मेरे महबूब १२

मेरे महबूब १२
🌹🌹🌹🌹
ज़िंदगी तेरे ऊसूलों से वाकिफ़ हूँ मैं
कितनें वेदर्द ग़मों का भी साजि़श हूँ मैं
मौत क्या आयेगी मुझको वो मुझसे डरती है
मगर अपनों की शिकायत से आजिज़ हूँ मैं

बनके जो मेरे मेरे पास पास रहते हैं
मुझे जो अपना बड़ा ख़ाश ख़ाश कहते हैं
वक्त आनें पे बदल जाके मुखौटे उनके
ऐसे रिश्तों से हि हमतो उदास रहते हैं

मैं हूँ अम्बर तु जहाँ जायेगा मिल जाऊँगा
तुझे साये की तरहा मैं तो नज़र आऊँगा
दिल में रखता हूँ तुझे रब का बास्ता देकर
एक दिन तुझको लेके अपने श़हर आऊँगा

इश्क में उसनें नज़र से ग़ज़ल बनाया है
हूबहू तेरे हि चेहरे को आज़माया है
तेरे दीदार को तरसा है बहुत हि शायद
दिल के पन्नें पे नाम लिखा डाला है

बंद होंठों से उसने हाले दिल कहा मुझसे
कितनें दिन दूर आजकल वो रहा मुझसे
जानें कबतक  ये कोरोना हमें सतायेगा
आज मिलनें गया को दूर हि रहा मुझसे
🌹🌹🌹🌹
आलोक रंजन

Comments

Popular posts from this blog

स्वर्ण प्रभा

प्रिये एक कविता जो केवल मेरी कल्पना है

गुरू के चरणों में प्रेम के लिये पढें नित्य गुर्वाष्टकम्