वह मृगनयनी मेरी कवितायें
वह मृगनयनी
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पानी का घट सिर पर चलती इठलाकर
आंचल पवन हिलोरे थोड़ी सी शरमाकर
नयनों के तिरछे वाणों से पड़ती दृष्टी
घायल कर देती है वो मृगनयनी आकर
पायल की छनछन सी लगती मधुर तरंगे
विस्मित होकर श्रवण रन्ध्र स्तब्धित हू मै
विरह अग्नि की ज्वाला जलती है मन में
ब्रम्हचर्य में विघ्न हुआ अचंभित हू मैं
यौवन सी छलकाती मुर्छित कर देती है
नई नवीन उमंगें मन में भर देती है
बिह्वल सा में तृप्त हो रहा रूप सुधा से
हृदय कुंज में चंचलता ये भर देती है
सोच रहा हूं इस सरिता में बह जाऊ मै
निर्मल होकर प्रेम रंग में रंग जाऊं मैं
अंबर से कुछ किरणें उसको देकरके
हृदय पटल पर अंकित उसको कर पांऊ मैं
प्रेम सहज जीवन का ये उद्गार है
मेरा प्रेम पवन सा बहता हार है
मधुर गीत का उद्भव अद्भुत बेला है ये
प्रेम हि मेरे जीवन का बस सार है
आलोकजी शास्त्री इन्दौर 9425069983
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