मेरी ग़ज़ल संग्रह आलोक रंजन इन्दौरी
ग़ज़ल
मिलते रहे सभी से मगर अजनबी रहे
२१२. २१२१.१२२१.२१२
आवारगी तुम्हारी कैसे कोइ सहे
अपनी हि आशिकी में मशरूख तुम हुए
आराम अब करो तुम लिखकरके शायरी
ये शायरी पटल पर सजती यूं हि रहे
आँखों की रोशनी तो कमजोर हो रही
देता नही दिखाइ जाकर कोइ कहे
बेकार की कोइ भी चिंता नही मुझे
दिखती नहीं कमाइ केसे कोइ कहे
होकर अधीर बैठा हूँ थक न जाऊँ मैं
रचना कई बनायी हम खुश बहुत हुए
मन की मुराद लेकर आया हूँ तेरे द्वार
करना न जग हँसाइ रंजन यही कहे
आज की बेटियाँ
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घर की जिम्मेदारी अब रखके अपनें कंधे पे सबके विश्वास को जगानें लगी बेटियाँ
करके पढ़ाइ अब नौकरी में चारो तरफ देश और विदेश में भी जानें लगी बेटियाँ
टेक्निकल के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान
बस और टेक्सी चलानें लगी बेटियाँ
राजनीति कूटनीति सारे संविधान जान जनता को देश की जगानें लगी बेटियाँ
आइएस में टाप कर बनी बड़ी अफसर
नीयम कानून समझाने लगी बेटियाँ
घर से लेके बाहर की दुनियाँ जहान में अब नारियों के नाम को सजानें लगी बेटियाँ
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आलोक रंजन इन्दौर
मेरे महबूब ४१
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आज तनहाइ में कुछ अश्क बहाया मैंने
दिल में कुछ दर्द था उसको हि दिखाया मैंने
कौन कहता है मुहब्बत में ग़म नही होता
देखो हर लम्हें हि ग़म को तो सजाया मैंने
जानें कब होगी मुरादों की वकालत मेरी
रब से कहता हूँ तुझे कितना बुलाया मैंनें
जख़्म मेरा जो दिखा सकता नही दुनियाँ को
आज फिर उसकी हि तारीफ सुनाया मैंने
पूछते हो कहाँ उसका है ठिकाना जिसको
जिंदगी दाव पे रखकरके हँसाया मैंने
जो मुझे हँसके दिवाना सा बनायी थी उसे
बाहों मे लेके सभी गीत सुनाया मैेंनें
इश्क के परदे पे लिखकर दिलों की सब बातें
आज रंजन के लिये सच को दिखाया मैंनें
आलोक रंजन
मेरे महबूब ४२
🌺🌺🌺🌺 ग़ज़ल
कितनी मुश्किल से उसे आज बुलाया हमनें
अपनें दिल के सभी जजबात सुनाया हमनें
दर्द तो निकला जो अब तक छुपा रक्खा था
अपनें कातिल को हि महबूब बनाया हमनें
होश में हम न हैं कैसे उसे पहचानेंगे
आज महफिल में अपनी बात सुनाया हमनें
हर कोइ दिल का कहाँ हाल समझ पाता है
अपनें दिल पर भी ये इल्ज़ाम लगाया हमनें
बात ऐसी है जो दुनियाँ से कोइ कैसे कहे
भूल शामिल है मेरी माफ कराया हमनें
शख़्त लहज़े में उसे ये तो हिदायत दे तो
आज ये दिल तो रंजन का बताया हमनें
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आलोक रंजन
मेरे महबूब ४३
🌺🌺🌺🌺 ग़ज़ल
हम तेरे ग़म को भी सीनें से लगा लेते हैं
अब तो हम ऐसे हि जीकरके दिखा देते हैं
शायरी हम तो मुहब्बत पे बहुत लिक्खें हैं
अब तो हम उनको हि इस दिल पे सजा लेते हैं
बंद क़ायम है कोरोना में शहर की गलियाँ
शोर कम हो रहा कुदरत को दुआ देते हैं
ऐ ख़ुदा हम तेरे एहसान पे इतराते हैं
आज हम शौक से लिखनें का मज़ा लेते हैं
दिल पे मरहम न लगानें की कसम खाई है
बेरहम उसको बताना था बता देते हैं
