ग़ज़ल मैं कभी ग़मज़दा नही होता तू अगर बेवफा नही होता,,,,,
हाले ग़म
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मैं कभी ग़म ज़दा नही होता
तू अगर बेवफ़ा नही होता
ज़िदगी तेरा क्या यकीन करें
काश मुझसे दग़ा नही होता
रोज़ दुनियाँ यहाँ बदलती है
रोज़ कोइ सग़ा नही होता
सच को अपनी जुबाँ पे रखते हैं
उनको रिश्ते बदा नही होता
आजकल वो छुपे से रहते हैं
घर पे उनके पता नही होता
उनकी यादें हमें सतानें लगी
वरना ये रतजगा नही होता
रूठ कर बैठे हो बोलो रंजन
ये कोइ क़ायदा नही होता
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आलोक रंजन इन्दौरी
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