लघुकथा (छींक)
कहानी
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लघु कथा( छींक )
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रात में भोजन करके राजेश जल्दी सो तो गया ,पर रात भर नींद नही आइ ।
कभी कभी खुशियां भी सोने नही देती । सुबह जो बैंक में सरकारी नौकरी पक्की हो गइ उसका काल लेटर आया है ,परीक्षा में अच्छे नम्बर आये थे तभी तो काल लेटर आया है । एक अटूट आत्म विस्वास के साथ राजेश का चेहरा खिल सा गया था दिनभर खुशी में सबको बताता रहा रात में मां नें दूध देते हुये कहा बेटा गणेश जी का दर्शन जरूर करके सुबह जाना जल्दी सो जाओ सुबह मै भी चलूंगी साथ मंदिर । ठीक है मां कहते हुये राजेश ने दूध पीया ,और लेट गया ।सुबह जल्दी नहाकर तैयार हुआ मां को साथ लेकर मंदिर में गणेश जी का दर्शन किया,और घर आया । बैग में कुछ शैक्षणिक अंक पत्र और जरूरी कागजात संभालकर रखा । पापा मम्मी का पैर छूकर भगवान को हाथ जोड़कर घर से निकलने लगा देहरी बाहर कदम बढाया हि था कि पड़ोस की दादी दिख गइ। पैर छूकर आशिर्बाद लिया ,
दादी ने उज्जवल भविष्य की दुहाइ देते प्यार से दुलार करके, शुभकामनायें दी । तभी राजेश को छींक आ गयी ।और एक बार नही तीन तीन बार ,दादी के मन में शंका का भूत सवार हुआ ,और राजेश को घर में चलने को कहते हुये हाथ पकड़कर ले जाने लगी । बोली बेटा छींक आ गइ दो मिनट बैठकर पानी पी लो फिर जाओ । राजेश ने ऐसी मान्यताओं का न मानते हुये ,दादी के सामने घर में आकर बैठ गया । पर दादी से कहने लगा दादी इससे कुछ नही होता मुझे अपनी पढ़ाइ और काबिलियत पर पूरा विश्वास है । पर दादी के आगे उसकी एक न चली ।
थोडी देर बैठने को बाद घर से निकल कर सड़क तक आया और सीटी बस में बैठ कर आफिस जा पहुंचा । आफिस में सब लोगों का ब्यवहार बहुत संतोष जनक रहा मैनेजर साहब के साथ सभी कर्मचारियों ने शुभकामनायें दी और आज का पूरा दिन सपनों के किसी सुहाने मौसम जैसा बीता । और आफिस से छूटके हि मुस्कराकर सबसे बिदा लेकर घर आया । आज मां ने खुशी में खीर पूड़ी बनाइ । राजेश के आते हि मां के कलेजे में ठंढक पहुंची चेहरा खिल गया । नही तो सुबह जबसे गया था राजेश , मन में एक अकारण किसी अनहोनी की शंका से बैचेन सी थी । राजेश को देखकर पानी देते हुये मां ने कहा कैसा रहा बेटा पहला दिन ,बेटा सुबह तो मै घबरा गइ थी । रादेश ने कहा मां एक छींक मेरे परिश्रम को कैसे मिटा सकती है मैं अपने कर्म पर व्श्वास करता हू इन छूठी मान्यताओं पर नही ।
मौलिक स्वरचित अप्रकाशित
आलोकजी शास्त्री
इन्दौर मप्र 9425069983
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