तुम मेरे गीतों में आते ७०
[8/21, 9:00 PM] आलोक त्रिपाठी: प्रायश्चित्तं
🌺🌿🌺🌿🌺
ये जीवन है उड़नखटोला
जाने कब उड़ जायेगा
तेरा नाता परम पिता से
इक क्षण में जुड़ जायेगा
ये जीवन,,,,,,,
तुमने कितने कर्म किये हैं
तुमको बतलाना होगा
प्रभु समक्ष अपनी चतुराई
से दूरी रहना होगा
वो है अंतर्यामी जग का
भेद सभी खुल जायेगा
ये जीवन है,,,,,,
जन्मों से अपने मन की
यूँ हि करते आये हो
दुख में किसी मनुज को बोलो
क्या सहाय बन पाये हो
तेरा तुझको प्रभु देता है
करम तेरा तुल जायेगा
जीवन है,,,,,,
अब संकल्प करो तनमन से
शुभता की शुरुवात करोगे
जिससे कोइ दुख पाता है
क्या तुम ऐसी बात करोगे
दुख देने से दुख मिलता है
सुख से सुख मिल जायेगा
जीवन है,,,,,,
प्रतिबंधों में मन को कर लो
बहक बहक मत जाना तुम
गर्भ में जैसे सच्चे मन थे
वैसे हि बन जाना तुम
रंजन तेरा भवबंधन से
सब बंधन छुट जायेगा
जीवन है,,,,
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आलोक रंजन
[8/22, 12:15 AM] आलोक त्रिपाठी: तुम मेरे गीतों में आते
शायद हम तुमको लिख पाते
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कैसे करें प्रतिक्षा उसकी
उल्टी पुल्टी दिक्षा उसकी
जाने कब क्या कह जायेगा
होगी नही समीक्षा उसकी
आदत से मजबूर बहुत है
सब मिलकर कितना समझाते
तुम मेरे,,,
माँ का आदर कर न सकेगा
सच्चाइ पर चल न सकेगा
दुर्ब्यसनों में फँसा हुआ है
इससे कभी उबर न सकेगा
इश्वर की सौगंध न माने
कितना कोइ जोर लगाते
तुम मेरे,,,,,
जीवन नरक बना डाला है
ऐसा पागल मतवाला है
मर्यादा को मोड़ रहा है
अपना घर हि तोड़ रहा है
जाने किन कर्मों के कारण
ऐसे लोग मनुज बन जाते
तुम मेरे,,,,,,
पापों का प्रायश्चित्त करता
जीवन ये सुब्यवस्थित करता
कहना मान बड़ों का रहता
पुण्यों को कुछ संचित करता
जनम मिला मानव का फिर भी
मानवता को आँख दिखाते
तुम मेरे,,,,,
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आलोक रंजन
[8/22, 9:11 AM] आलोक त्रिपाठी: तुम मेरे गीतों में आते
शायद हम तुमको लिख पाते
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गणपति विघ्न निवारन करना
जीवन की सब बाधाओं का
निशदिन पूरण करते रहना
हम सब सबकी आशाओं का
इसी लिये हर वर्ष तुम्हारी
मूरत स्थापित करवाते
तुम मेरे,,,,,,,,
गौरी पुत्र विघ्न हरते हो
लड्डू से तुम खुश रहते हो
देव दयालु कृपा करना अब
प्रथम पुज्य हरपल रहते हो
उत्सव की तैयारी तेरी
षोडस पूजन हम कर जाते
तुम मेरे,,,,,,
नैमित्तिक दिनचर्या में तुम
स्मृति हृदय विराजे हो
मिट्टी की मूरति ले आये
तुम तो प्यारे लागे हो
बरबस मन खिंच जाता मेरा
तुझसे प्रेम समर्पित नाते
तुम मेरे,,,,,
अवगुन सब कर देना मेरा
नष्ट प्रभू ऐसी मति देना
मेरे जीवन की नइया को
प्यारी सी कोइ गति देना
रंजन सुखदायक गणनायक
शिव गौरी के लाल कहाते
तुम मेरे,,,,,,
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आलोक रंजन
[8/22, 9:37 AM] आलोक त्रिपाठी: तुम मेरे गीतों में आते
शायद हम तुमको लिख पाते
🌹🌹🌹🌹🌹🌹
वाणी का संबोधन लिखते
चेहरे का संकोचन भी
कदमों की आहट लिख जाते
और हँसी के रोचन भी
विंदी तेरी चमक रही है
चाँद जानकर हम सुख पाते
तुम मेरे,,,,,
बाहों की कोमलता लिखते
पतली कमर लचकती भी
नागिन सी लहराती चालें
मेरी ओर बहकती भी
मोकह रूप दृष्टि से बेसुध
हम तेरे सम्मुख आ जाते
तुम मेरे,,,,,
चन्द्रबदन की किरणें लिखते
बोझिल सी रूसवाइ भी
मन में चलती धारा लिखते
प्रेम रसिक पुरवाइ भी
आँखों का अंजन लिखकरके
तेरे नैनों मे बस जाते
तुम मेरे,,,,,
मन को खींच रहा यौवन येे
कैसे हम इंकार करेगे
तुमको हृदय विराजित करके
अपना स्वप्न साकार करूँगे
तुम मेरी हो स्नेहिल रचना
तुमको हृदयंगम कर जाते
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तुम मेरे,,,,
, आलोक रंजन
[8/23, 1:13 AM] आलोक त्रिपाठी: नूर
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पुरवाइ की ठंढ़ी लहरें
बनकर तुम आती रहती हो
मेरे लिखे गीत तुम मन में
हर पल हि गाती रहती हो
गीतों से मेरे तेरा है
कितने जन्मों के ये नाते
तुम मेरे,,,,,,
शंध्या का है प्रहर निराला
चंदा है अब आने वाला
सँवर भी जाओ अभिनंदन में
वो है तेरा चाहने वाला
रुक रुक कर निहारती जाना
जैसे हम तुमको निहारते
तुम मेरे,,,,,
पंक्षी है पिजरे के अंदर
सब कुछ देख रहा है तेरा
तू मतवाली भूल न जाना
प्रेम नगर का मेरा डेरा
ना ना करके तुम तो मेरे
दिल के और करीब आ जाते
तुम मेरे,,,,,
मन दुविधा में आज पड़ा है
ऊपर वाला कितना बड़ा है
जिसने मेरी तकदीरों में
तेरे जैसा नूर जड़ा है
तू शहजादी मेरी होकर
मुझको शहजादा बनवाते
तुम मेरे,,,,
आलोक रंजन
[8/23, 8:13 AM] आलोक त्रिपाठी: समर्पण
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धीर वीर गम्भीर गजानन
मेरा तुम उद्धार करोगे
मन की मेरी इच्छाओं को
पूरन तुम हर बार करोगे
सुबह शाम तेरे बंदन को
सारे कामों को ठुकराते
तुम मेरे,,,,,,
प्रिय मोदक लम्बोदर प्रिय हो
गौरी के तुम रहते हिय हो
जगत ब्याप्त सारी बिपदायें
नष्ट करो तुम एक अमिय हो
बीमारी लाचारी फैली
इसको जड़ से आज हटाते
तुम मेरे,,,,,,
ताप हरो संताप मिटाओ
हे गणपति तुम जगत हँसाओ
जन जन करें तुम्हारा वंदन
भय को मेरे दूर भगाओ
देव दनुज सब देख रहे हैं
हम मानव तो क्या कर पाते
तुम मेरे,,,,,
तेरे अवलम्बन से मेरा
अब तक सारे काम बना है
मुझको क्षमा हमेशा करना
मुझमें तो एक लड़कपना है
मेरे सिर पर कर तुम धरना
चरण तेरे मिल जाये हमको
नतमस्तक हम भी हो जाते
तुम मेरे,,,,,
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आलोक रंजन
[8/23, 1:28 PM] आलोक त्रिपाठी: इंतज़ार
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तुम इतनी मासूम कली हो
बात मुझे मालूम न थी
तुझसे पहले मेरी रातें
इतनी भी रंगीन न थी
तेरी यादों के पलनें में
हम दिल को झूला झुलवाते
तुम मेरे,,,,,,
प्रहर प्रहर है वर्षों जैसा
कैसे काटूँ सूनी राहें
तेरा साथ मुझे मिल जाये
चौकन्नी हो जायें निगाहें
मंजिल मेरी बहुत दूर है
सोच सोचकर हम घबराते
तुम मेरे,,,,,,
सजल नयन हो जाते मेरे
जब आँखों मे तुम आते हो
साहिल मेरे सरगम मेरे
गीतों तुम बस जाते हो
फुरसत हो तो आ भी जाना
राहों में नयना बिछ जाते
तुम मेरे,,,,,
सुघर अधर प्रेमामृत लाना
हम भी उसका पान करेंगे
उस अमृत को पीकर हम तो
जनम जनम तेरे सग रहेंगे
स्वागत है तेरे आने का
आने में क्यों देर लगाते
तुम मेरे,,,,,
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आलोक रंजन
[8/23, 4:15 PM] आलोक त्रिपाठी: माँ
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वक़्त बिखरा गया जिन मोतियों को
उन्हे फिर से पिरोना चाहता हूँ
अब अपने ही दिल की रहगुजर में
कोई खाली सा कोना चाहता हूँ
माँ तेरी हर शिकायत को मैं करता हूँ कूबूल
तेरे पैरों में सिर रखकर रोना चाहता हूँ
तू है तो गम से लड़ने की हिम्मत है मुझे
जिंदगी खोकर तुझे न खोना चाहता हूँ
बदनसीबी उनकी है जो माँ से दूर हैं
माँ के लिये जिन्दगी फिर से बोना चाहता हूँ
माँ की हर नीयत में है मेरे दर्द का इलाज
माँ के हर दर्द में मै खुद को डुबोना चाहता हूँ
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आलोक रंजन
[8/23, 7:45 PM] आलोक त्रिपाठी: घटा
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तुम बादल की काली घटा हो
अद्भुत प्यारी एक छटा हो
और तुम्हें क्या उपमा दे दूँ
तुम तो मेरी स्नेहलता हो
गगन में छा जाती हो तुम जब
बादल फिर जल बरसा जाते
