नज़रें गज़ल हम अपनी राह मुकम्मल मुकाम करते हैं

नज़रे गज़ल
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हम अपनी राह मुकम्मल मकाम करते हैं
नजर  के सामने बातें तमाम करते हैं

वफा की राह में बदनामियां भी मिलती हैं
कदम कदम पे हम उनको निशान करते हैं

शहर में कौन है जो दर्द की दवा दे दे
हम उनके वास्ते नीदें हराम करते हैं

कहानियां हैं बहुत खाश दिल जले कहते
हर एक दिल को मुहब्बत के नाम करते हैं

उदास चेहरे की पढ़करके खामोशी अब तो
खुशी की चादरों का इंतजाम करते हैं

वजा ना पूछो मेरे मेरे दिल की तंगहाली का
सुबह कहीं तो कहीं अपनी शाम करते हैं

वो हमसे रूठें हैं उनको मनाने की तरकीब
हम अपनी जिंदगी अब उनके नाम करते हैं

ग़जल की नज्र उन्हें आज मुबारक कहना
कोइ आलोक तुम्हें एहतराम करते हैं

आलोक रंजन शास्त्री इन्दौर 9425069983

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