राधा कृष्ण रास बंशी की धुन

गीत
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होठ पर छेड़कर बांसुरी की ये धुन
कृष्ण सब गोपियों को बुलाने लगे
हो गइ बेसुधी ब्रज की सब नारियां
चैन दिल का कन्हैया चुराने लगे
होठपर,,,,, 
गोपियां सोचती क्या करूं ना करूं
मन कहां जा रहा कैसे काबू करूं
दिल की धड़कन बढ़ी सांस थमने लगी
प्यारे मोहन खयालों, में आनें लगे
होठ पर,,,, 
चल पड़े हैं कदम धुन की आवाज सुन
आज यमुना भी खोयी हुइ कृष्ण में
रास की रागिनी बज रही है मधुर
देेवता देखकर मुस्कराने लगे
होठ पर,,,,,,
चांदनी रात है चन्द्रमा है धवल
खिल रहे चांदनी में हजारों कमल
कुछ समझ ना सकी भोली ब्रज की लली
अंग बाहों में लेकर घुमाने लगे
होठपर,,,,,,,,
दिब्य है प्रेम अद्भुत छंटा क्या कहूं
भक्ति खुद प्रेम का रूप धर आइ है
प्रेयसी बनके  परमात्मा के लिये
अपना सब कुछ उन्ही पर लुटाने लगे
होठ पर,,,,,,,,,
मेरे मोहन मेरे प्राण प्यारे सजन
कहके सब गोपियां हो गइ हैं, मगन
आज जन्मों की अभिलाष पूरी हुई
प्रेम चरणों में सिर को झुकाने लगे
होठ पर,,,,,
आलोक त्रिपाठी इन्दौर मप्र

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