प्रथम शिक्षिका माँ
माँ प्रथम शिक्षिका
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प्रथम शिक्षिका माँ है उसको वंदन है
रंजन करता बार बार अभिनंदन है
प्रथम,,,,
चूल्हे पर पकते भोजन की बेला में
लकड़ी से जमीन पर लिख क सिखलाया
करना सदा बड़ों की इज्जत ये भी बतलाया
गिनती बोल बोल कर हाथों से सिखवाया
गुरूजनों की महिमा पूरा समझाया
जिसकी साँसों का मुझमें स्पंदन है
प्रथम,,,,,,,,
कितनी दिनचर्या की पक्की प्रातःउठकर
हो पवित्र स्नान नित्य की वह पूजाकर
हमें जगाकर प्रभु वंदन का पाठ पढाया
कितनी धी उसकी शिक्षा वह मुझको हितकर
कहती कर स्नान लगाओ ये चंदन है
प्रथम,,,,,,,,
ठ़ढी के दिन चार बजे बैठाती मुझको
नैतिकता का सम्यक् पाठ पढ़ाती मुझको
शिक्षा हि धन होता है सबके जीवन में
मिलता है इससे संस्कार बताती मुझको
उसकी शिक्षा से जीवन आनंदम् है
प्रथम,,,,,,
झूठ कपट से रहना दूर सिखाती थी
चोरी और कुसंगति का परिणाम बताती थी
महापुरुष लोगों की रुचिर कहानी कहती
उनके पद चिन्हों की राह दिखाती थी
उसकी सीख मेरे मन का अब मधुवन है
प्रथम,,,,,
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आलोक रंजन
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