आज़ाद शायरी

आजाद शायरी
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इबादत का कोइ जतन ढूँढते हैं।
वो अपने लिये एक रकम  ढूँढते हैं।। 

जो पूछे कोइ बानगीए इबादत।
तो हम सबसे पहले वतन ढूँढते हैं।। 🇮🇳🇮🇳

खुदा है रकीबों का किसने कहा है।
खुदा के लिये क्या चमन ढूँढते हैं।। 

वखत़ पे  मिले काम उससे चला लो।
ग़रीबी में  अहले सुखन ढूँढते हैं।। 

नबाबी का जलवा हमें ना दिखाओ।
हमें इस जहाँ के रतन ढूँढते हैं।। 

ज़रा अक्ल से काम लेके भी देखें।
हर एक बात पे क्यूँ भरम ढूँढते हैं।। 

हुआ इश्क़ परदा हटा दीजिये भी।
यहाँ अब न कोइ शरम ढूँढते हैं।। 

नही कोइ रंजन मुहब्बत भरा दिल।
चलो कोइ दूजा़ हरम ढूँढते हैं।। 

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आलोक रंजन शास्त्री इन्दौर

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