सियासत की सच्चाइ दुनियां कहां जानती

सियासत
,,,,,,,,,,,,,,,,, 
इज्जत से जीने वाले लुट जाते हैं
इज्जत की खातिर हर गम सह जाते हैं 
बदनामी से कोसों दूर बसें भी तो
दुनियां वाले कुछ छीटे  छिट जाते हैं
शर्म हया को सड़कों पर बिकते देखा
चाहे कितनी बार भी ओ पिट जाते हैं
बनकरके हमदर्द छुपे रूस्तम की तरह
सीने मे खंजर कुछ तो घुप जाते हैं
सच्चाइ का मोल ये दुनिया क्या जाने
सच्चे चेहरे परदे मे ढक जाते हैं
कब तक रहमों करम दिखायेगे हम पर
नेताजी से रोज जो मिलने जाते हैं
बेशब्री से देख रहा हू न्याय की राह
तारिख पर तारिख फिर भी बढ जाते हैं
रोजी रोटी कौन बतायेगा उनको
आगे की थाली आइ छिन जाते हैं
रब्बा दुनियां खौफ के मारे मर जाये
बीमारी पर कितना डर फैलाते हैं
हम तो हैं आलोक बिखेरे चेहरे पर
संकट में चादर खुद ढल जाते हैं
आलोकजी शास्त्री इन्दौर 9425069983

Comments

Popular posts from this blog

स्वर्ण प्रभा

आनलाइन कवि सम्मेलन

गुरू के चरणों में प्रेम के लिये पढें नित्य गुर्वाष्टकम्