मेरे महबूब
दिल
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आजकल तुम उदास रहते हो
क्यूँ नहीं दिल की बात कहते हो
झूठे इल्ज़ाम लग रहे तुम पर
इतनी ज़िल्लत भला क्यूँ सहते हो
वफा बरबाद भी कर सकती है
ये उल्टी धार है इसमें क्यूँ बहते हो
इश्क़ चलता फिरता मकाँ नही है
इतना आशाँ इसे क्यूँ समझते हो
इतनी शोहरत करोगे क्या बोलो
क़ायदे मे रहो ऐसे क्यूँ भटकते हो
ज़माना साथ है तेरे करो न गम रंजन
सुना है तुम सबके दिल में रहते हो
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आलोक रंजन
मातृभूमि
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सुखद प्रात लाइ है मुझको
संदेशे मुस्कान के
बाहें फैलाकर प्रभु देखे
तुमको आसमान से
कर्मशीलता पर अपनी तुम
उर्जा शक्ति लगा देना
आलस्यों को त्याग सदा
उत्साह राग को गा देना
गौरव हाशिल कर लोगे तुम
दुनियाँ और जहान से
सुखद,,,,,,,,
स्वविवेक से चलना पथ पर
कभी नही घबराना तुम
कदमों को तुम रोक देना
कभी नही इतराना तुम
सत्य सदा अपनाकर रखना
दिल में इसको ध्यान से
सुखद,,,,,,
अपनी वाणी मीठी रखना
कष्ट किसी को मत देना
स्वारथ में बहकर कोइ भी
कार्य नही तुम कर देना
प्रेम और करूणा अपनाकर
जीना तुम सम्मान से
सुखद,,,,,,,
धैर्य शक्ति को जीवित रखना
अपनें प्यारे जीवन में
निर्भय होकर बढ़ते जाना
मत फँसना तुम उल्झन में
मातृभूमि की महिमा गाते
रहना बंदे शान से
सुखद,,,,,,
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आलोक रंजन
याद
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याद करते हैं बहुत हम तुमको
दे दिया था जो पहले गम तुमको
बात इतनी सी मैं समझ न सकी
दे दिया था ये मेरा मन तुमको
और गहराइ में उतर हि गये
चाह रक्खूँगी हर जनम तुमको
एक पल का हि क्या वो मिलना था
दिल ये दे बैठे थे सनम तुमको
लाज रखना कि हम जो जिंदा हैं
अब मुबारक हो ये वतन तुमको
ले हि लेना मेरा अंदाज़े बयाँ
दिल का ये बागवाँ चमन तुमको
रात में सिसकियाँ चली हैं बहुत
दिल में कुछ बात है दफन तुमको
बात करना गुनाह है रंजन
कैसे आ जाती है शरम तुमको
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आलोक रंजन
घर जाना है
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जानें कब पहुँचेंगे घर कुछ पता नही है
ट्रेन लेट है लगता डर कुछ पता पता नही है
जैसे तैसे जगह मिली है यहाँ हमें अब
कट जायेगी रात मगर कुछ पता नही है
मुनियाँ से तो बात हुइ है मौबाइल पर
४बजे तक गाड़ी घर पहुँचा देगी बोली है
खेत कटैया करना है गेहूँ है तैयार
बैलों को बरसीम बुआना करुँ विचार
कितना है दूर सफर कुछ पता नही है
जानें कब,,,,,
रामू काका की लड़की की सादी है
याद बहुत करती मुझको भी दादी है
तीन साल तक दूर रहा हूँ घर से मैं
मन मेरा शहरों का बन गया आदी है
गाँवों पर है कितना असर कुछ पता नही है
जानें कब,,,,,,,
इतनी भीड़ सदा हि रहती है गाड़ी में
साँसें भी रूक जाती देखो नाड़ी में
मजबूरी है फिरभी यहाँ बैठना होगा
अपने अपने घर तक सबको पहुँचना होगा
ऊपर नीचे बैठे कितनें नर कुछ पता नही है
जानें कब,,,
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आलोक रंजन
[9/3, 7:21 PM] आलोक त्रिपाठी: मेरे महबूब २
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छोड़कर जा रहे मुझे तनहाँ
इस जहाँ मेंकहीं भी जाओगे
ये मुहब्बत की लकीरें मेरी
तुम कहीं भी न ढूँढ़ पाओगे
छोड़कर,,,,
रोज़ होगी लबों पे मेरी हँसी
जब भी तनहा कहीं भी बैठोगे
मेरी तस्बीर सामनें होगी
देखकर तुम भी मुस्कराओगे
छोड़कर,,,,,,
ज़िंदगी कैसे कैसे देख लेना
करवटें बदलकर बतायेगी
आशि़काना मिजाज मेरा ये
सोचकर मुझमें डूब जाओगे
छोड़कर,,,,,,
एक दिन तसल्ली से सोच लेना
मेरे संग गुज़रे उन लम्हातों को
देर हो जाये न तुझसे कोइ
वरना बस रात दिन पछताओगे
छोड़कर,,,,,
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आलोक रंजन
मेरे महहूब ३
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दूर से देखकर इशारों में
अपने दिल का बयान करते हैं
कैसी होती है वफा की नज़रें
हाल मुझसे बखान करते हैं
दूर से,,,,,,
रात कटती नहीं है तनहाइ
आँख नें फिर से नीर बरसाइ
अपने दिल पर वो रखके तस्बीरें
दिल को बस मेरे नाम करते हैं
दूर से,,,,,,
अश्क मोती से हैं इन्हें कैसे
अब संभालेंगे अपनें आँखों में
ये तो बह जाते हैं रुके कब हैं
दवा बनकर ये काम करते हैं
दूर से,,,,,,
रोक सकते नही दिल के अरमाँ
वक्त की ये भी एक जुरूरत है
दिल का हर दर्द दूर होता है
इश्क रंजन के नाम करते हैं
दूर से,,,,,,,,
सारी ये कायनात महकी सी
उसके आनें से आज लगती है
वो मेरे दिल का कोइ कोना है
हम मुहब्बत की शाम करते हैं
दूर से,,,,,
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आलोक रंजन
मेरे महहूब४
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इस दश्ते तसव्वुर नें तुझको हि देखा है
मेरे नसीब की तू प्यारी सी रेखा है
मेरे दिल का सुन लो कुछ दर्दे बयाँ मुझसे
ये इश्क का मारा है ये इसका पेशा है
नाराज़ नही होना ये दिल जब धड़के तो
आदत से है मजबूर कुछ दर्द समेटा है
आबाद हुये हैं बस तेरे मयखानें में
पीनें की लत नें भी क्या खूब लपेटा है
महफिल है मेरी रंगीं तेरे दिल में डूबी
तेरी आँखों का हि कुछ अश्क ये लेता है
कमबख्त ये दिल मुझको तेरी तहरीरों से
चुनकर गज़लों का रंग रंजनको देता है
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आलोक रंजन: मेरे महबूब ५
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मुझपे एतबार कर लिया होता
दिल के रस्ते गुजर लिया होता
दर्द तो निकला था चुपचाप मेरा
गुफ्तगू खुद से कर लिया होता
चाहने वाले से सिकवा न करो
इश्क़ दीदार गर किया होता
बंद मुट्ठी है कैसे दिखलाऊँ
तू भी ऐसा सफर किया होता
मैं हूँ मदहोश तेरी यादों में
मेरा कुछ रंग भर लिया होता
हुस्न का कुछ नया सा नज़राना
मेरे दिल के नज़र किया होता
मिल गया मुझको चाहने वाला
हँसके रंजन से कह दिया होता
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आलोक रंजन
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