निर्गुन गीत

निर्गुन
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हम जिन्दगी की राह यूं  चलते चले गये
आदत पे अपनी हाथ हि मलते चले गये

सोचा था प्रभू वंदन मन से किया करेगे
अवसर जो आये मुझसे निकलते चले गये

दुनियां है एक माया दिखता वो सच नही है
झूठे दिलास मुझको यूं छलते चले गये

तृष्णा की प्यास में हम भटके कहां कहां
रस्ते हमारे वास्ते बढ़ते चले गये

रंजन ये वासना अब देखो  डुबो रही है
ढांचे तुम्हारी उम्र के ढलते चले गये
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आलोक रंजन शास्त्री इन्दौर

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