वक्त का सिलसिला गीत

दीप जलता रहा रोशनी के लिए
पर हवाएं बुझाने की कोशिश में थी
वक्त का सिलसिला यूं ही चलता रहा
आंधियां घर जलाने की कोशिश मे थी
वक्त का सिलसिला,,,

मैं अकेला कदम साध कर चल दिया
मंजिलों की तरफ मेरा संकल्प था
राह में कितनी ठोकर मिली गम नही
इतना कमजोर मेरा भी वो तप न था
तेज काली घटाएं घिरी थी बहुत
वो तो मुझ को डराने की कोशिश में थी
वक्त का सिलसिला,,,,

आजमाइश मेरी एक चाहत रही
मेरे दिल में बसी उसकी तस्वीर है
मेरे ख्वाबों की रानी मेरी दिल्लगी
बस वही मेरे सपनों की जागीर है
इश्क में जो कदम मेरे बढ़ते रहे
वो भी दिल से लगाने की कोशिश में थी
वक्त का सिलसिला,,,

मुझको मेरी मुकद्दर ने धोखा दिया
हार मानी न मैंने कभी राह में
बनके खुशबू मुझे ऐसे वो मिल गई
एक दिन आ गई थी मेरी बांह में
मैं महकता रहा और हंसता रहा
सारी दुनिया रुलाने की कोशिश में थी
वक्त का सिलसिला,,,

आलोक रंजन इंदौरी

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