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आलोक रंजन
: मेरे महबूब४४
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उसनें रिश्ते तो बनाये थे बहुत
नये से ख़्वाब सजाये थे बहुत
ज़िदगी के लिये कितनें कितनें
किस्म के फूल लगाये थे बहुत
लोग अब उससे कहते फिरते हैं
हमारे काम न आये थे बहुत
इश्क में कौन है जो रोता नहीं
ठोकरें हम भी तो खाये थे बहुत
ग़रीब भूखे जो सड़कों पे सोये थे
दिये रोटी तो मुस्काये थे बहुत
दुवाऐं मिलती रही मुझको यूं हि
खुशी में झूमके गाये थे बहुत
मिरे दिल की यहाँ सुनता है कौन
लोग रंजन को सताये थे बहुत
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मेरे महबूब ४५
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मुझे औरों के मुँह से तुम कभी अच्छे नही लगते
ज़रा तुम गौर से सोचो हम भी
बच्चे नही लगते
वो बचपन में जो झूले थे हमारे साथ झूले में
कहो क्या कह भी सकते हो वो सब सच्चे नही लगते
चलो बैठो मेरी गाड़ी नई है कि इसमें बैठनें से थोड़ा भी दच्चे नही लगते
हमारे बाग़ केे फल प्यार से खाना बहुत मीठे हैं ये कच्चे नही लगते
बहुत आवारगी करते है तेरी गलियों के मजनूँ
तुम्हें कैसे वो सब तुच्चे नही लगते
तुम्हें इज्जत मुहब्बत प्यार सब कुछ देता है कोइ
मगर रंजन के दिल के क्यो तुम गुलदस्ते नही लगते
आलोक रंजन
ग़ज़ल
काफिया _आन
रदीफ़_ आ
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देखो न समंदर में तूफ़ान आ गया
हम घूमनें निकले थे ब्यवधान आ गया
बर्षों से जिसका हमको इंतज़ार था
प्यारा सा आज कोइ मेहमान आ गया
घर ये नया है इसमें कोइ कमी नहीं
सारी जुरूरतों का सामान आ गया
ब्यापार में हमारी हालत खराब है
इस माह में करोड़ों नुकसान आ गया
सबको मिलेंगेे अब घर भी नये नये
सरकार का नया ये फ़रमान आ गया
ये सड़क तो बनेंगी चौराहे तक यहाँ
पर क्या करें यहाँ पर शमसान आ गया
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आलोक रंजन इन्दौर
: ग़ज़ल मेरे महबूब ४७
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बात करते हैं रोज़ ग़ज़लों की
आज कुछ दिल की बात करते हैं
आइना देख कर हमें ये लगा
आज दिन में हि रात करते हैं
चमक रहे हैं चाँद तारों से
चलिये उनकी बरात चलते हैं
रोशनी हमको चकमकाती है
हुनर कोइ इज़ाद करते हैं
कितनें दिन से वो याद आयें हैं
चलिये अब मुलाकात करते हैं
आलोक रंजन इन्दौर
मेरे महहूब ४८
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बात कुछ ऐसी है तेरी जो मेरा दिल दुखाती है
और कुछ ऐसी हैं बातें जो लेके पास आती है
समझ आता नही मैं इश्क का सज़दाकरूँ कैसे
कभी तू दिल जलाती है कभी दिल को लुभाती है
न दिल को चैन है मेरे न कोइ भी करार आये
मुझे, अपना बताती है मेरा हि दिल जलाती है
कहाँ से तेरे जैसी खूबसूरत मासुका लायें
मुझे नीदें न आती है तु कहती है कि आती है
मुझे लगता है मै कनफ्यूज हूँ तेरे अंदाज़े सूरत पे
पटाका तो नही लगती मगर लगती पटाकी है
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आलोक रंजन
मेरे अरमान
