ग़ज़ल
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वक्त को कौन याद करता है
ये तो खुद वक्त पे उभरता है
अपने गम पे है हमको नाज यहाँ
गम हि ये जिन्दगी बदलता है
होश में हमको क्यों लाते हो तुम
मेरा दिल अब नही सँभलता है
काट खाने को दौड़ती दुनियाँ
सूनी राहों पे कौन चलता है
नीयतों में भी खोट है उनकी
उनका घर बस इसी से चलता है
कोइ घर मुझको बता दो यारों
नेकियत का दिया भी जलता है
वार पे वार करते जाते हो
मेरा भी खूँन अब उबलता है
देखता हू कि मेरे संग यहाँ
जाने किस किस का दिल भी जलता है
इंशा कितना भी बेअदब है अब
अपनों के दिल पे मूँग दलता है
बेमुरव्वत सा है वो शख्स यहाँ
घर जलाने की बात करता है
खो गये तुम कहाँ बोलो रंजन
ये है दुनियाँ यहाँ सब चलता है
आलोक रंजन शास्त्री इन्दौर
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