तुम मेरे,,,,,,,
काली है घनघोर अँधेरी
लहराती सी जुल्फें तेरी
अंग अंग का तेरा जलवा
मतवाली सी मस्त घनेरी
बरसा देती हो धरती पर
अपनी प्यारी प्यारी बातें
तुम मेरे,,,,
,
पुलक पुलक मैं भीग रहा हूँ
प्रेम लगन मैं सीख रहा हूँ
तेरा ये सानिध्य मिला जो
मैं भी अनुपम दीख रहा हूँ
बदरी बनकर तुम छाये हो
हम तुझ पर ये नज़र टिकाते
तुम मेरे,,,,
तेरा साथ सुहावन लगता
मुझको पावन पावन लगता
मस्ती सी छा जाती दिल पर
प्यारा प्यारा सावन लगता
बरसो बरसो बरस बरसके
जब तक पूरे हम भिग जाते
तुम मेरे,,,,,
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आलोक रंजन
[8/23, 10:39 PM] आलोक त्रिपाठी: नवजीवन
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तेरे रूप सुधा का मैंने
पहले भी कुछ पान किया था
तेरे चाँदनीयुत अंगों का
पहले भी गुणगान किया है
तब न पता था तुम हो मेरे
अब तक क्यों प्यासे रह जाते
तुम मेरे,,,,,,
आत्मसात मैं कर लेता हूँ
तेरे तन की किरणों को
चमक मुझे भी मिल जाती है
मन के सारे जीर्णों को
नवजीवन मिल जाता मुझको
स्फूर्ति तेज से हम भर जाते
तुम मेरे,,,,,
कितना भी भारी मन होता
नित जीवन के झंझाटों से
बच जाता हूँ प्रभू कृपा से
जैसे तैसे काँटों से
सहगामिनी तेरी पुण्यों से
हम भी पुण्यार्जित कर पाते
तुम मेरे,,,,,
तनमन तुझको अर्पित करता
मैं जीवन के हर पहलू भी
अंगीकार मुझे कर लेना
तेरे संग मैं बह लूँ भी
अविरल बहता रहे प्रेम रस
हम दोनों पीते न अघाते
तुम मेरे,,,,,
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आलोक रंजन
[8/24, 1:05 AM] आलोक त्रिपाठी: प्रियतमे
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भावों से पुष्पित सामग्री
लेकर भेंट चढा़ जाना
मेरा घर है मंदिर जैसा
सीधे सीधे सीधे आ जाना
मेरा घर,,,,,
जल्दी आज निकलना घर से
सीधे सादे पहनावे में
दृढ़ संकल्प साथ में रखना
मत आना बहकावे में
रस्ते में चौराहा होगा
उस पर दृष्टि जमा जाना
मेरा घर,,,,,,,
स्वागत करती बाग मिलेगी
खुश्बू कुछ बरसा देगी
तेरे अन्तर्मन में फिर से
प्रेम की ज्योत जगा देगी
मोकह महका तन लेकर तुम
अपने कदम बढ़ा जाना
मेरा घर है,,,,,,
गीत मेरे गुन गाते होंगे
तेरे रूप सुवासित का
भँवरा अपनी धुन में होगा
मकरंदों का प्यासित सा
वाणी का सौन्दर्य बताकर
उनको कुछ समझा जाना
मेरा घर है,,,,,
सूना सूना देख रहा है
कबसे तेरा प्रेमास्पद
कितनी हुइ प्रतिक्षा तेरी
आज हुआ मन ये गद गद
एकाकी जीवन है प्यासा
मन की त्रास बुझा जाना
मेरा घर,,,,,,,
तेरे आने से ये मधुबन
हरा भरा हो जायेगा
प्यारे तेरे संग मेरा तो
जीवन प्यारा हो जायेगा
मेर लिये समर्पित हो तुम
बस इतना बतला जाना
मेरा घर,,,,,,,
🌺🌺🌺🌺
आलोक रंजन
[8/24, 1:08 AM] आलोक त्रिपाठी: आदर्श राम
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राम मेरी आन हैं औ राम मेरी शान हैं
कंठ में घुले हुये स्वरों में मेरे राम हैं
थक न जाऊं राह में वो देखते हैं गौर से
भेजते हैं शक्ति मुझे वो तो अपनी ओर से
कंठ लड़खडा़ये न जाये बंद हो न ये जुबां
इसलिये स्वरों में सदा गूंजता ये नाम हैं
राम मेरी,,,,,,,,,,,,
संस्कृति का मोल कौन दूसरा बतायेगा
राम के बिना तो यहां कौन पूजा जायेगा
स्वल्प साधनों से कैसे कार्य हो महान सुनो
राम की महानता न कौन गुनगुनायेगा
बैरियों को अंत समय दे दिये हैं मोक्ष धाम
ऐसे बीर कृपा सिधु करूणा निधान हैं
राम मेरी,,,,,,,,,,
देश ये पुकारता धरा सनाथ राम से
धर्म है जिवंत सदा राम के हि काम से
कर्म की उपासना की प्रेरणा मिली सदा
भावना चरित्र की पवित्र सदा राम से
जगत का प्रपंच मिटे राम की उपासना से
करके सारे कर्म सदा ये बने अकाम हैं
राम मेरी,,,,,,,,,,
भाव जगत भूल जाये राम की कृपा जो होय
कष्ट कटे दुख मिटे संत सभी गाते हैं
बेसहारों कों सदा गले लगाते मेरे
वेद और पुराण यही सर्वदा सुनाते हैं
गर्व है सनातनी परंपरा के मूलरूप
भारतीयता की एक राम हि पहचान हैं
आलोकजी शास्त्री इन्दौर 9425069983
[8/24, 1:09 AM] आलोक त्रिपाठी: वह मृगनयनी
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पानी का घट सिर पर चलती इठलाकर
आंचल पवन हिलोरे थोड़ी सी शरमाकर
नयनों के तिरछे वाणों से पड़ती दृष्टी
घायल कर देती है वो मृगनयनी आकर
पायल की छनछन सी लगती मधुर तरंगे
विस्मित होकर श्रवण रन्ध्र स्तब्धित हू मै
विरह अग्नि की ज्वाला जलती है मन में
ब्रम्हचर्य में विघ्न हुआ अचंभित हू मैं
यौवन सी छलकाती मुर्छित कर देती है
नई नवीन उमंगें मन में भर देती है
बिह्वल सा में तृप्त हो रहा रूप सुधा से
हृदय कुंज में चंचलता ये भर देती है
सोच रहा हूं इस सरिता में बह जाऊ मै
निर्मल होकर प्रेम रंग में रंग जाऊं मैं
अंबर से कुछ किरणें उसको देकरके
हृदय पटल पर अंकित उसको कर पांऊ मैं
प्रेम सहज जीवन का ये उद्गार है
मेरा प्रेम पवन सा बहता हार है
मधुर गीत का उद्भव अद्भुत बेला है ये
प्रेम हि मेरे जीवन का बस सार है
आलोकजी शास्त्री इन्दौर 9425069983
[8/24, 1:09 AM] आलोक त्रिपाठी: गज़ल नुरानी
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
वो मुलाकात हम न भूलेंगे
जिससे चेहरे पे ये रवानी है
उनका गम हमको रूला देता है
चाहतों की ये मेहरबानी है
वो मुलाकात,,,,,,,,
जख्म कोइ मिले मगर अब तो
हमनें इंशानियत की ठानी है
वो मुलाकात,,,,,,,,
वो बहक जाते हैं नशे की तरह
आदतें उनकी खानदानी है
वो मुलातात,,,,,
देर तक कब खुशी संभलती है
इसकी सेहत तो आनी जानी है
वो मुलाकात,,,,,,
दुश्मनों तुमको मुबारक महफिल
ये मेरी तुमपे मेहरबानी है
वो मुलाकात,,,,
बाद मरने के कौन मरता है
जिंदगी की यही कहानी है
वो मुलाकात,,,,,,,
इश्क करके हुआ न कौन तबाह
आशिकों नें ये बात मानी है
वो मुलाकात,,,,,,,
नज्म पढ़कर न जो संभलते हैं
नज्म के साथ बेइमानी है
वो मुलातात,,,,,
जिंदगी हम भी जीते हैं आलोक
देख लो चेहरा ये नुरानी है
वो मुलाकात,,,,,,,,
आलोक रंजन शास्त्री इन्दौर 9425069983
[8/24, 1:11 AM] आलोक त्रिपाठी: हरियाली साजन
🌹🌹🌹🌹🌹✍️✍️✍️✍️✍️
हरियाली साजन आ जाओ
कजरी गीत सुनाती तुमको
मेरे मन को अब न सताओ
मेरी प्रीत बुलाती तुमको
हरियाली,,,,,
आमों की डाली पर कोयल
कुहु कुहु की रटन लगाये
जैसे चातक पीर जताकर
चंदा को मुखड़ा दिखलाये
ब्याकुल मन उत्कंठित होकर
चिट्ठी मे लिखवाती तुमको
हरियाली,,,,,,,
धरती प्यासी प्यासी हैये
अम्बर की बूंदे बरषा दो
अलसाये मुरझाये मन में
अपना प्यारा रंग बिखरा दो
बाट निहारूं तेरी मैं तो
फोटो देख भुलाती तुमको
हरियाली,,,,,,,,
अनजानी सी आहट पाकर
हृदय पटल घबरा जाता है
तेरी तस्बीरों को देखूं
चेहरा दिल पर छा जाता है
सेज सजाकर रोज शाम को
बाहों, में भर जाती तुमको
हरियाली साजन आ जाओ
कजरी गीत सुनाती तुमको
आलोक रंजन शास्त्री इन्दौर
⭐⭐⭐⭐⭐⭐⭐
[8/24, 1:11 AM] आलोक त्रिपाठी: मेरे मोहन सांवरे,,,, ✍️✍️
🌹🌹🌹🌹🌹
फिर से अब बंशी बजा दो मेरे मोहन सांवरे
ताप इस तन का मिटा दो मेरे मोहन सांवरे
हो गया अब आपका जाउं तो अब जाऊं कहां
तेरी चौखट पर पड़ा हूं देख अओ यहां
अपने चरणों से लगा लो मेरे मोहन सांवरे
फिर से अब,,,,,,,,,,,
दुनियां है बेदर्द कितनी दे गइ धोखा मुझे
भक्ति राहों मे कितनी बार रोका है मुझे
मेरे जीवन को सजा दो मेरे मोहन सांवरे
फिर से अब,,,,,,,
गोपियां हैं ढूढ़ती तुमको रहती फिरती यहां
आंख से आंसू बहाकर करती हैं बिनती यहां
हमको भी अपना बना लो मेरे मोहन सावरे
फिर से अब,,,,,,
करते हैं आलोक सजदा गीत लिखकर प्यार से
जुड़ गये हैं मेरे स्वर तेरे मधुर आधार से
