कुंडली मे प्रजनन क्षमता न होने के कइ कारण होते हैं इनमे शनी और शुक्र का एक दूसरे से 2-12 वे भाव मे होना मुख्य है जो संतान प्राप्ती मे बाधक भी बना देता है । astro alok 9425069983
स्वर्ण प्रभा अंतरनाद तरंगित करके मन वीणा को सुर मय कर दो। नतमस्तक गुणगान करूं में स्वर्ण प्रभा हरमन में भर दो।। श्रुतियों सी श्रृंगारिक रचना उच्चरण में शुद्धि करण दो। मनवीणा को झंकृत करके नवरस राग प्रवाहित कर दो।। चुनचुन कर फूलो का मधुरस मृदुल रागिनी स्वर में भरदो। भ्रमरों की गुंजन गुनगुन कर पीत बसन सी काया भर दो। अभ्यंतर का कलुष मिटा कर प्रेम तरंगित मन में कर दो। कण-कण आह्लादित होगा कलियों का आमंत्रण कर दो। वेदों और श्रुतियों सा गायन हर्ष और उल्लास प्रखर दो। हे! करुणामयी करुण स्वरों से मेरे मन की करुणा हर दो। हास्य व्यंग्य को मिश्रण करके छंदबंध मधुमय लय भरदो। ह्रदय वेदना अलंकरण कर हृदयंगम विस्मय भय हर दो।। उद्दीपन हो हर्षित मन में कण-कण को करुणामय कर दो। हे!रसराज रसों से पुष्पित पुष्प अधर को रसमय कर दो।। पुष्प लता राठौर
आलोक रंजन फेसबुक प्रोफाइल पर आज शाम चार बजे कवि सम्मेलन सफल रहा अनेक साहित्यिक रचनाकारों ने कार्यक्रम की सराहना करते हुये पटल पर अपनी मधुर प्रतिक्रिया ब्यक किये। कार्यक्रम का संचालन मेरठ से सु श्री उदिता शर्मा ने शानदार संचालन का कार्यभार संभाला जो बहुत ही मधुर और औचित्य पूर्ण रहा । कार्यक्रम में उदयपुर से आदरणीय प्रमिला शर्मा कानपुर से वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीय गोविंद नारायण शांडिल्य जी इन्दौर मप्र से आलोक रंजन इंदौरवी जी ने काब्य पाठ करके चार चांद लगा दिया।
गुर्वाष्टकम् शरीरं सुरूपं तथा वा कलत्रं, यशश्चारु चित्रं धनं मेरु तुल्यम् | मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे, ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् || १ || १. यदि शरीर रूपवान हो, पत्नी भी रूपसी हो और सत्कीर्ति चारों दिशाओं में विस्तरित हो, मेरु पर्वत के तुल्य अपार धन हो, किंतु गुरु के श्रीचरणों में यदि मन आसक्त न हो तो इन सारी उपलब्धियों से क्या लाभ? कलत्रं धनं पुत्र पौत्रादिसर्वं, गृहो बान्धवाः सर्वमेतद्धि जातम् | मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे, ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् || २ || २. सुन्दरी पत्नी, धन, पुत्र-पौत्र, घर एवं स्वजन आदि प्रारब्ध से सर्व सुलभ हो किंतु गुरु के श्रीचरणों में यदि मन आसक्त न हो तो इस प्रारब्ध-सुख से क्या लाभ? षड़ंगादिवेदो मुखे शास्त्रविद्या, कवित्वादि गद्यं सुपद्यं करोति | मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे, ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् || ३ || ३. वेद एवं षटवेदांगादि शास्त्र जिन्हें कंठस्थ हों, जिनमें सुन्दर काव्य निर्माण की प्रतिभा हो, किंतु उनका मन यदि गुरु के श्रीचरणों के प्रति आसक्त न हो तो इन सदगुणों से क्या लाभ? विदेशेषु मान्यः स्वदेशेषु धन्यः, सदाचारवृत्तेषु मत्त...
Comments