मेरे अजी़ज़
मेरे अज़ीज़
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वो छत पे जब खड़ी होकर इशारे मुझको करती है
किताबें हाथ में लेकर घुमाकर मुझसे कहती है
हमारे घर चले आना जनम दिन आज मेरा है
वो दिलवर है मेरी साँसों में अब हर पल हि रहती है।
कइ दिन हो गये दिखती नही क्या बात है जानें
खबर कुछ चल नही पाती भला अब कैसे हम जानें
मेरे खत का इशारा वो समझ पाइ नही लगता
उसी की याद में अब लिख रहा हूँ अपने अफसाने।
नज़र मेरी उसी को देखती रहती है रस्ते में
बनाकर प्रेम के गीतों को रखता हूँ मैं बस्ते में
समय तो हो गया जानें कहाँ वो रूक गइ होगी
बड़ी नादान है दिल ले गयी मेरा वो सस्ते में।
किताबों में छुपाकर खत रखा है कल हि लिख करके
मेरा दिल ले गइ थी वो ज़रा सी मुझको दिख करके
मैं कितना बावरा सा हो गया हूँ याद में उसकी
किसी शायर की प्यारी शायरी आया हूँ सिखकरके
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आलोक रंजन
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