सांवली सूरत दिखा दो मेरे मोहन सांवरे
फिर से अब,,,,,,
आलोक रंजन शास्त्री इन्दौर
⭐⭐⭐⭐⭐⭐⭐⭐
[8/24, 1:12 AM] आलोक त्रिपाठी: सरस्वती वंदना
🌹🌹🌹🌹
ग्यान दो मां शारदे अभिमान को हर लो।
सत्य करुणा प्रेम और अनुराग से भर दो।।
हम रहें शुचिता सरसता भाव में।
मातृभूमी पर समर्पित चाह में।।
मन को अब संवेदना की धार से भर दो।।
ग्यान दो मां,,,,,,
कुटिलता और द्वेष से हम दूर हों
।
देश हित में नित रहें और शूर हों
।।
शक्ति के संपात की बौछार अब कर दो।।
ग्यान दो मां,,,,,,
सहजता से हम बढ़ें शिक्षा के ऊंचे शिखर तक।
नित्य साहस धैर्य से आगे चलें हम अनवरत।।
दृष्टि से अपनी हमें अब पूर्ण भी कर दो।।
ग्यान दो मां,,,,,,,,,,
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
आलोक रंजन शास्त्री इन्दौर 9425069983
[8/24, 1:12 AM] आलोक त्रिपाठी: प्यारा भारत
🌹🌹🌹🌹
आलोकित हो भारत फिर से दुनियां की तस्बीरों में
दुश्मन थर थर कांपे बंधकर जेलों की जंजीरों में
देश की गरिमा लालायित है भारत मां के प्यारों से
करें विभूिषित हम सरहद पर लड़नें वाले तारों का
भारत का हर एक सिपाही दिखता है शमसीरों में
आलोकित हो,,,,,,,,
देश प्रेम पर मिटने वाले इस धरती के लाल है जो
नमन उन्हें जो दुश्मन खातिर बनते रहते काल हैं जो
बिजली सी शक्ति हमारे सब भारत के बीरों में
आलोकित हो,,,,,,,,,
जो भी हमको आंख दिखायेगा मिट्टी मिल जायेगा
रणबांकुरे खड़े हैं शरहद अब इनसे हिल जायेगा
सहस शौर्य बना रहता हैं इनके सदा जमीरों में
अलोकित है,,,,,,
अपने सैनिक बीर वहा ज्वाला बनकर लड़ जाते हैं
मरते मरते कितने दुश्मन को ऊपर पहुचाते हैं
आंख गड़ाये रहते हैं नित सरहद की लकीरों में
आलोकित हो,,,,,,
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
आलोक रंजन शास्त्री इन्दौर 9425069983
[8/24, 1:13 AM] आलोक त्रिपाठी: मेरे प्यारे राम३
🌹🌹🌹🌹🌹
सितारे भी उतर आये अयोध्या आज नगरी में
मेघ जल हंसके बरसाये अयोध्या आज नगरी में
पवन चंवरें डुलाती प्रभु चरण की आज सेवा में
अयोध्यानाथ जब आये अयोध्या आज नगरी में।।
फिजायें हो गइ रंगी हंसे गुलशन की कलियां भी
खुशी से झूमते हैं सब देखकर रंगरलियां भी
मेरे श्रीराम का मंदिर हुआ आरंभ अब देखो
बड़ी रंगीन सी दिखती अयोध्या की ये गलियां भी
नमन उनको जो मंदिर केलिये प्राणों को वारे हैं
रहेगे हर समय जिंदा दिलों में वो हमारे हैं
प्रभू श्रीराम के प्यारे दुलारों में रहेगा नाम
सभी हिंदू हृदय को वो सदा प्राणों से प्यारे हैं
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
आलोक रंजन शास्त्री इन्दौर 9425069983
[8/24, 1:13 AM] आलोक त्रिपाठी: मेरे कान्हा
🌹🌹🌹🌹
नजर कर दो मेरे कान्हा मेरा जीवन सुधर जाये
तुम्हारी मेहरबानी की कोइ ऐसी लहर आये।।
झुका हूं तेरी चौखट पर जरा पलकें उठाओ तो,,,,, जरा पलकें उठाओ तो
मेरी झोली कृपा कर दो नइ खुशियों से भर जाये।।
ठोकरें बहुत खाया है जमाने में भटक करके
जमाने में भटक करके,,,,
लगा लो अब शरण तकदीर ये अपनी संवर जाये।।
मेरी मजबूरियों को इस जहां ने हंसके टाला है,,,, जहां ने हंस के टाला है
तेरे चरणों में आने का प्रभू अब तो असर आये।।
सुना है भक्त पर तेरी इनायत बरसती रहती
इनायत बरसती रहती,,,,,,
तेरे दर पे पड़ा रंजन हृदय के फूल बरसाये
नजर कर दो,,,,,,,,
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
आलोक रंजन शास्त्री इन्दौर 9425069983
[8/24, 1:14 AM] आलोक त्रिपाठी: तारो मेरे श्याम
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प्रभू इतना जरा कह दो तुम्हारा हो गया हू मैं।
तुम्हारी देखकर सूरत उसी में खो गया हूं मैं
प्रभू इतना,,,,,,,
कइ जन्मों की है चाहत इसे खुश्बू जरा दे दो
इसे खुश्बू जरा दे दो,,,,,
हृदय में में नाम की माला सजाकर रो गया हूं मैं
प्रभू इतना,,,,,,,
सुना है किस्मतों का द्वार तेरे दर पे खुलता है
कि तेरे दर पे खुलता है,,,,,,,
तेरे चौखट को अब आंसू से देखो धो गया हूं
प्रभू कह दो,,,,,,,
मेरी नादानियां इतनी काबिले माफ क्या होगी
काबिले माफ क्या होगी,,,,,,
तेरे चरणों में सर रखकरके रंजन सो गया हू मैं
प्रभू इतना,,,,,
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आलोक रंजन शास्त्री इन्दौर 9425069983
[8/24, 1:15 AM] आलोक त्रिपाठी: मेरी कल्पना मेरा सच
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कल्पना की लेखनी बैठा हू लेकर हाथ में
खो रही अपनी उड़ानें भावना के साथ में
डूबकर इतरा रहा हू देखिये हर पल यहां
रोके हंसता जा रहा हू दिन हो या कि रात में
जाने कैसी राह से ये जाती गुजर ये लेखनी
कोइ ऐसी गुफ्तगू यादों को बहकानें लगी
हो गया भंवरे सदृश मैं डोलता फिरता रहा
आरजूए इश्क मुझको आज फुसलाने लगी
बंदगी दुनियां में ऐसे नफरतों को डांटती
अपनी कुछ संजीदगी ने मेरा हर दम साथ दी
दुश्मनों ने बस हमारी नेकियत पहचान कर
सामनें आकर हमारे प्यार से कुछ दाद दी
हम सफर बनके जो दिल की ये जुबां समझाकरे
गल्तियों को भूलकर सच्ची सलाह दिया करे
गल्तियों का पुतला है इंशान हो जाती कभी
बैठकर आपस में अपनी गल्तियां साझा करे
जिंदगी की डोर है नाजुक किसी भी मोड़ पर
कब जायेगे हम गुलशन का दामन छोड़कर
बस मुहब्बत से जियें ये जब तलक है जिंदगी
खुश नही होना कभी रंजन दिलों को तोड़कर
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
आलोक रंजन शास्त्री इन्दौर 9425069983
[8/24, 1:15 AM] आलोक त्रिपाठी: मन की कलम से
❤️❤️❤️❤️❤️
हो इशारा गर तेरा तो दिल को बहलाया करूगा
तेरी नजरों के इशारों पर मै मड़राया करूगा
दिल्लगी की बात है तुझसे कहू जाने जिगर
रोज ड्यूटी से उतरकर तेरे घर आया करूगा
हो इशारा गर,,,,,,
घर में बापू हों तो मुझको तुम इशारों, में बताना
छत पे आकर चोटियों को हाथ मे लेकर घुमा ना
देखकर खतरा समझ मै लौटकर आया करूगा हो इशारा गर,,,,
मिलने की जब ललक हो तो कैसे मन को मै संभालू
चाहता है दिल मेरा अपना तुम्हें हमदम बना लूं
कब तलक इस फोन पर तुमसे यूं बतिआया करूगा
हो इशारा गर तेरा,,,,,
तू छबीली मस्त मै भी मस्त भंवरा बन गया हू
देख यौवन की लहर में जाने कैसे बह गया हू
तू बने लैला मेरी मै मजनू बन जाया करूगा
हो इशार गर तेरा,,,,,,,
इश्क है तो खौफ क्या खुलकर दिलों की बात कह
सामने सबके मुहब्बत की वजा बेदाग कह
क्या कहें रंजन तुम्हें हर बार समझाया करूगा
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आलोक रंजन शास्त्री इन्दौर 9425069983
[8/24, 1:16 AM] आलोक त्रिपाठी: शब्द
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शब्द हि हंसाये और शब्द हि रूलाये यहां
शब्द शब्द से हि कोइ गीत बन जाती है
शब्द करता है नये रिस्तों की शुरुवात
शब्द से हि प्रेम और प्रीत बन जाती है
शब्द ब्यवहार को बनाता है बिगाड़ता है
शब्द का प्रभाव सारे जग से निराला है
शब्द जो निकलते हैं मुख से दुखों,में डूब
पता चलता है कोइ दिल दुखा डाला है
शब्द सार शब्द हार करता दिलों में राज
शब्द दोश्त दुश्मनी का भेद बतलाता है
शब्द की है महिमा अनंत ब्रम्हांड गाये
शब्द मंत्र बनके देवों को भी रिझाता है
शब्द रीत शब्द प्रीत शब्द हि कराये जीत
शब्द हार की कगार पे भी पहुचाता है
शब्द देव शब्द ब्रम्ह अखिल भुवन मे़ भी
गूंजकर सृष्टि शक्ति सबको बताता है
शब्द प्रेम शब्द नेम शब्द पहचान सदा
अपनों में गैरों में दिवार बन जाता है
शब्द का प्रयोग सही समय पे होवे यदि
शब्द हि गले का प्यारा हार बन जाता है
शब्द मोल तोल के हमेशा बोलना है ठीक
जिंन्दगी ये रंजन बहार बन जायेगी
