ग़ज़ल बस एक लफ़्ज महज़ उसको सुनानें के लिये । न जानें कितनें खत लिखे हम जमानें के लिये ।।
ग़ज़ल
🌺🌺
बस एक लफ़्ज महज़ उसको सुनानें के लिये
न जानें कितनें खत लिखे हम जमाने के लिये
वो एक खुश्बू है आती है बिखर जाती है
रात को रोज हि आती है सतानें के लिये
मेरी मुहब्बत हवाओं को संदेशे देकर
कहती रहती है उसे पास में आनें के लिये
न कोइ रिश्ता न परिचय न बोलचाल कोइ
कौन आया है मेरे घर को जलानें के लिये
मैं ग़म को पीनें की आदत को जगा लेता हूँ
क्या पता खुद हि वो कह दे पी जानें के लिये
कहाँ कहाँ न ढूढते हैं सच्चाइ की मिशाल
हमारी आदतें हैं सबको जगानें के लिये
🌺🌺🌺🌺
आलोक रंजन
Comments