भागवत कथा श्रोता के लक्षण कैसे होते हैं
सत्यं शौचं दयां मौनमार्जवं विनयं तथा ।
उदारमानसं तद्वदेवं कुर्यात् कथाव्रती कुर्यात् ॥ ५०॥
अर्थात: सर्वदा सत्य, शौच, दया, मौन, सरलता, विनय और उदारता का बर्ताव करना चाहिये ॥ ५० ॥
लोकवित्तधनागारपुत्रचिन्तां व्युदस्य च ।
कथाचित्तः शुद्धमतिः स लभेत् फलमुत्तमम्।। ३७॥
अर्थात: जो पुरुष लोक, सम्पत्ति, धन, घर और पुत्रादि की चिन्ता छोडक़र शुद्धचित्त से केवल कथा में ही ध्यान रखता है, उसे इसके श्रवण का उत्तम फल मिलता
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