शब्द शब्द शब्द से भी शब्द निकल जाता है
अर्थ की अनर्थ सृजनहार बन जायेगी
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आलोक रंजन शास्त्री इन्दौर
[8/24, 1:16 AM] आलोक त्रिपाठी: बहार ढूढ़ते रहे
🍀🍀🍀🍀
वाटिका में कांट के बहार ढूंढ़ते रहे
उम्र बीतती रही हम प्यार ढूंढ़ते रहे
जिंदगी कहां कहां तुम्हें जहां में हर जगह
चाहतों के अश्व पर सवार ढूंढ़ते रहे
हर सुबह उमंग सूर्य मुझको भेजता रहा
मैं खड़ा दिशाओं में स्तब्ध देखता रहा
भूल भी होती रही कदम बढ़ाऊ ज्योहि मैं
हलचलों को दिल में बार बार देखता रहा
आरजू के मौज पर अंगार ढू़ंढ़ते रहे
वाटिका में,,,,,,,,,
लोरियां सुनाके कोइ मुझको सुलाता रहा
गम के बेशुमार पल में खुद को भुलाता रहा
मर्ज का पता न था दवाइयां तो ली बहुत
आग से हि आग को मै कबसे बुझाता रहा
बैठकर किनारे मझढार ढूढ़ते रहे
वाटिका मे कांट,,,,,,,
रिस्तों की बजार में आवाज कौन सुन रहा
किस तरफ मैं जाऊं एक राह आज चुन रहा
बंदिशों का दौर है खुलकर न बोल पा रहा
दिल की ये तरंग दिल में लेके देखो गुन रहा
पत्थरों के सांचे में साकार ढूढते रहे
वाटिका में कांटों,,,,,,
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अलोक रंजन शास्त्री इन्दौर
[8/24, 1:16 AM] आलोक त्रिपाठी: स्वप्न
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पंछियों को देखा आज कितनी ये मचल रही
रंग भरे पंख लेके आसमां में चल रही
मस्तियां मनायें हौशलों की ये उड़ान है
आ रही हैं घोसलों में देखो शाम ढल रही
पंछियों में चेतना अपार ढूंढते रहे,,,,,
वाटिका में,,,,,,,,,,
सत्य की डगर पे ख्वाहिशें है चलता जाऊं मैं
सत्य के दिये सदा लिये हि मुस्कराऊ मै़
दुख हो या सुख हो बढूं निडर सा राह में
फिर कभी मनुष्यता को अब न भूल पाऊं मैं
पथ में रात दिन यही विचार ढूढते रहे
वाटिका में,,,,,
पाप पुन्य कर्म का हिसाब कौन कर रहा
होके मस्त हर कोइ बुराइयों में पल रहा
कबसे जिंदगी न जाने ले रही है करवटे
वासना की आग में हर एक यहां जल रहा
वासना के राग में विराग ढूढके रहे
वाटिका में कांट,,,,,,,
जंग जिंदगी की होगी सोचता हू अब खतम
पालता रहा यही दिलों एक हि बहम
बंद आंख करके राह में मै देखता रहा
हो गइ थी भोर स्वप्न हो, गये मेरे खतम
वादियों, में स्वप्न की कतार ढूढते रहे
वाटिका में कांट,,,,,,
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आलोक रंजन शास्त्री इन्दौर
[8/24, 1:17 AM] आलोक त्रिपाठी: मेरे श्याम
🍀🍀🍀
मन मोहन छलिया नटनागर हम भी तेरे तेरे दिवाने हैं
आये हैं शरण तेरी देखो जैसे कोइ परवाने हैं
दुख दर्द मिटाने वाले हो तुम दुनियां के रखवाले हो
एक आस तुम्हारे चरणों की इस दुनियां से बेगाने हैं
मनमोहन,,,,,,,,,,,
प्रभु हमने जन्म गंवाये हैं कितने तुझसे होकरके दूर
मुझ पातक पर दृष्टी कर दो भक्ती से हम अनजानें हैं
मनमोहन,,,,,,
मझधार में नइया मेरी है कोइ रस्ता दिखता हि नही
इतना तो बता दो हे प्रिय वर मुझको कितने तड़पानें हैं
मन मोहन,,,,,,,
अफसोस बहुत है कर्मों का जो भूल गया था तुमको हि
रंजन शरणागत चरणों में ये जीवन नित्य बितानें हैं
🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀
आलोक रंजन शास्त्री इन्दौर
[8/24, 1:17 AM] आलोक त्रिपाठी: मेरे मोहन आ जाओ
🍀🍀🍀🍀🍀🍀
तुम्हारे इश्क में हम हो गये पागल मेरे मोहन
नजरों ने दिल को कर दिया घायल मेरे मोहन
सुहानी रात ये है चांदनी महका रही समां
कैसे करे हम अपने जजबात का वयां
वो बंशी धुन दिलों में कर रही हलचल मेरे मोहन
तुम्हारे,,,,,,,
अजब सा हाल है दिल का करार आये नही देखो
कही ऐसा न हो जाये निकल जाये ये दम देखो
तुम्हारी याद में हम खो रहे पल पल मोरे मोहन,,,,,
तुम्हारे,,,,,,,,,,
नशा सा छाया है अब कोइ दवा दे दो खुमारी का
तेरे हि पास है इस मर्ज की मारी बिचारी का
तुम्हें हि देखती हैं आंख में भर जल मेरे मोहन
तुम्हारे,,,,,,,,,,
🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷
आलोक रंजन शास्त्री इन्दौर
[8/24, 1:18 AM] आलोक त्रिपाठी: मेरे गोपाल मै तेरी शरण
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गोपाल तुम्हारी नजरों का एक बार इशारा हो जाये
जीवन की बगिया महक उठे ये ये गुलशन प्यारा हो जाये
सुनते हैं तुम्हारी आंखों में करूणा की बूँद बरसती है
रोते हुये जीवों को तत्क्षण मुस्कान दिलाया करती है
तेरी मूरत दिल में बसती आंखों का तारा हो जाये
गोपाल तुम्हारी,,,,,,,,
इंशान कहां समझे तेरे संसार बनाने की हिकमत
सबको देते रहते हो तुम बिन माँगे तेरी है रहमत
हे देवेश्वर गोपी बल्लभ चरणों का सहारा हो जाये
गोपाल तुम्हारी,,,,,,
साकार तुम्हारी सृष्टी है भव बंधन से छुटने के लिये
मोहित होकर विस्मित इंशा जीता रहता लुटने के लिये
मझधार फंसी मेरी नइया अबआज किनारा हो जाये
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आलोक रंजन शास्त्री इन्दौर
[8/24, 1:18 AM] आलोक त्रिपाठी: बारिश की प्यास
🌷🌷🌷🌷🌷🌷
इस धरा पे प्यास की हुंकार देखता हूँ मैं भावनायें हो रही लाचार देखता हूँ मैं
चमकती हैं बिजलियाँ घरों पे आज रात में
जुगनुओं की रोशनी कौन देख पायेगा
बारिसों के दिन हैं घेर आ रही है बदरियां
लग रहा है बादलों का खेप आज आयेगा
शोर झींगुरों का मचा घर के आस पास में
मेढ़कों की टर्र टर्र हो रही हुलाश में
खेत में फसल भी आज कर रही है मन्नतें
प्यास अब भटक रही है प्यास की तलाश में
इस धरा पे प्यास की हुंकार देखता हूँ मैं
भावनायें हो रही लाचार देखता हूँ मैं
खेत की उदासियाँ बयान कर रही हैं ये
पौध जो लगे हैं वो सूरत बदल रही हैं ये
आसमाँ पे हैं नजर हर एक जीव की यहां
सूर्य की किरण भी आग हि उगल रही हैं ये
दिख रही हैं, राह में निशानियाँ पुकारती
धूल उड़ रहीहै रेत बालुुओं की ताप सी
जल रहे हैं आँसुओं के दीप हर तरफ यहां
बदन झनझना रहे ये चल रही बयार सी
सूखते गले का तलबगार देखता हूँ मैं भावनायें हो रही लाचार देखता हूँ मैं
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आलोक रंजन शास्त्री इन्दौर
[8/24, 1:21 AM] आलोक त्रिपाठी: 🌺🌺
वितृष्णा
,,,,,,,,,
आशायें कितनी बढ़ जायें
मन को अंकुश करना सीखो
राहों में पत्थर मिलते हैं
अपनी राहें गढ़ना सीखो
अशायें,,,,,,
तुम हो पथिक एक तिनका सा
तेज हवा में उड़ मत जाना
कितना भी तूफाँ आ जाये
तूफाँ से तुम जुड़ मत जाना
पग अपना स्थापित करके
तेज हवा में चलना सीखो
आशायें,,,,,,
गगन तुम्हारा स्वागत करता
धरती आश्रय देती है
तेरी साँसें नीलाम्बर तक
निश दिन जीवन देती है
परम पिता के अंश बने हो
उसकी राह पे बढ़ना सीखो
आशायें,,,,,,,
अमृत रस का पान मिलेगा
जीवन में उत्थान मिलेगा
खुशियाँ होगी पग पग तेरे
तुझको सब सम्मान मिलेगा
सच्चे मन से सुबह शाम तुम
इस दुनियाँ में ढलना सीखो
अशायें,,,,,,
तृष्णा की चिंगारी तुमको
विचलित करती रहती है
मोह और माया की रस्सी
तुमको बंधती रहती है
सत्य सदा निश्छल होता है
दीपक बनकर जलना सीखो
आशायें,,,,,,,
🌺🌺
आलोक रंजन
[8/24, 1:22 AM] आलोक त्रिपाठी: प्रियवर
🌺
तुम रूठ न जाना भी प्रियतम
ये हृदय पटल तुझको अर्पित
अविभाज्य तेरा मेरा रिस्ता
कर लो सांसें कितनी अर्जित
तुम रूठ,,,,,
साकार यहाँ तेरा होगा
सपनों का पावन वो आँगन
झूमेंगे नाचेंगे मिलकर
रिमझिम सा होगा ये सावन
मृदु बचनों से हो संसर्गित
तुम रूठ,,,,,,,
मधुबन के कोमल पत्तों से
तेरा श्रृंगार करूँगा मैं
मोहक मुख ओष्ठ कपोलों को
तेरे रसधार करूँगा मैं
तुम मेरी होगी न्यायोचित
तुम रूठ,,,,,,,,
जीवन ये रस बरसायेगा
