सच्चे गीत मेरे

सच्चे गीत
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जीवन में सबकुछ मिल जाये
पर जीवन का सार कहां है।
सामाजिक उत्थान बहुत है
पर लोगों में प्यार कहां है ।।
संचित यौवन बिखर रहा है
यहां अनैतिक रूपों में
सदाचार अपनापन खोया
मीठा सा ब्यवहार कहां है
बंधक से हैं रीत रिवाजें
रिस्ते भय में पलते हैं।
अपनें भी अपने नहि लगते
रिस्तों का आधार कहां है।।
स्वैच्छाचार फैलता जाता
शहरों की हर गलियों में।
मनमानी करते रहते हैं
प्रतिबंधों की ढार कहां हैं।।
भ्रम में जीने लगी पीढि़यां
सस्ती उन्नति को पाकर ।
अपनी जड़ से उखड़ रहे हैं
अनुचित उचित विचार कहां है।।
आलोक शास्त्री इन्दौर 9425069983

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