स्वर्ण प्रभा
स्वर्ण प्रभा अंतरनाद तरंगित करके मन वीणा को सुर मय कर दो। नतमस्तक गुणगान करूं में स्वर्ण प्रभा हरमन में भर दो।। श्रुतियों सी श्रृंगारिक रचना उच्चरण में शुद्धि करण दो। मनवीणा को झंकृत करके नवरस राग प्रवाहित कर दो।। चुनचुन कर फूलो का मधुरस मृदुल रागिनी स्वर में भरदो। भ्रमरों की गुंजन गुनगुन कर पीत बसन सी काया भर दो। अभ्यंतर का कलुष मिटा कर प्रेम तरंगित मन में कर दो। कण-कण आह्लादित होगा कलियों का आमंत्रण कर दो। वेदों और श्रुतियों सा गायन हर्ष और उल्लास प्रखर दो। हे! करुणामयी करुण स्वरों से मेरे मन की करुणा हर दो। हास्य व्यंग्य को मिश्रण करके छंदबंध मधुमय लय भरदो। ह्रदय वेदना अलंकरण कर हृदयंगम विस्मय भय हर दो।। उद्दीपन हो हर्षित मन में कण-कण को करुणामय कर दो। हे!रसराज रसों से पुष्पित पुष्प अधर को रसमय कर दो।। पुष्प लता राठौर
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