शीतलता देगा ब्योम तुम्हें
मैं सहज सरल युत होकरके
सौपूँगा ये हर रोम तुम्हें
मत होना तुम अब आशंकित
तुम रूठ,,,,,,,
🌺🌺🌺🌺
आलोक रंजन
[8/24, 1:23 AM] आलोक त्रिपाठी: पुण्यास्मि
🌺🌺
मैं सोच रहा हूँ जीवन में
यश अपयश हि तो मिलता है
जीवन की इस बगिया में तो
बिरला हि कोइ खिलता है
मैं सोच रहा हूँ,,,,,
मानापमान के पीछे हि
उद्वेलित मन हो जाता है
रिश्तों में कटुता आती है
इंशा कितना दुख पाता है
जीवन भर कुछ ट्रुटियों को हि
मन कुंठित होकर सिलता है
मै सोच रहा हूँ,,,,,,,
भृगुटी तन जाती हैं उनकी
थोड़ी सी वाणी के स्वर से
वो जान नही पाते हम सब
जीवित हैं पर हैं नश्वर से
जानें कितनें हृदयंबर में
भरते रहते कुटिलता है
मै सोच रहा हूँ,,,,,,
निर्दोष ब्यसन से होकरके
हम अन्तरयामी को देखें
अपने अर्जित सब कर्मों को
उस परम प्रभू को हि भेटें
जागो निद्रा अब तो तोड़ो
क्यों तन में भरी सिथिलता है
मैं सोच रहा हूँ,,,,,,,
🌺🌺🌺🌺
आलोक रंजन
[8/24, 1:23 AM] आलोक त्रिपाठी: रंजन
🌺🌺
मैं जब भी कविता लिखता हूँ
मेरा मन रंजन होता है
आध्यात्मिक भौतिक ब्यवहारिक
पुट लिखने का कुछ मन होता है
मैं जब ,,,,,
बँधकर शब्दों के टुकडें जब
हो जाते तैयार यहाँ पर
किसी पटल पर इसे भेंटकर
बस इसका मंथन होत है
मैं जब,,,,,,
स्याही कलम हाथ की अँगुली
पट्टी मोबाइल स्क्रीन
नित नव रस से पूर्ण पटल है
दिखती रहती सारी सीन
कट जाते पल पता नही कब
आँखों में अंजन होत है
मैं जब,,,,,,,
रात देर तक जग जाता हूँ
कितना भी मैं थक जाता हूँ
नीदों मे लिखता रहता हूँ
कभी कभी तो पक जाता हूँ
शब्द नास्ता शब्द प्यास है
शब्ह सभी ब्यंजन होता है
मैं जब,,,,,,,,
लेटे लेटे पढ़ लिख लेता
लेटे लेटे गा लेता हू
ईयर फोन लगा कानों में
मित्रों को भी सुना देता हूँ
लिखने की धुन ऐसी हो तो
तब कोइ रंजन होता है
मैं जब,,,,,,,
😀😀😀😀😀😀
आलोक रंजन
[8/24, 1:24 AM] आलोक त्रिपाठी: हरिशरणम्
🌺🌺🌺
रस्ते रस्ते चलता जाऊँ
मन से आज सँभलता जाऊँ
पथ है विकट कराल
प्रभू तुम करना देखीभाल
कायिक वाचिक मनसा तुमको
नित नित शीश नवाऊँ
तुम हो साथ मेरे जाने हूँ
फिर भी क्यूँ घबराऊँ
दिन गुजरे हर साल
प्रभू तुम,,,,,,,
जीवन का झंझावट आता
हमको विचलित सा कर जाता
तुम हो हृदय बसे मेरे अब
कौन बिगारे काल
प्रभू तुम,,,,,,
अहनिश स्मृति तेरी आये
तेरी स्तुति हमको भाये
मैं तिनका तेरे चरणों में
पड़ा रहूँ हर हाल
प्रभू तुम,,,,,,
🌺🌺🌺🌺
आलोक रंजन
[8/24, 1:24 AM] आलोक त्रिपाठी: रिमझिम
🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌹
झम झम झम झम बरस रहे हैं
बादल शायद हरष रहे हैं
टिप टिप बूँदे पड़ें धरा पर
वृक्षों से हम दरश रहे हैं
बादल,,,,,,,
झन झन तन मन में होता है
अनुपम छँटा बिखरती जाती
सनसन सन सन वायु झकोरे
प्रिय के वस्त्र लहरती जाती
रूप वृंद अधरों पर खिलते
भँवरे बन मन तरस रहे हैं
बादल शायद,,,,,,,,,,,
टनटनटनटन घंटी बजती
हिय के कोने कोनें में
हम भी भ्रमित हो रहे देखो
अपनी नजर संजोने में
घनघन घन अम्बर को देखूँ
जो ये मद अब परस रहे हैं
बादल शायत,,,,
नगन नगन सुकुमारी फसलें
मस्त झूमती दिखती
हरियाली के सावन रिमझिम
परितः धरणी सिंचती
हे प्रियतम तुम लौट के आ जा
वाणी के स्वर लरज रहे हैं
बादल शायद हरष रहे हैं
बादल शायद हरष रहे हैं
झम झम झम बरस रहे हैं
🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿
आलोक रंजन
[8/24, 1:24 AM] आलोक त्रिपाठी: तुम मेरे गीतों में
🌹🌹🌹🌹🌹
तुम मेरे गीतों में आते
शायद हम तुमको लिख पाते
तुम मेरे ,,,,,
सुन्दर और सुनहरी जुल्फें
आँखों की गहराइ भी
होठों के अमृतरस लिखते
इठलाती तरुणाइ भी
रूप दृष्टि में मोहित होकर
हम तुझमें खुद को खो जाते
तुम मेरे,,,,,,
पलकों का उठना गिरना
नज़रों की बेबाकी लिखते
साँसें ये मद्धम मद्धम सी
दिल को धड़काती लिखते
सांसो के संग तुम भी मेरे
इस दिल के अंदर हो जाते
तुम मेरे,,,,,,,,
दिल की बात सुनाना सुनना
प्यार के तानें बानें बुनना
कैसे दिल को चैन मिले अब
ऐसी कोइ राहें चुनना
आगे कैसा होगा अपना
सब बातें तुझसे सुन पाते
तुम मेरे गीतों में,,,,,,,,
बाहों में भर लेता तुझको
दिल से रिश्ता हो जाता
दो दिल हो जाते इक जैसे
तेरा मेरा खो जाता
तुम लहराती आँचल अपना
दोनो मिलकर गीत सुनाते
तुम मेरे,,,,,,,
🌹🌹🌹🌹
आलोक रंजन
[8/24, 1:25 AM] आलोक त्रिपाठी: तुम मेरे गीतों में आते २
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
नज़रों की बिहसन लिखते
यौवन की ये पग पाजन भी
तिरछे तिरछे नैन झुके से
आँखों के येआँजन भी
नख शिख के हर पहलू लिखते
लिखते लिखते सो जाते
तुम मेरे,,,,,,
सुरभित पुष्पों के गजरे
जुल्फें महके महके लिखते
चंचल चेहरे की चहकन और
मन बहके बहके लिखते
प्रथम मिलन कितना प्यारा था
दोनो आज समझ जाते
तुम मेरे,,,,,,,,,
पैरों की झुनझुन लिखते
विन्दी की चमक दिवानी भी
दिल की हर धड़कन लिखते
कर्णों में सीप सुहानी भी
मधुरस से सम्पूर्ण देखकर
खुशियों के आँसू आ जाते
तुम मेरे,,,,,,,
प्रेम मिलन प्रभु के वंदन से
आओ मिलकर करते हैं
माथे पर पल्लू रख लेना
मस्तक चंदन करते हैं
भव बंधन से दूर रहे हम
हम बस प्रभु से ये कह पाते
तुम मेरे,,,,
👭👭👭👭👭👭
🌿🌿🌿🌿🌿🌿
आलोक रंजन
[8/24, 1:25 AM] आलोक त्रिपाठी: स्वप्न परी
🌹🌹🌹
तुम मेरे ख्वाबों में आकर
दिल कितना धड़का देती हो
सात जनम तक साथ न छूटे
ऐसी प्रीत जगा देती हो
तुम मेर,,,,,
मैं निश्छल निर्कपट भाव से
तुमको आलिंगन करता
तेरी बहती सांसों को मैं
सांसों से रोशन करता
हो जाता मैं ओत प्रोत सा
ऐसी महक लुटा देती हो
तुम मेरे,,,,,,,
सागर का तट प्यारा होता
हम दोनों चलते रहते
उठती हुइ तरंगें जल में
बस उसको तकते रहते
जल तरंग है तरंग जल है
प्रश्न यही मुसका करती हो
तुम मेरे,,,,,,,
परियों से पर तेरे होते
जिन पर प्यारे प्यारे गोटे
उड़न खटोला में बैठाकर
हमको सैर कराते होते
धरती से अंबर तक तुम तो
कहाँ कहाँ दिखला देती हो
तुम मेरे,,,,,,
बचपन से सुनता रहता हूँ
परियों की प्यारी दस्तानें
आज बीच सागर में आकर
ले आइ हो मुझे नहाने
सागर में मै डूब रहा हूँ
आकर मुझे बचा लेती हो
तुम मेरे,,,,,,,
साथ तेरे वन उपवन घूमे
पर्वत नदियाँ सागर भी
नीदं खुली सारी सच्चाइ
अब हो गइ उजागर भी
रंजन सुबह हुइ किरणों से
ऊर्जा नइ जगा देती हो
तुम मेरे,,,,,
🌹🌹🌹🌹🌹
आलोक रंजन
[8/24, 1:25 AM] आलोक त्रिपाठी: बचपन
😀😀😀
भागादौड़ी बहुत सह लिया
किस उलझन में पलते हैं
मेरे प्यारे मन चल अब तो
फिर बचपन में चलते हैं
मेेर प्यारे,,,,
पलने में झूलेंगे फिर से
पैर पटककर फिर रोयेंगे
माँ का अमृत दुग्ध पियेंगे
बस मस्ती में सोयेंगे
कुल दीपक बनकरके फिर से
अपने घर में जलते हैं
मेरे प्यारे,,,,,,,
गुड्डे गुड़िया मिलकर खेलें
सुनें कहानी नानी की
चोट लगी तो माँ रो देती
उन आँखों में पानी की
अच्छी अच्छी सीखें सुनलें
फिर से आज सँभलते हैं
मेरे प्यारे,,,,,,
नोकाझोंकी खेल में होती
खींचें हम फिर उसकी चोटी
अपना अपना खेल खिलौना
रखने की क्या हिकमत होती
अलमारी में सबसे नीचे
अपनी दुनियाँ रखते हैं
मेरे प्यारे,,,,,,,,
पढ़ने लिखने में अलसाते
भले पिताजी से पिट जाते
दादी के आँचल में छुपकर
डंडे खाने से बच जाते
भोजन का डिब्बा लेकर अब
स्कूलों में चलते हैं
मेरे प्यारे,,,,,,
सहपाठी कोइ चंचल सी
मुझको प्यारी लगती है
उसकी खातिर मेरे मन
उत्सुकता सी रहती है
उसकी कापी में चुपके से
शेरो शायरी लिखते हैं
मेरे प्यारे,,,,,
अपनी बेबाकी जुबान से
स्तुतियाँ प्रभु की गायें
सुनकर बड़े बुजुर्गों का मन
पुलकित हमपे हो जायें
सारी यादों को रंजन अब
आज संजोकर सिलते हैं
