जागृति पुनः चिंतन
जागृति पुनः चिन्तन
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नज़र में हो धोखा अगर दोस्ती में
तो फिर दोस्ती ये कहां तक चलेगी
समझ जाइये ये बनावट की बातें
किसी दिन बुरी जाल साजी करेगी
नज़र में,,,,,,,
मुहब्बत में उनको पता भी न चलता
के महबूब बनकर सुबह शाम रहता
खयालों में जिनके गुजारी हैं रातें
इन्हीं के हि हाथों से एक दिन जलेगी
नज़र में,,,,,,,
ये मासूम चेहरे बनाकर हैं रहते
बहुत साफगोइ है बातों से दिखते
अमीरों की तरहा बना शान शौकत
सराफत की चादर से खुद हैं ढंकते
बनाकर करके महबूब जालों में लेते
कि वो उम्र भर हाथ यूँ हि मिलेगी
नज़र में,,,,,,,,
ज़रा हालते गम इन्हें देखिये अब
ये सब कुछलुटाकर न जीतो न मरते
ज़माने में कोइ नही है सहारा
ये बस अपनें कर्मों पे यूँ आह भरते
जो दहलीज घर की बहक लाँघते हैं
उन्हें उनकी रूहें न माफी करेगी
नज़र,,,,,,
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आलोक रंजन
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