प्रेम स्पंदन
एक प्रेम श्रृंगार गीत सुनें
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
तुम जब मुझसे मिलने आते खूब जमाना अच्छा था
मीठी मीठी बात सुनाते खूब जमाना अच्छा था
खट्टी मीठी तकरारें थीं और मोहब्बत की बातें
हम तुम दोनों भीग रहे थे याद आती है बरसातें
बचपन और जवानी का एहसास कभी ना हो पाया
तेरे मेरे दिल में कुछ आभास कभी ना हो पाया
हम तुमको जब घर पहुंचाते खूब जमाना अच्छा था
जब तुम,,,,,,,,
पुरवइया की मंद हवाओं का मौसम भी प्यारा था
बाग में बैठे-बैठे तुमको कितनी देर निहारा
था
जुल्फों के साए में तेरा चेहरा खूब सुहाना था
अपनी बात सुनाने का वो तेरा एक बहाना था
पीला दुपट्टा तुम लहराते खूब जमाना अच्छा था
जब तुम ,,,,,,,,,
रोज सुबह तुम छत पर आकर मुझे बुलाया करते थे
अपनी खुशबू से मुझको मदमस्त बनाया करते थे
बात इशारों में होती थी कोई समझ नहीं पाता
कुछ बातें कॉपी में लिख कर मैं तुमको खुद दे जाता
साथ-साथ विद्यालय जाते खूब जमाना अच्छा था
जब तुम,,,,,,,
आलोक रंजन इंदौरवी
Comments