बहार ढूढते रहे स्वप्न
स्वप्न
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पंछियों को देखा आज कितनी ये मचल रही
रंग भरे पंख लेके आसमां में चल रही
मस्तियां मनायें हौशलों की ये उड़ान है
आ रही हैं घोसलों में देखो शाम ढल रही
पंछियों में चेतना अपार ढूंढते रहे,,,,,
वाटिका में,,,,,,,,,,
सत्य की डगर पे ख्वाहिशें है चलता जाऊं मैं
सत्य के दिये सदा लिये हि मुस्कराऊ मै़
दुख हो या सुख हो बढूं निडर सा राह में
फिर कभी मनुष्यता को अब न भूल पाऊं मैं
पथ में रात दिन यही विचार ढूढते रहे
वाटिका में,,,,,
पाप पुन्य कर्म का हिसाब कौन कर रहा
होके मस्त हर कोइ बुराइयों में पल रहा
कबसे जिंदगी न जाने ले रही है करवटे
वासना की आग में हर एक यहां जल रहा
वासना के राग में विराग ढूढके रहे
वाटिका में कांट,,,,,,,
जंग जिंदगी की होगी सोचता हू अब खतम
पालता रहा यही दिलों एक हि बहम
बंद आंख करके राह में मै देखता रहा
हो गइ थी भोर स्वप्न हो, गये मेरे खतम
वादियों, में स्वप्न की कतार ढूढते रहे
वाटिका में कांट,,,,,,
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आलोक रंजन शास्त्री इन्दौर
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