मेरे प्यारे,,,,,
😀😀😀😀😀😀🌹
आलोक रंजन
[8/24, 1:26 AM] आलोक त्रिपाठी: प्रियतमे
🌺🌺🌺
भावों से पुष्पित सामग्री
लेकर भेंट चढा़ जाना
मेरा घर है मंदिर जैसा
सीधे सीधे सीधे आ जाना
मेरा घर,,,,,
जल्दी आज निकलना घर से
सीधे सादे पहनावे में
दृढ़ संकल्प साथ में रखना
मत आना बहकावे में
रस्ते में चौराहा होगा
उस पर दृष्टि जमा जाना
मेरा घर,,,,,,,
स्वागत करती बाग मिलेगी
खुश्बू कुछ बरसा देगी
तेरे अन्तर्मन में फिर से
प्रेम की ज्योत जगा देगी
मोकह महका तन लेकर तुम
अपने कदम बढ़ा जाना
मेरा घर है,,,,,,
गीत मेरे गुन गाते होंगे
तेरे रूप सुवासित का
भँवरा अपनी धुन में होगा
मकरंदों का प्यासित सा
वाणी का सौन्दर्य बताकर
उनको कुछ समझा जाना
मेरा घर है,,,,,
सूना सूना देख रहा है
कबसे तेरा प्रेमास्पद
कितनी हुइ प्रतिक्षा तेरी
आज हुआ मन ये गद गद
एकाकी जीवन है प्यासा
मन की त्रास बुझा जाना
मेरा घर,,,,,,,
तेरे आने से ये मधुबन
हरा भरा हो जायेगा
प्यारे तेरे संग मेरा तो
जीवन प्यारा हो जायेगा
मेर लिये समर्पित हो तुम
बस इतना बतला जाना
मेरा घर,,,,,,,
🌺🌺🌺🌺
आलोक रंजन
[8/24, 1:26 AM] आलोक त्रिपाठी: स्वप्न सुन्दरी
🌺🌺🌺🌺
नाज़नी तेरी तस्बीर को देखकर
मेरे दिल की ये धड़कन बहकने लगी
रूप की खूबसूरत मिशालें है तू
मेरे चेहरे की खुशियाँ महकने लगी
तुम हो तस्बीर जन्नत की रानाइयाँ
मै तुम्हे चाहने की कसम खा लिया
मद भरी है नज़र देखती जब हो तुम
लग रहा मै खुदा का करम पा लिया
हम तुम्हें देखे या अब खुदा से कहें
मेरी तकदीर फिरसे बदल दीजिये
एक ऐसी हंसी मेरा दिल ले गइ
पा सकूँ उसको ऐसी अकल दीजिये
बंद आँखें करूँ तो वही दीखती
खोलकर आँख देखा खड़ी सामने
मेरा दिल ये धड़कने लगा जोर से
मेरे सपनों की ये फुलझड़ी सामने
हमने अपना इरादा रखा बरकरा
आज दिल की सुना दूँ उसे मै कसक
वो थी सपनों की प्यारी सी सौदागरी
हो गइ छू खड़ा देखता मैं भटक
🌺🌺🌺🌺
आलोक रंजन
[8/24, 1:27 AM] आलोक त्रिपाठी: प्रभु तुम चंदन
🙏🙏🙏🙏
हे प्रभु और निहारूँ कितना
तुम करूणा के धारण को को
निशदिन मैं तुमको ध्याता हूँ
दुख दारिद्र के हारन को
हे प्रभु,,,,,
तेरा मेरा ऐसा रिस्ता
जुड़ जाये इस धरती पर
जब भी तेरी बात चले तो
सम्मुख मेरी अरजी हर
अभिलाषायें मेरी पहुँचे
तुम पापों के तारन को
हे प्रभु,,,,,,
जनम जनम की प्यासी अँखियाँ
आज बुझा दो दर्शन से
भक्ती का कुछ तौर नही है
वंचित हूँ प्रदर्शन से
करजोरे इस आस खड़ा हूँ
किरपा विपद मिटारन को
हे प्रभु,,,,,,
तुम हो जग के पालन हारे
सृष्टि तुम्हें नत मस्तक है
सारे जीवों का हर पल हि
तू ही केवल रक्षक है
रंजन के सिर पर कर रख दो
जीवन के संचालन को
हे प्रभु,,,,,,,
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
आलोक रंजन
[8/24, 1:27 AM] आलोक त्रिपाठी: प्रियतमा ५
🌺🌺🌺🌺
तुम हो इक खुश्बू के जैसी
मुझको महकाती रहती हो
जब होती हो सामने मेरे
क्यूँ फिर शरमाती रहती हो
तुम हो,,,,,
ख्वाबों में भी आती रहती
तेरी याद सताती रहती
दिल के दर्द तुझे कहता हूँ
क्यों ये दिल धड़काती रहती
मैं तुझको देखूँ मुड़ मुड़ के
राहों में आती रहती हो
तुम हो,,,,,
सांसों में भी बस जाती हो
जब मैं तनहा होता हूँ
तेरे पहलू मे हि अपना
दिल बेकाबू करता हूँ
तुझसे मिलने का है इरादा
क्यूँ तुम बलखाती रहती हो
तुम हो,,,,,
इश्क मेरा सादा कागज़ है
इस पर तुम अपना लिख दो
जब भी तेरी इच्छा हो तो
मोबाइल पर इक मिस दो
तुझ बिन नीद न आये हमको
ऐसे तड़पाती रहती हो
तुम हो,,,,,,
🌺🌿🌺🌿🌺🌿
आलोक रंजन
[8/24, 1:27 AM] आलोक त्रिपाठी: प्रायश्चित्तं
🌺🌿🌺🌿🌺
ये जीवन है उड़नखटोला
जाने कब उड़ जायेगा
तेरा नाता परम पिता से
इक क्षण में जुड़ जायेगा
ये जीवन,,,,,,,
तुमने कितने कर्म किये हैं
तुमको बतलाना होगा
प्रभु समक्ष अपनी चतुराई
से दूरी रहना होगा
वो है अंतर्यामी जग का
भेद सभी खुल जायेगा
ये जीवन है,,,,,,
जन्मों से अपने मन की
यूँ हि करते आये हो
दुख में किसी मनुज को बोलो
क्या सहाय बन पाये हो
तेरा तुझको प्रभु देता है
करम तेरा तुल जायेगा
जीवन है,,,,,,
अब संकल्प करो तनमन से
शुभता की शुरुवात करोगे
जिससे कोइ दुख पाता है
क्या तुम ऐसी बात करोगे
दुख देने से दुख मिलता है
सुख से सुख मिल जायेगा
जीवन है,,,,,,
प्रतिबंधों में मन को कर लो
बहक बहक मत जाना तुम
गर्भ में जैसे सच्चे मन थे
वैसे हि बन जाना तुम
रंजन तेरा भवबंधन से
सब बंधन छुट जायेगा
जीवन है,,,,
🌺🌿🌺🌿🌺🌿
आलोक रंजन
[8/24, 1:27 AM] आलोक त्रिपाठी: पुंज भक्ति
🌺🌺🌺
धीरे धीरे कट जायेगी
जीवन की सारी कठिनाइ
वो तेरा भव पार करेगा
जिसने सारी सृष्टि बनाइ
धीरे धीरे,,,,,,,
अवसर आयेगा ऐसा भी
फूले नही समाओगे
तेरी इच्छा पूरी होगी
तुम विस्मित हो जाओगे
क्षण का कोइ पता नही है
महकोगे तुम मेरे भाइ
धीरे धीरे,,,,,
रोदित मत होना जीवन में
साहस को मत खोना तुम
धैर्य पुंज तेरी ताकत है
आलस में मत सोना तुम
कर्म बीर तुम बनकर रहना
भर जायेगी तेरी खाइ
धीरे धीरे,,,,,,
तुम हो शक्ति पुंज दाता के
उसका तुम आराधन करना
सच्चे इंशा बनकर अपना
जीवन ये संचालन करना
प्रभु है तेरे साथ हमेशा
देख रहा वो पाइ पाइ
धीरे धीरे,,,,,,
🌺🌺🌺🌺
आलोक रंजन
[8/24, 1:28 AM] आलोक त्रिपाठी: तुम मेरे गीतों में आते ३
शायद हम तुमको लिख पाते
🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺
श्रद्धा की एक नाव बनाकर
हम दोनों उसमें विरजेंगे
साहस की पतवारें होंगी
पथ में अब हम नही रुकेंगे
शरणागत होकर चरणों में
प्रभु को अपनी प्रीत सुनाते
तुम मेरे गीतों,,,,,,,
बंशी की धुन पर नाचेंगे
गायेंगे गोविन्दम् वृंदम्
शीश नवाकर अपनें कर से
करते रहेगे बंदन नित्यम्
आँखों से जल बरसायेंगे
और कहेगे जगत पिता से
तुम मेरे,,,,,,,
देर रात में ध्यान करेंगे
इष्टों का आह्वान करेगे
अपनें भावों को पुष्टित कर
कुछ आदान प्रदान करेगे
नित्य हमारा नीयम होगा
हर क्षण हि बस आते जाते
तुम मेरे,,,,,,
रो रोकर स्तुति गायेंगे
श्रद्धा सुमन चढा़ देगे
जब प्रसाद देने आयेगे
अपनें हाथ बढ़ा देगे
दर्शन से निर्मल पावक में
हम दोनों निरमल हो जाते
तुम मेरे,,,,
🌺🌺🌺🌺
आलोक रंजन
[8/24, 1:28 AM] आलोक त्रिपाठी: तुम मेरे गीतों में आते 11
🙏🌹🙏🌹🙏🌹
हरितालिता पर्व जब आये
गौरी शंकर पूजन जाये
रात्रि जागरण कर भोले से
अपनी मन कामना सुनाये
बढ़ जाये शौभाग्य हमारा
हम कितने हरषित हो जाते
तुम मेरे,,,,,
मंडप आज सजायेंगे हम
पूजन थाल लगायेंगे हम
मिट्टी के शिव लिंग बनाकर
पंचामृत बरषायेंगे हम
बेलपत्र और इत्र सुगंथित
शिव को अर्पित हम कर जाते
तुम मेरे,,,,,,
पान सुपारी और नारियल
भेंट चढ़ायें मिल करके
भाँग धतूरा भोग लगायें
सिलबट्टी पर पिस करके
अवढ़र दानी महाकाल हैं
स्तुति गीन सुनाते जाते
तुम मेरे,,,,,
आरति वंदन माथे चंदन
श्रृंगारों से खूब सजाते
अपने सुख समृद्धी के हित
व्रत रहकर भूखे सो जाते
पार्वती ने व्रत ठाना था
उनके जैसे हम कर पाते
तुम मेरे,,,,,,,,
🌹🙏🌹🙏🌹🙏🌹
आलोक रंजन
[8/24, 1:28 AM] आलोक त्रिपाठी: तुम मेरे गीतों, में आते
शायद हम तुमको लिख पाते
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
यमुना का पावन तट होगा
पुरा वहाँ बंशीवट होगा
गोपी होंगी जल भरती भी
सिर पर प्यारा सा घट होगा
तुम मेरी राधा बन जाना
हम मोहन तेरे बन जाते
तुम मेरे,,,,,,,
बंशी की धुन में गाऊँगा
तेरा मन मैं बहलाऊँगा
तुम आराध्य देव सा बनना
मैं तेरा वंदन कर जाउँगा
सखियों के संग हम मिलकरके
गाते गीत सभी मुस्काते
तुम मेरे,,,,,
कुंज बिहारी के कुंजन में
चलते रहते वृंदाबन में
मधुरस ताम्बूलों का लेते
वेसुध होकर बिन बंधन में
