कुछ लोग

कुछ लोग
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अपने सुख की खातिर वो ऐसा माहौल बना देते हैं
देकर दर्द किसी को भी अपनी खुशियों को हवा देते हैं
मिलती हैं बद्दुवा किसी की फिर भी हंसते रहते है
लूट पाट से  सारा जीवन सिंचित करते रहते हैं
मुझसे कौन भिड़ेगा कहकर अपना मन समझा लेते हैं
अपने सुख,,,,,,,,,,,,
अभिलाषायें बढ़ती जाती क्रूर कर्म के जालों से
अगड़ित शत्रु बनाकर रखते घिरकर अपनें कालों से
मर्यादायें भूलकर सारी अपनी राह बना लेते है
अपने सुख,,,,,,,,,,,,,
रंजिश की तलवारें उनके हाथ खड़कती रहती है
उनके डर से आजादी दूजों की मरती रहती है
औरों की तो क्या अपनें लोगों को भी तड़पा देते ह
अपने सुख,,,,,,,,,,
मानव बनकर मानवता का गला घोटते रहते हैं
हड़प दूसरों के हिस्से पर फूले फूले रहते हैं
जीवन को क्या समझें वो खुद अपनी मौत बुला लेते हैं
अपने सुख,,,,,,,
आलोकजी शास्त्री इन्दौर 9425069983

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