चांद जरा तुम आकर देखो

चांद से प्रार्थना 
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चांद जरा तुम आकर देखो
ब्यथा धरा की कैसी है
अमृत कितना बरसाते हो
फिर भी प्यासी बैठी है
भूख निरंतर बढ़ती जाती
प्यासी तृष्णा गला सुखाती
दुर्लभ होता जाता जीवन
मानव ढूंढ़ रहा है स्वाती
प्रकृति भरी है संसाधन से
फिर अतृप्त क्यो रहती है
अमृत कितना,,,,,,,,,,,,,,
औषधियां निर्मूल हो रही
कैसी हमसे भूल हो रही
जीवन के स्थितियां कैसे
जीवन के प्रतिकूल हो रही
प्राण  वायु क्यो बाधित होकर
मंद गती से बहती है ।
अमृत कितना,,,,,,,,,,,,,
नग्न मृत्यु खेलती घूमती
नाच रही मदहोश यहां
इंशानों का बुरा हाल है
तड़प रहे हैं यहां वहां
बरसा दो जीवन रस अब तो
चीखें आज निकलती है
अमृत कितना,,,,,,,
आलोकजी शास्त्री इन्दौर 9425069983

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