गज़ल
गज़ल, ,,,,,
तुम मिले नजरें, मिली मेरी तपस्या है सफल
कुछ भी लिखता हूं मगर अब बन हि जाती है गज़ल।।
तुम मिले,,,,,,
कर दिया था इस जहां ने मुझको अपनों से खफा
दोस्ती के सिलसिले ने कर दिया राहें सरल ।।
तुम मिले,,,,,,,
भावनायें हम भी रखते हैं मुहब्बत के लिये
भावना में बह गया हूं क्या कहूं मै आजकल।।
तुम मिले,,,,,,,
चलिये कुछ गम बांटने का सिलसिला कर दें शुरू
क्यों करें हम दूसरों के काम में ऐसे दखल।।
तुम मिले,,,,,,,,,,
आंख के ये अश्क भी कुछ बोलते हैं सुन भी लो
आपकी नजरें इनायत हो तो हम जायें संभल भ।।
तुम मिले,,,,,,,,,,
शहर में दुश्वारियों का दौर है घर में रहें।
मुशकिलों से चल रहा है कुछ गरीबों का बसर।।
तुम मिले,,,,,,,,,,
आइनें में देखकर आलोक चेहरे की खनक
हम कदम आगे बढाते ये मुहब्बत का असर।।
तुम, मिले,,,,,,,,,,,
आलोक रंजन शास्त्री इन्दौर 9425069983
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