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मेरे कश्ती डूबनें से बच गइ मझधार में
आ गया कोइ फरिस्ता जैसे हो अवतार में
इस बुलंदी नें दिया बौछार करके रास्ता
हर तरफ चर्चा मेरी अब छप रही अखबार में
शर्त पे हम जी नही सकते तुम्हारे वास्ते
कुछ सुकूँ है जिन्दगी में अलहदें हैं रास्ते
मैं गिला सिकवा कोइ रखता नही हूँ आपसे
ज़िन्दगी जीता हूँ मैं बस प्रेम के एहसास से
आदमी को और क्या चहिये हमेशा खुश रहे
खेलती हँसती हमेशा ज़िंदगी नाज़ुक रहे
ग़म नही कोइ यहाँ कदमों में हो बस मस्तियां
दूर तक कोइ न उसके सामनें अब दुख रहे
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आलोक रंजन इन्दौर
मेरे महबूब ४९
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तेरा अब इंतज़ार करता हूँ
प्यार जानें बहार करता हूँ
ग़म के साये हैं पास में मेरे
इसलिये बेकरार रहता हूँ
मेरी आँखें है डबडबाइ सी
मुश्किलें भी हज़ार सहता हूँ
आज़कल दोस्त मेरी तनहाइ
बात अब बेशुमार करता हूँ
याद तेरी हि दिल पे छाइ है
आँख उससे हि चार करता हूँ
दर्द कितनें हैं देखकर जिनको
अब तो रंजन को यार कहता हूँ
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आलोक रंजन
सफ़र
🌺🌺🌺ग़ज़ल
फूल खिलते हैं मुस्कराते हैं
फिर ये कूड़े में फेंके जाते हैं
खुश्बू रहती है जिसके सीनें में
उनको हम धोखे दिये जाते हैं
दर्द तो उसको भी होता होगा
कच्ची कलियों को तोड़े जाते हैं
ज़िंदगी फूल बनके जी लेंगे
अब तो आदत है रोये जाते हैं
वो न जानें कहाँ के बाशिंदे
साँप पिच्छू फी खाये जाते हैं
गैर तो अपनें बनके पास आते
अपने तो दूर होते जाते हैं
ज़िंदगी के सफर हैं अनजानें
फिर भी रंजन चले हि जाते हैं
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आलोक रंजन इन्दौर
मेरे महबूब ग़ज़ल ५०
२१२२ २१२२ २१२
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सोचकर मैंने लिखा है खत तुम्हें
दे रहा हूँ मैं बहुत इज्जत तुम्हें
क्या पता मिल जाये इससे और भी
ज़िदगी में बेतहाँ शोहरत तुम्हें
इश्क तो मेरे लिये सज़दा है इक
हो रही क्यूँ मुझसे अब नफ़रत तुम्हें
मेरे दिल से खेलते हो क्यूं बता
तोड़ना हि दिल को क्या आदत तुम्हें
आज रंजन प्यार से कहता है ये
शायद इससे मिल सके राहत तुम्हें
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आलोक रंजन इन्दौरी
२१२२,,,,२१२२,,,,,२१२
ग़ज़ल
शायरी से इश्क होना चाहिये
थोड़ा हँसना थोड़ा रोना चाहिये
जब कभी याद आये उसकी तो उसे
दिल धड़कता है बताना चाहिये
रफ्ता रफ्ता हो हि जायेगा तुम्हें
इश्क में ग़म को छुपाना चाहिये
शहर है अब साफ़ दिखता देख लो
देश में सबको दिखाना चाहिये
ये कोरोना क्या कहें क्या क्या किया
इसको तो अब भाग जाना चाहिये
हमनें अपनी बात उससे कह दिया
उसको भी अपनी सुनाना चाहिये
देखकर बेहाल लोंगों की तरफ
कुछ मदद में आगे आना चाहिये
शर्म हि आती नही तुमको तो अब
अपनी इज्जत तो बचाना चाहिये
कौन है रंजन जो लिखता शायरी
उससे अब मिलना मिलाना चाहिये
आलोक रंजन इन्दौरी
ग़ज़ल
🌺🌺🌺
२१२२ १२२२ १२२
तुम नआये न वो सामान आया
हक़ तुम्हारा न कोइ कामआया
