गीत

 एक अनूठी राग बनकर जिंदगी में छा गई

मैं खुशी  से झूमता हूं गीत ऐसा गा गई


मैं बहुत मजबूर था तन्हाइयों के साथ में

वक्त का था मैं सताया कुछ नहीं था हाथ में

रात दिन सुनसान राहों पर सफर करता रहा

बेगुनाही की सजा पर आह भी भरता रहा

एक खुशबू की तरह वह मुझको भी महका  गई

मैं खुशी में,,,,,,


जिंदगी के रूप कितने जान पाया भी नहीं

कोई सिर पर हाथ रख कर के बताया भी नहीं

मैं अकेला ही लड़ा लहरों की लंबी जंग को

हाथ मेरा पकड़ने को कोई आया भी नहीं

एक जिज्ञासा हमारे भाग्य को चमका गई

मैं खुशी में,,,,,


सत्य संकल्पों का दीपक हाथ में मेरे रहा

दृढ़ प्रतिज्ञा का पिटारा साथ में मेरे रहा

मंजिलों तक पहुंचने का ही जुनून छाया रहा

कर्म पथ का आकलन भी पास में मेरे रहा

मेरी किस्मत मेंहनतों के रंग से नहला गई

मैं खुशी में,,,,,

आलोक रंजन इंदौरी

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