चाँद सी रात चमकती होगी
तरे मेर तन चमकाते
तुम मेरे,,,,
गोबर्धन को भेट चढ़ाते
अपना तन मन सब दे जाते
दास्य भाव अपनाकर हम तुम
चरणों में उनके पड़ जाते
जन्मों की सारी चतुराइ
उनकी है उनको दे आते
तुम मेरे,,,,,
🌹🌹🌹🌹
आलोक रंजन
[8/24, 1:29 AM] आलोक त्रिपाठी: तुम मेरे गीतों में आते
शायद हम तुमको लिख पाते
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
कैसे करें प्रतिक्षा उसकी
उल्टी पुल्टी दिक्षा उसकी
जाने कब क्या कह जायेगा
होगी नही समीक्षा उसकी
आदत से मजबूर बहुत है
सब मिलकर कितना समझाते
तुम मेरे,,,
माँ का आदर कर न सकेगा
सच्चाइ पर चल न सकेगा
दुर्ब्यसनों में फँसा हुआ है
इससे कभी उबर न सकेगा
इश्वर की सौगंध न माने
कितना कोइ जोर लगाते
तुम मेरे,,,,,
जीवन नरक बना डाला है
ऐसा पागल मतवाला है
मर्यादा को मोड़ रहा है
अपना घर हि तोड़ रहा है
जाने किन कर्मों के कारण
ऐसे लोग मनुज बन जाते
तुम मेरे,,,,,,
पापों का प्रायश्चित्त करता
जीवन ये सुब्यवस्थित करता
कहना मान बड़ों का रहता
पुण्यों को कुछ संचित करता
जनम मिला मानव का फिर भी
मानवता को आँख दिखाते
तुम मेरे,,,,,
🌹🌹🌹🌹🌹🌹
आलोक रंजन
[8/24, 1:29 AM] आलोक त्रिपाठी: तुम मेरे गीतों में आते
शायद हम तुमको लिख पाते
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
गणपति विघ्न निवारन करना
जीवन की सब बाधाओं का
निशदिन पूरण करते रहना
हम सब सबकी आशाओं का
इसी लिये हर वर्ष तुम्हारी
मूरत स्थापित करवाते
तुम मेरे,,,,,,,,
गौरी पुत्र विघ्न हरते हो
लड्डू से तुम खुश रहते हो
देव दयालु कृपा करना अब
प्रथम पुज्य हरपल रहते हो
उत्सव की तैयारी तेरी
षोडस पूजन हम कर जाते
तुम मेरे,,,,,,
नैमित्तिक दिनचर्या में तुम
स्मृति हृदय विराजे हो
मिट्टी की मूरति ले आये
तुम तो प्यारे लागे हो
बरबस मन खिंच जाता मेरा
तुझसे प्रेम समर्पित नाते
तुम मेरे,,,,,
अवगुन सब कर देना मेरा
नष्ट प्रभू ऐसी मति देना
मेरे जीवन की नइया को
प्यारी सी कोइ गति देना
रंजन सुखदायक गणनायक
शिव गौरी के लाल कहाते
तुम मेरे,,,,,,
🌹🌹🌹🌹
आलोक रंजन
[8/24, 1:29 AM] आलोक त्रिपाठी: तुम मेरे गीतों में आते
शायद हम तुमको लिख पाते
🌹🌹🌹🌹🌹🌹
वाणी का संबोधन लिखते
चेहरे का संकोचन भी
कदमों की आहट लिख जाते
और हँसी के रोचन भी
विंदी तेरी चमक रही है
चाँद जानकर हम सुख पाते
तुम मेरे,,,,,
बाहों की कोमलता लिखते
पतली कमर लचकती भी
नागिन सी लहराती चालें
मेरी ओर बहकती भी
मोकह रूप दृष्टि से बेसुध
हम तेरे सम्मुख आ जाते
तुम मेरे,,,,,
चन्द्रबदन की किरणें लिखते
बोझिल सी रूसवाइ भी
मन में चलती धारा लिखते
प्रेम रसिक पुरवाइ भी
आँखों का अंजन लिखकरके
तेरे नैनों मे बस जाते
तुम मेरे,,,,,
मन को खींच रहा यौवन येे
कैसे हम इंकार करेगे
तुमको हृदय विराजित करके
अपना स्वप्न साकार करूँगे
तुम मेरी हो स्नेहिल रचना
तुमको हृदयंगम कर जाते
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
तुम मेरे,,,,
, आलोक रंजन
[8/24, 1:29 AM] आलोक त्रिपाठी: संवेदना
🌹🌹🌹
संवेदना धरातल मेरा
इसका मैं विस्तार करूँगा
दुनियाँ में मैं महक सकूँ
ऐसा अब ब्यवहार करूँगा
दीन दुखी वंचित शोषित को
छोटी हि खुशियाँ दे जाते
तुम मेरे,,,,,,
मैं अनुगमन करूँगा उनको
जो दुनियाँ से न्यारे हैं
औरों को खुशियाँ देने में
अपना सब कुछ हारे हैं
वे तो बस जीते हैं ऐसे
बस एक मानवता के नाते
तुम मेरे,,,
अनुभव क्या क्या हमने पाया
ये दुनियाँ है झूठी माया
अपना कुछ भी नही यहाँ पर
बस झूठी है कोरी काया
कितनें कितनें भार लदें हैं
मन मस्तिष्क संभल नही पाते
तुम मेरे,,,,,,
लेना देना बस चलता है
जीवन की सच्चाइ है ये
जितना लोगे देना होगा
यहीं यहाँ की भरपाइ है
उतना हि संचित करना तुम
जितने में जीवन चल पाते
तुम मेरे,,,,,,
🌹🌹🌹🌹
आलोक रंजन
[8/24, 1:29 AM] आलोक त्रिपाठी: अहंता
🌹🌹
अभ्यर्थी हूँ जनम जनम से
कितनी दिया परीक्षा मैंने
कितने गुरूओं से पाइ है
सत्कर्मों की दिक्षा मैंने
कदम बढ़ाकर चलते रहते
बस चलते और चलते जाते
तुम मेरे,,,,
सात्त्विक सुक्ष्म परीक्षा का तो
आदि अंत है किसको मालुम
ये चलती रहती है नित हि
दिग दिगंत है किसको मालुम
देनी पड़ती कइ परीक्षा
सब मुझको हैं ये समझाते
तुम मेरे,,,,,
पढ़कर लिखकरके क्या पाया है
तुम इतना बतला तो दो
ज्ञान चक्षु क्या खुल पाया है
बस इतना समझा तो दो
ऐसे तो कितने जीवन हैं
पढ़ लिखकर पंडित बन जाते
तुम मेरे,,,,,
संचित होगी तेरी करनी
गर्व तेरा धूसित होगा
मुझको लगता है एक दिन तू
मुर्खराज भूयित होगा
ज्ञानी जैसा बात कर रहे
खुद हो कौन समझ ये जाते
तुम मेरे,,,
🌹🌹🌹
आलोक रंजन
[8/24, 1:29 AM] आलोक त्रिपाठी: नूर
🌹
पुरवाइ की ठंढ़ी लहरें
बनकर तुम आती रहती हो
मेरे लिखे गीत तुम मन में
हर पल हि गाती रहती हो
गीतों से मेरे तेरा है
कितने जन्मों के ये नाते
तुम मेरे,,,,,,
शंध्या का है प्रहर निराला
चंदा है अब आने वाला
सँवर भी जाओ अभिनंदन में
वो है तेरा चाहने वाला
रुक रुक कर निहारती जाना
जैसे हम तुमको निहारते
तुम मेरे,,,,,
पंक्षी है पिजरे के अंदर
सब कुछ देख रहा है तेरा
तू मतवाली भूल न जाना
प्रेम नगर का मेरा डेरा
ना ना करके तुम तो मेरे
दिल के और करीब आ जाते
तुम मेरे,,,,,
मन दुविधा में आज पड़ा है
ऊपर वाला कितना बड़ा है
जिसने मेरी तकदीरों में
तेरे जैसा नूर जड़ा है
तू शहजादी मेरी होकर
मुझको शहजादा बनवाते
तुम मेरे,,,,
आलोक रंजन
[8/24, 1:30 AM] आलोक त्रिपाठी: समर्पण
🌺🌺
धीर वीर गम्भीर गजानन
मेरा तुम उद्धार करोगे
मन की मेरी इच्छाओं को
पूरन तुम हर बार करोगे
सुबह शाम तेरे बंदन को
सारे कामों को ठुकराते
तुम मेरे,,,,,,
प्रिय मोदक लम्बोदर प्रिय हो
गौरी के तुम रहते हिय हो
जगत ब्याप्त सारी बिपदायें
नष्ट करो तुम एक अमिय हो
बीमारी लाचारी फैली
इसको जड़ से आज हटाते
तुम मेरे,,,,,,
ताप हरो संताप मिटाओ
हे गणपति तुम जगत हँसाओ
जन जन करें तुम्हारा वंदन
भय को मेरे दूर भगाओ
देव दनुज सब देख रहे हैं
हम मानव तो क्या कर पाते
तुम मेरे,,,,,
तेरे अवलम्बन से मेरा
अब तक सारे काम बना है
मुझको क्षमा हमेशा करना
मुझमें तो एक लड़कपना है
मेरे सिर पर कर तुम धरना
चरण तेरे मिल जाये हमको
नतमस्तक हम भी हो जाते
तुम मेरे,,,,,
🌺🌺🌺🌺
आलोक रंजन
[8/24, 1:30 AM] आलोक त्रिपाठी: इंतज़ार
🌺🌺🌺
तुम इतनी मासूम कली हो
बात मुझे मालूम न थी
तुझसे पहले मेरी रातें
इतनी भी रंगीन न थी
तेरी यादों के पलनें में
हम दिल को झूला झुलवाते
तुम मेरे,,,,,,
प्रहर प्रहर है वर्षों जैसा
कैसे काटूँ सूनी राहें
तेरा साथ मुझे मिल जाये
चौकन्नी हो जायें निगाहें
मंजिल मेरी बहुत दूर है
सोच सोचकर हम घबराते
तुम मेरे,,,,,,
सजल नयन हो जाते मेरे
जब आँखों मे तुम आते हो
साहिल मेरे सरगम मेरे
गीतों तुम बस जाते हो
फुरसत हो तो आ भी जाना
राहों में नयना बिछ जाते
तुम मेरे,,,,,
सुघर अधर प्रेमामृत लाना
हम भी उसका पान करेंगे
उस अमृत को पीकर हम तो
जनम जनम तेरे सग रहेंगे
स्वागत है तेरे आने का
आने में क्यों देर लगाते
तुम मेरे,,,,,
🌺🌺🌺🌺
आलोक रंजन
[8/24, 1:30 AM] आलोक त्रिपाठी: मैं
🌺
तुम मुझे रंजन बुलाओ मैं तुम्हें रचना कहूँगा
तुम रहो भी दूर मुछसे मैं तुम्हें सज़दा करूँगा
बीत जायेगी खुशी से जिन्दगी की शाम हर
बस इसी अल्फ़ाज में मैं वक्त को अच्छा कहूँगा
बाँध लूँगा शब्द का गट्ठर तपस्या के लिये
शब्द के हर शब्द पर अपनी रज़ा लिखता रहूँगा
आज तुम मुझको बता दो अपने दिल के राज़ भी
कब तलक़ तेरी गली में बस यूं हि भटका करूँगा
सुबह से हर प्रहर तेरी इंतज़ारी में कटे
