बहार ढूंढ़ते रहे
बहार ढूढ़ते रहे
🍀🍀🍀🍀
वाटिका में कांट के बहार ढूंढ़ते रहे
उम्र बीतती रही हम प्यार ढूंढ़ते रहे
जिंदगी कहां कहां तुम्हें जहां में हर जगह
चाहतों के अश्व पर सवार ढूंढ़ते रहे
हर सुबह उमंग सूर्य मुझको भेजता रहा
मैं खड़ा दिशाओं में स्तब्ध देखता रहा
भूल भी होती रही कदम बढ़ाऊ ज्योहि मैं
हलचलों को दिल में बार बार देखता रहा
आरजू के मौज पर अंगार ढू़ंढ़ते रहे
वाटिका में,,,,,,,,,
लोरियां सुनाके कोइ मुझको सुलाता रहा
गम के बेशुमार पल में खुद को भुलाता रहा
मर्ज का पता न था दवाइयां तो ली बहुत
आग से आग को मै कबसे बुझाता रहा
बैठकर किनारे मझढार ढूढ़ते रहे
वाटिका मे कांट,,,,,,,
रिस्तों की बजार में आवाज कौन सुन रहा
किस तरफ मैं जाऊं एक राह आज चुन रहा
बंदिशों का दौर है खुलकर न बोल पा रहा
दिल की ये तरंग दिल में लेके देखो गुन रहा
पत्थरों के सांचे में साकार ढूढते रहे
वाटिका में कांटों,,,,,,
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आलोक रंजन शास्त्री इन्दौर
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