मेरे हाथों से लिखे खत को जला देना तुम

मेरे हाथों से लिखे खत को जला देना तुम
इस तरह दिल से मेरी याद भुला देना तुम

जिसको तुम चाहो  हक तेरा है मेरा क्या है
मैंने जो सम्मा जलाया था बुझा देना तुम

मेरे गम  मुझको  कहां  चैन से  सोनें देंगे
हो सके तो  मुझे रातों को  सुला देना तुम

अब तो  ये जिंदगी  तन्हा गुजार लूंगा  मैं
याद  आकर न मेरा  दिल दुखा देना तुम

साथ में गुजरे हुए लम्हां जो कोई पूछे तो
एक  रंजन  है मेरा  यार  बता  देना  तुम

आलोक रंजन इंदौरी

Comments

Popular posts from this blog

स्वर्ण प्रभा

प्रिये एक कविता जो केवल मेरी कल्पना है

गुरू के चरणों में प्रेम के लिये पढें नित्य गुर्वाष्टकम्