आँधियाँ चलती रही बारिशें थी
सामनें एक बेज़ुबान आया
राह में दूर तक अँधेरा था
फिर वहाँ छोटा सा मकान आया
पूछते थे तुम्हारे घर का पता
ठीक उस समय हि तूफान आया
शहर में शोर मचा है देखो
जानवर कौन सा अंजान आया
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आलोक रंजन इन्दौरी
ग़ज़ल
🌺🌺
तुम कभी मुझसे नहीं रूठा करो
ग़म कोइ हो तो मुझे पूछा करो
ज़िन्दगी में बहुत से हैं प्रश्न तो
ना किसी के सामनें टूटा करो
हर कोइ अपनी तरफ से सच हि है
क्या जरूरत है उसे झूठा कहो
सारी दुनियाँ में बहुत मशहूर हो
अब तो अपनें घर को ना लूटा करो
अपनी इज्जत खुद बचाना है तुझे
इस तरह बाहर नही घूमा करो
इश्क में अपनी बचाना शाख तुम
हर किसी का होठ ना जूठा करो
हम हैं रंजन रास्ते पहचान लो
हर मुसीबत से सदा जूझा करो
२१२२ २१२२ २१२
आलोक रंजन इन्दौरी
प्रभु वंदन
,,,,,,,,,,,,,,,,, बहर मुत़कारिब़ १२२ १२२१२२ १२२
बता दो तुम्हारा ठिकाना कहाँ है
तुम्हें है पता तुमको जाना कहाँ है
ये साँसों की डोरी प्रभू हाथ में है
वो कितना दयालू तू माना कहाँ है
तुम्हारी हकीकत वो सब जानता है
तुम्हें अपनें मुख से बताना कहाँ है
बतायेगा तुमको सही राह वो हि
कदम ये तुम्हारा बढाना कहाँ है
तु आया यहाँ पर ये है़ उसकी मर्जी
बतायेगा वो आशियाना कहाँ है
करम सच्चे कर लो बताना उसे तुम
कि तेरा यहाँ जाना आना कहाँ है
उसी की है हस्ती मिटा दे बना दे
तेरे बस में कुछ भी बनाना कहाँ है
कहो उस विधाता से दिल की मुरादें
न रंजन कोइ अब बहाना कहाँ है
आलोक रंजन
हाले ग़म
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मैं कभी ग़म ज़दा नही होता
तू अगर बेवफ़ा नही होता
ज़िदगी तेरा क्या यकीन करें
काश मुझसे दग़ा नही होता
रोज़ दुनियाँ यहाँ बदलती है
रोज़ कोइ सग़ा नही होता
सच को अपनी जुबाँ पे रखते हैं
उनको रिश्ते बदा नही होता
आजकल वो छुपे से रहते हैं
घर पे उनके पता नही होता
उनकी यादें हमें सतानें लगी
वरना ये रतजगा नही होता
रूठ कर बैठे हो बोलो रंजन
ये कोइ क़ायदा नही होता
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आलोक रंजन इन्दौरी
ग़ज़ल
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बस एक लफ़्ज महज़ उसको सुनानें के लिये
न जानें कितनें खत लिखे हम जमाने के लिये
वो एक खुश्बू है आती है बिखर जाती है
रात को रोज हि आती है सतानें के लिये
मेरी मुहब्बत हवाओं को संदेशे देकर
कहती रहती है उसे पास में आनें के लिये
न कोइ रिश्ता न परिचय न बोलचाल कोइ
कौन आया है मेरे घर को जलानें के लिये
मैं ग़म को पीनें की आदत को जगा लेता हूँ
क्या पता खुद हि वो कह दे पी जानें के लिये
कहाँ कहाँ न ढूढते हैं सच्चाइ की मिशाल
हमारी आदतें हैं सबको जगानें के लिये
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आलोक रंजन
सियासत भी न,,,,,
आदमी बन हि न पाये तो हुजूर है किसका
झूठी ख़बरें जो फैलाये तो कुसूर है किसका
जाके इंशानियत सीखो कहीं पहले तुम तो
बहकते जा रहे दिखता ये फितूर है किसका
अपनें लफ़्जों का इस तरहा न इस्तेमाल करो
देखकर लगता है नशे में ये सूरूर है किसका
