महबूबा
महबूबा
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वो सिर्फ मेरे दिल में बसा हुआ था
उसे तो बस पल का नशा हुआ था
मेरे नज़दीक वो खुद आकर बैठा
मैंने एक बार हि उसको छुआ था
मुहब्बत के बरबाद लम्हें याद हैं मुझे
ज़िंदगी का वो भी कैसा जु़वा था
नज़र कहाँ कहाँ तलाशती रही उसे
मगर रास्ते में बस धुवाँ धुवाँ था
ज़वाँ दिलों का हश्र ऐसा भी होता है
एक तरफ खाइ एक तरफ कुवाँ था
दुवायें हैं कि ख्वाब पूरे हो तेरे रंजन
खुश रहे वो तेरा जो महबुबा था
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आलोक रंजन
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