के साथ फिर मैने नये पौधों को रोपित किया और बच्चों के साथ उन पौधों का अपनापन का भाव लिये घर आया ।

आलोक त्रिपाठी 
इन्दौर मप्र 9425069983
अप्रकाशित मौलिक स्वरचित

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