तुम ग़रीबों की ज़मी भी किये हो नाम अपनें
तुम्हारा है नही तो बोलो गुरूर है किसका
आलोक रंजन इन्दौरी
कितनी मुश्किल से हमेशा वो गुज़र करते हैं
भूखे रहकर भी अपनी शाम सहर करते है
कोइ सुनता नहीं इनकी ये वक्त के सताये हैं
ये हैं मजदूर फिर भी हँसके स़फर करते हैं
ख़ुदा देखो इन्हें तेरी इनायत की जुरूरत है
सुना सारी हि दुनियाँ में तुम्हारी हि हुकूमत है
रहम की भीख माँगता हूँ मैं इनके लिए रंजन
सभीखुशियांइन्हें देनातुम्हारे पास हिकमत है
जो अपनें ग़म भुलाकर कर्म पथ पे चलते रहते हैं
रुकावट कोइ भी आये तो स्वयं से फिर संभलते हैं
उन्हें हक मंजिलों का मिल हि जाता एक दिन यूँ हि
नकारे लोग तो बस हाथ अपनें, मलते रहते है
आलोक रंजन इन्दौरी
जो भूखे रहके अपनें दिन बिताये जाते हैं
बस वही लोग यहाँ अब सताये जाते हैं
रोज़ लिखते हैं मुसीबत से भरी राहों को
ग़रीब नज़रों में सबकी बताये जाते हैं
कितना सच्चा हैं शराफ़त से भरा दिल इनका
झूठे केसों में ये हरदम फँसाये जाते हैं
घर के हालात बद से बदतर हैं देखो इनके
सुबहा खाये तो शाम बिन खाये रह जाते हैं
बच्चे क्या जानें पढाइ लिखाइ के जज्बे
ये तो मजदूर हि खुद को बनाये जाते हैं
देखकर दिल में बहुत दर्द सा उठता रंजन
कैसे हम इनकी मुसीबत बढा़ये जाते हैं
आलोक रंजन
प्यार का कैसा सलीक़ा सिखा गया कोइ
ढूँढनें जायें कहाँ मेरा दिल चुरा गया कोइ
अब कहीं चैन न मिलता है ना करार कोइ
कैसा ये रोग वो मुझको लगा गया कोइ
छुपाके रक्खा था बेदाग़ हमारा ये दिल
आज इस दिल का हि परदा उठा गया कोइ
जहाँ में तेरे सिवा और ना कोइ मेरा
बात लिखकरके हाथ में थमा गया कोइ
ये कंवारे थे मेरे हाथ खाली खाली से
अपनें हि नाम की मेंहदी रचा गया कोइ
मेरी बेताबी अब हद से भी गुज़र जायेगी
शहर इन्दौर का रंजन बता गया कोइ
आलोक रंजन इन्दौरी
कदम कदम पे नया इम्तिहान रखती हो
ज़िन्दगी तू भी मेरा कितना ध्यान रखती हो
मै बहक जाऊँ न जाकर तनहा
तुम मुझे याद दिला देती हो
नीदं, में जब भी मैं जाता हूँ
वक्त पे ठीत जगा देती हो
मेरी हर ख्वाहिशों का तुम सामान रखती हो
कदम कदम,,,,,
तेरा आशिक हूँ चाहता हूँ तुम्हें
मेरी दुनियाँ है मानता हूँ तुम्हें
जश्न तेरी खुशी का करता हूँ
कइ जन्मों से माँगता हूँ तुम्हें
तु मेरी सुबहा और मेरी शाम रखती हो
कदम कदम,,,,,
आलोक रंजन
मुझ जैसा कोइ और समर्पन नही मिलेगा
आँखों के जैसा मेरे दर्पन नही मिलेगा
मैं तेरे लिये दुनियाँ उठा लूँगा अपने सर
दिलदार कोइ और भी रंजन नही मिलेगा
सच्ची सलाहियत के वफादार हैं हम तो
मुझ जैसा कोइ तुमको सज्जन नही मिलेगा
ये कृष्ण की धरती है यहाँ भक्ति नाचती
इसके सिवा कहीं भी मधुबन नही मिलेगा
भारत की ये धरती है सनातन परंपरा की
ऐसा कोइ दुनियाँ में आँगन नही मिलेगा
हम करते हैं नैतिकता के फूल को सिंचित
हम जैसा कोइ तुमको तन मन नही मिलेगा
तुम जैसे भी रहना है रह लो यहाँ प्यारे
मेरी तरफ से तुमको बंधन नहि मिलेगा
आलोक रंजन इन्दौरी
सुर्ख आँखों के इस दरिया में बहा जाता हूँ
मुझे पता नही मैं क्या क्या कहा जाता हूँ
रात का चाँद आज हँसता नज़र आता है