आरजू़ है मेरी तुझको उम्र भर अपना कहूँगा
मैं हि रंजन लिख रहा हूँ सुन रहा हूँ मैं हि मैं
सोचता हूँ मैं को दिल से कब तलक रूकसत करूँगा ।
🌺🌺🌺🌺
आलोक रंजन
[8/24, 1:30 AM] आलोक त्रिपाठी: घटा
🌺🌺
तुम बादल की काली घटा हो
अद्भुत प्यारी एक छटा हो
और तुम्हें क्या उपमा दे दूँ
तुम तो मेरी स्नेहलता हो
गगन में छा जाती हो तुम जब
बादल फिर जल बरसा जाते
तुम मेरे,,,,,,,
काली है घनघोर अँधेरी
लहराती सी जुल्फें तेरी
अंग अंग का तेरा जलवा
मतवाली सी मस्त घनेरी
बरसा देती हो धरती पर
अपनी प्यारी प्यारी बातें
तुम मेरे,,,,
,
पुलक पुलक मैं भीग रहा हूँ
प्रेम लगन मैं सीख रहा हूँ
तेरा ये सानिध्य मिला जो
मैं भी अनुपम दीख रहा हूँ
बदरी बनकर तुम छाये हो
हम तुझ पर ये नज़र टिकाते
तुम मेरे,,,,
तेरा साथ सुहावन लगता
मुझको पावन पावन लगता
मस्ती सी छा जाती दिल पर
प्यारा प्यारा सावन लगता
बरसो बरसो बरस बरसके
जब तक पूरे हम भिग जाते
तुम मेरे,,,,,
🌺🌺🌺🌺
आलोक रंजन
[8/24, 1:30 AM] आलोक त्रिपाठी: नवजीवन
🌺🌺🌺🌺
तेरे रूप सुधा का मैंने
पहले भी कुछ पान किया था
तेरे चाँदनीयुत अंगों का
पहले भी गुणगान किया है
तब न पता था तुम हो मेरे
अब तक क्यों प्यासे रह जाते
तुम मेरे,,,,,,
आत्मसात मैं कर लेता हूँ
तेरे तन की किरणों को
चमक मुझे भी मिल जाती है
मन के सारे जीर्णों को
नवजीवन मिल जाता मुझको
स्फूर्ति तेज से हम भर जाते
तुम मेरे,,,,,
कितना भी भारी मन होता
नित जीवन के झंझाटों से
बच जाता हूँ प्रभू कृपा से
जैसे तैसे काँटों से
सहगामिनी तेरी पुण्यों से
हम भी पुण्यार्जित कर पाते
तुम मेरे,,,,,
तनमन तुझको अर्पित करता
मैं जीवन के हर पहलू भी
अंगीकार मुझे कर लेना
तेरे संग अब मैं बह लूँ भी
अविरल बहता रहे प्रेम रस
हम दोनों पीते न अघाते
तुम मेरे,,,,,
🌺🌺🌺🌺🌺
आलोक रंजन
[8/24, 3:33 AM] आलोक त्रिपाठी: यौवन
🌺🌺🌺
यौवन का श्रृंगार तुम्हारा
मतवाले कजरारे नैना
मद बरसाते रहते हैं ये
बोलो तुम क्या ये सच है ना
बनठनके जब चलती हो तो
सूरज भी फीके पड़ जाते
तुम मेरे,,,,,
कारी कारी कजरारी सी
अँखियों में है आकर्षन
पागल कर देती है मुझको ऐसे
जाऊँ डूब अभी इस क्षन
बरबस खिंचा चला आता हूँ
कदम मेरे रूक हि नहि पाते
तुम मेरे,,,,,
अंतरमन में क्या बतलायें
तेरी है तस्बीरें प्यारी
चित्रपटों सा सजा हुइ है
मेरे दिल की क्यारी क्यारी
सुबह शाम दोपहर रात अब
तुझसे हि मेरे कट जाते
तुम मेरे,,,,,,
संकोचों में मत रहना तुम
खुल कर अपनी कह देना
मेरा सुन लेना भी निवेदन
कुछ क्षण संग में रह लेना
ये सच है कल के भविष्य में
होगें तेरे मेरे नाते
तुम मेरे,,,,,
🌺🌺🌺🌺
आलोक रंजन
[8/24, 3:49 AM] आलोक त्रिपाठी: देवी सानिध्य
🌺🌺🌺🌺
पर्वत के ऊपर देवी हैं
चलो चलें दर्शन करने को
अपने प्रेम जगत की बातें
अर्चन करके कहने को
आशीषें मिल जायेगी हि
लाल फूल अर्पित कर आते
तुम मेरे,,,,
रस्ता थोड़ा सकरा है ये
कदम संभलकर चलना तुम
हाथ में मेरा हाथ पकड़ना
धीरे धीरे पढ़ना तुम
संग संग बातें कह सुन लेंगे
राहों में सब कुछ बतियाते
तुम मेरे,,,,,
कल्पवृक्ष को झुककर दोंनो
एक परिक्रम कर देंगे
ये पहला है कदम हमारा
उनसे बस ये कह देंगे
मन की हर वो कर देते हैं
सच्चे मन से जो हैं जाते
तुम मेरे,,,,
दोनों का संकल्प एक है
एक दृष्टि एक राहें हैं
एक नगर है एक डगर है
एक हि मस्त निगाहें हैं
ईश्वर भी एक जगत के
वैसे तो सहत्र दिख जाते
तुम मेरे,,,,,
🌺🌺🌺🌺
आलोक रंजन
[8/24, 6:21 PM] आलोक त्रिपाठी: चाँद
🌺
चाँद के जैसे तेरा मुखड़ा
लट बिखरी सी गालों पर
पायल बजती है ऐसी पैरों की
रून झुन प्यारी तालों पर
हल्की हल्की मुस्कानें हैं
हम तो बस भरमित हो जाते
तुम मेरे,,,,,
खुशियों की तुम एक लड़ी हो
मेरे घर के पास खड़ी हो
किसका अभिवादन करना है
माला लेकर वहाँ अड़ी हो
तेरा चाहने वाला मैं हूँ
सीधे मेरे घर आ जाते
तुम मेरे,,,
बंध मैं गया तेरे बंधन में
रोम रोम खिलने जैसा है
तुमने जितना सोचा होगा
मेरा मन उससे अच्छा है
मन पर मेरा है बच्चा जैसा
दिल पर बात नही ले पाते
तुम मेरे,,,,
अश्रु बूँद से झरने लगते
अपना जब तुम कहने लगते
लालायित होकर मुस्काता
मेरे मन के गहने लगते
चाह हमारी जन्मों की है
मेरी बातें तुम सुन पाते
तुम मेरे,,,,,
🌺🌺🌺
अलोक रंजन
[8/24, 11:00 PM] आलोक त्रिपाठी: सच्चाइ
🌺🌺🌺
पूनम की ये रात सुहानी
आओ, मिलकर खीर पकायें
मिश्रित इसमें प्रेम रहेगा
और मधूुर ब्यंजन हम पायें
मधुर मधुर भावों से निर्मित
ये प्रसाद मन शांति कराते
तुम मेरे,,,,,
तुम अपनें मन की पीड़ायें
सादर हमें सुनाया करना
सूक्ष्म सूक्ष्म बातों को भी तुम
मेरे साथ बंटाया करना
हल्के मन हो जाते इससे
रिश्ते पावन होते जाते
तुम मेरे,,,,,
सोचो तुम जिसके संग रहकर
जीवन पूर्ण बिताओगे
उसकी हर भावना पुंज से
कैसे बंचित रह पाओगे
हृदय खोलकर बातें करना
सारी शंकाओं को हटाके
तुम मेरे,,,,,,
जीवन हैये सबको शायद
समझ नही आ पाता है
पर जो सच्चे मन से अपने
साथी से जुड़ जाता है
उसका साथ प्रभू देता है
उसकी सच्चाइ के नाते
तुम मेरे,,,,,
🌺🌺🌺🌺
आलोक रंजन
[8/24, 11:19 PM] आलोक त्रिपाठी: एकात्मकता
🌺🌺🌺🌺
सरिता बहती रहती है नित
मेरे मन के कुंज गली में
तुम भी आओ बहती बहती
कह देना रंजन की अलि मैं
सहज हमें स्वीकार ये होगा
सहज प्रेम से तुम मिल जाते
तुम मेरे ,,,,,
प्रेम करूँगा मैं जीवन तक
तेरा हर कदमों के साथ
बारी बारी तेरी इच्छा
पूर्ण करूँगा मानो बात
कह दो तो मैं करूँ प्रतिज्ञा
मेरी मन की तुम सुन पाते
तुम मेरे,,,,,
सबकुछ छोड़ दिया है मैने
तेरे संग चलने की खातिर
बंधन तोड़ दिया है मैंने
आडम्बर से करना हासिल
मेरी मन ये कभी न माने
न्याय सत्य विपरीती बातें
तुम मेरे,,,,
आखिर क्या है जीवन का सच
बस इतना तुम समझ भी जाना
सहगामी बनते हो तो फिर
सहगामी को सच हि सुनाना
सत्य सदा एकरस रहता है
इसको कोइ बदल न पाते
तुम मेरे,,,,
🌺🌺🌺🌺
आलोक रंजन
[8/25, 5:47 AM] आलोक त्रिपाठी: अरूणिमा
🌺🌺🌺
तुम प्रातः बनकर आती हो
मुझको नित्य जगाने को
अपनी कुछ नवीन उर्जा से
मेरी शक्ति जगाने को
मैं विभोर हो जाता हूँ प्रिय
ऐसी घूँट पिला जाते
तुम मेरे,,,,,
बेला है कुछ कर जानें की
अपनी क्षमता दिखलाने की
रोम रोम में ब्याप्त तेरी रूत
आ जाती है दिल बहलाने
जगमग रोशन हो जाता मैं
मुझमें जोश जोश जगा जाते
तुम मेरे,,,,,,,,,
झुर झुर बहती पवन देख
मैं आत्म मुग्ध हो जाता हूँ
तेरे सुर में अपना सुर ये
लिखकरके बतला देता हूँ
चिड़िया वही गीत दुहराते
जो तुम उन्हें सिखा जाते
तुम मेरे,,,,,
रूप और माधुर्य बरसता
मेरे घर आँगन में
तेरे आने से इतराती
फुलझड़ियाँ इस मन में
समुचित दिब्य गहन सुन्दरता
अद्भुत दर्श करा जाते
तुम मेरे,,,,,,
🌺🌺🌺🌺
आलोक रंजन
[8/25, 6:17 AM] आलोक त्ध्नकर्षण
🌺🌺🌺🌺🌺
आच्छादित प्रकाश से पल पल
उजियारे का भान हुआ
उसके कर कमलों से मेरी
निद्रा का अवसान हुआ
जागूँ भोर भँवर गुंजित है
फूल बाग़ के हैं मुस्काते
तुम मेरे,,,,,,
महका महका सब कुछ लगता
यहाँ कोइ खुश्बू आइ है
जानें किस सौन्दर्य रूप में
हँसती मेरी अँगड़ाइ है
भूल गया मैं स्वयं कहाँ हूँ
बीत गइ क्या काली रातें
तुम मेरे,,,,,,
सुखद सुवास सुसज्जित बेला
मेरे मन को खूब लुभाती
प्राप्त हुई जैसे निधि कोइ
संसर्गों से हम सुख पाते
गाने को दिल करता है अब
स्पंदित होता है सुर साँचे
तुम मेरे,,,,,,
ना मैं राजमहल का वासी
ना हि हूँ प्रासाद निवासी
मैं तो केवल मनुज सरल हूँ
मेरे अंदर है सुखराशी
जगत ब्याप्त वह अंतर्यामी
का हि केवल ध्यान लगाते
तुम मेरे,,,,,
🌺🌺🌺🌺
आलोक रंजन
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