मुक्तक
किनारे पर खड़े होकर नहीं तुझको मिलेगा कुछ
कदम आगे बढ़ाएगा तभी हासिल करेगा कुछ
नजर के सामने देखो यह दुनिया भागती कितनी
सभी के साथ तुम होलो नहीं मुश्किल यहां है कुछ
मेरी दीवानगी को तुम कहां पूरा समझते हो
मेरे खत में लिखी बातें अधूरा समझते हो
झटक कर जुल्फ तुम अपनी मेरा दिल तोड़ देते हो
मुझे लगता है अपनी जुल्फ का जूडा़ समझते हो
आलोक रंजन इंदौरी
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