मैं भी हँसकरके चाँदनी में नहा जाता हूँ
ज़िंदगी तूनें यहाँ ग़म दिये हमको जितनें
देख लो उनको खुशी से जो सहा जाता हूँ
जिस मुहब्बत के लिये हमनें गुज़ारी रातें
उसके बिन आज मैं तनहा हि रहा जाता हूँ
कैसे इल्ज़ाम दूँ मैं उसको बेवफाई का
वक्त की मार है बस इसकी सज़ा पाता हूँ
आलोक रंजन इन्दौरी
तुम्हारी शरण में बसर चाहता हूँ
कृपा की ज़रा सी नज़र चाहता हूँ
दुखों में हूँ डूबा ये सब बीत जाये
महकती हुइ सी सहर चाहता हूँ
प्रभू पूरी कर दो तमन्ना हमारी
तेरी दृष्टि की एक लहर चाहता हूँ
बहुत ठोकरें मैनें खाया जहाँ में
नहीं कोइ दूजा भँवर चाहता हूँ
जो माँगो वो मिलता है चौखट पे तेरे
सदा भक्ति तेरी अमर चाहता हूँ
करो मेरा उत्साह बर्धन प्रभू अब
मै रंजन तुम्हारा हि दर चाहता हूँ
आलोक रंजन इन्दौर मप्र
अपनें चेहरे के दाग़ तुम न दिखा पाओगे
सामनें आनें में यारा बहुत शरमाओगे
अपनी बातें जो बताते हि नही तुम हमको
आइना सामनें होगा तो छुपा पाओगे
इश्क के आग़ में जब जलके देख लोगे तो
आखिरी बार तो मुझसे हि दिल लगाओगे
पूछ लेंगी तेरी सखियाँ जो उदासी सबब
थोड़ा शरमाकेन मेरा नाम तो बताओगे
दर्द कब तक कोइ रक्खेगा छुपाकर दिल में
तुम किसी रोज़ हाले दिल को सुना जाओगे
ये ग़ज़ल आपकी गाना मैं चाहता रंजन
क्या मुझे गाके बस इक बार तुम सुनाओगे
आलोक रंजन इन्दौरी
: ये सोचकरके खुश हूँ के मेरे इंतज़ार में
रहता हैकोइ गुम अब मेरे हि प्यार में
सब कटती है कैसे मेरी अब क्या बतायें यार
शामिल हूँ मैं भी याद की उसकी कतार में
वक्त बतलायेगा कितनी है इनायत उसकी
मुझको चाहे न चाहे ये है उसके इख़्तियार में
बस तमन्ना है मेरी उसका अब दीदार करूँ
कबसे रंजन खड़े हैं बस उसी के इंतज़ार में
आलोक रंजन इन्दौरी
: देख लो न अब रंजन वक्त की ये फरमाइशें
घर में रोज़ खानें तो होटलों से आता है।।
बढ़ गइ बेरोज़गारी इस कदर यहाँ देखिये
दोनों वक्त की रोटी मुश्किलों से पाता हैै।।
आदमी तो गलती का एक बना पुतला है।
गलतियाँ न अब होंगी जो ये कसम खाता है
देखिये शहर रो रहा आपदा की आहट से।
बन रहे हैं रोज़ हजारों रोगियों का ताता है
जब भी कोइ ग़म मेरे दिल में आके रहता है
वक्त की करामातें दिल भी समझ पाता है
आदमी के बस में नहीं वक्त को ये पहचान ले
कितनी अपनी मजबूरियाँ वक्त पना जाता है
वक्त कितना ज़ालिम है ज़िदगी के हर मोड़पे
सच के रास्ते पे जो चलेउसको मिटा जाता है
आलोक रंजन इन्दौरी
: वक्त
*✍️* ✍️
वक्त हाथों से फिसलता जा रहा है
दिल मेरा ये हाथ मलता जा रहा है
अब दिलों में प्यार दिखता है नही
आज हर रिश्ता बदलता जा रहा है
ज़िंदगी की राह में अब आदमी भी
क्यूँ अकेला आज चलता जा रहा है
जानें कैसा डर ये फैला है जहाँ में
शख़्स हर अब तो सहमता जा रहा है
बढ़ रही दुस्वारियाँ कितनी बहुत
आदमी का दम निकलता जा रहा है
रोज़ कुछ आफ़त सुनाई दे रही
इंशाँ तो बस सर पटकता जा रहा है
कौन है जो दिल की बातें सुन सके
देखो रंजन सबकी सुनता जा रहा है
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आलोक रंजन इन्दौरी
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