मेरी कविता संग्रह
मेरे महबूब २४
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जिक्र तेरा न किया था हमनें
कैसे चर्चे ये शरेआम हुए
लब तो ख़ामोश हि रहे मेरे
कैसे महफिल में बदनाम हुए
कितनी मँहगाइ बढ़ गयी देखो
जुरूरतों के सब सामान हुए
ग़रीब रोते हैं रोज़गार नहीं
हुकूमतों में कुछ न काम हुए
भींगकर आ रही है एक कली
उसके चेहरे के रंग बादाम हुए
सोच समझके उसनें हाँ कर दी
मेरे ये गीत उसके नाम हुए
इश्क मेंऔर हि एक दुनियाँ है
मिले रंजन तो चर्चा आम हुए
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आलोक रंजन
: संवेदना
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मेरी संवेदना गरजती
सत्पथ के अनुगामी बन
आहत और दुखों में डूबी
आँखों का तू पानी बन
नैतिक मुल्यों पर चलकर
औरों को प्रेरित करता चल
संस्कार सच्चे तथ्यों से
अपनी झोली भरता चल
पीढ़ी नई बना दे ऐसी
शिक्षा तू आगामी बन
आहत और,,,,,,,
स्वार्थ और परमार्थ भेद को
अच्छी तरह समझ ले तू
एक डुबा देगा तुमको
दूसरा पकड़कर चल ले तू
संचित पुण्यों को कर ले
अब ना आना कानी कर
आहत और,,,,,
अपनापन अपनाना सीखो
मानवता के रस्ते से
सत्कर्मों का पुंज बनों
ये बात समझ तू अच्छे से
सच्चे मन से मानव सेवा
कर तू मत अज्ञानी बन
आहत और दुखों,,,,
पग पग चलता चल तूं
पथ ये और सुगम हो जाये
तेरा कर्म तुझे जहाँन में
तुझको हि महकाये
जो अपना दुख कह ना पाते
उनकी आज जुबानीं बन
आहत और दुखों,,,,
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आलोक रंजन
: शरण आया हूँ मैं मइया मुझे अपना बना लेना
बहुत ग़म का सताया हूँ मेरे दुखड़े मिटा देना
सुना है तेरे दर आके मुरादें पूरी होती है
तू हि माँ है जगत की सबके दिल में तेरी ज्योती है
मेरी बिगड़ी बनाकर तू मेरा जीवन सजा देना
शरण आया,,,,,,,,
तेरे हि लाल हैं मइया तुझे तजकर कहाँ जायें
तेरी हि शक्ति कि महिमा तो ये सारा जहाँ गाये
बहुत अपराध हैं मेरे हैं उन्हें जड़ से मिटा देना
शरण आये,,,,,,
विधाता तू है इस जग की मिटाती पाप तुम सारे
बहुत नादान हूँ मइया न जानूँ भक्ति गुन सारे
ज़रा अपनी कृपा करके मुझे रस्ता दिखा देना
शरण ,,,,,,, आलोक रंजन भोजपुरी माँता भजन
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ललकी चुनरिया मइया तोहके ओढ़ाईं
गाइके भजनियाँ मइया तोहके रिझाईं
गाइके,,,,,
तोहरी सुरतिया लगे बड़ी प्यारी
हम एक लरिका तू ही महतारी
तोहरी चरनियाँ में दुखवा सुनाईं
गाइके,,,,,,
दर्शन तोहर कके दुख टलि जाला
तोहरे हि भक्ती से सब मिलि जाला
मनवाँ के बात आज तोहके बताईं
गाइके,,,,,
भटकीला कबसे न रस्ता मिलेला
तोहरी चरनियाँ सिरवा झुकेला
तोहरा के छोड़ बोलअ कहाँ अब जाईं
गाइके,,,,,
ममत के मुरती कहावेलू जगत में
अनधन भगती लुटावेलू जगत में
सिरवा पे हाथ रखअ तोहके मनाईं
गाइके,,,,,,
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आलोक रंजन इन्दौर मप्र
चेतना
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नज़र में है धोखा तो कैसे दिखेगा
जहाँ की ये झूठी पुरानी कहानी
सुनाते सुनाते नही थक रहे हम
तुम्हारी हि नज़रें तुम्हारी निशानी
भरोसा न करना किसी वेवफा का
बहुत दिख रहे दोस्त बनकरके तेरे
जवानी के दिन हैं संभलकरके रहना
कोइ लूट लेगा तुम्हें खानदानी
अजब सी दुनियाँ खबर भी न होती
कि कब कोइ अपना दिया एक झांसा
सजगता जरूरी कदम है उठाना
नही छींन लेगे तेरी जिंदगानी
कसम खाके कहते हैं हम हैं तुम्हारे
मगर छुपके करते हैं अपघात ये तो
बड़ी खूबसूरत हैं बातें निराली
मगर कर रहे हैं बहुत बेइमानी
कहाँ तक चलेंगे बनावटकेचेहरे
कभी तो कभी राज खुलके रहेगा
अगर हिम्मतों से सदा काम लो तो
दिला सकते हैं याद हम इनकी नानी
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आलोक रंजन
मेरे महबूब ३८
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तेरा चेहरा हैं नूर के जैसा
मैं खिंचा जा रहा हूँ अनजानें
मेरी सपनों की तुम हो शहजादी
और कोइ हुनर न हम जानें
रोज़ आती हो तुम खयालों में
मेरे हर जख्म के सवालों में
मै तुझे चाहनें लगा हूँ अब
चूमना चाहता हूँ गालों में
तेरी नज़रों का हूँ मैं दीवाना
रोशनी की हो एक नगीना तुम
मेरी हसरत की एक परी सी हो
मेरी काशी मेरी मदीना तुम
आज दिल तुझपे गीत लिखता है
हाले दिल अपना तुझसे कहता है
क्या बताऊँ तेरी मुहब्बत में
जानें रंजन क्या जुल्म सहता है
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आलोक रंजन
हिन्दी ग़जल
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हमारी शान है हिन्दी हमारी जान है हिन्दी
मेरा ईमान है हिन्दी मेरी पहचान है हिन्दी
चमन में फूल सब इसके वतन में हर तरफ फैले
सुभग नव गान है हिन्दी हमारी शान है हिन्दी
बहारों से कहो सज़दे में इसके कुछ करें आकर
सुधा रसपान है हिन्दी सुरीली गान है हिन्दी
नमन इसको करूँ दिल से ये मेरी माँ भी है हिन्दी
सरल आयाम है हिन्दी कोइ वरदान है हिन्दी
करें हम आरती इसकी ये वाणी है सदा मेरी
बहुत आसान है हिन्दी कड़ी ब्यायाम है मेरी
इसी की गोंद मे हम सब सदा खेले हैं खाये हैं
मेरा सम्मान है हिन्दी मेरा अभिमान है हिन्दी
न रंजन ग़म हमें अगरेजियत लगती नही अच्छी
हमारे नाम है हिंदी हमारे धाम है हिंदी
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आलोक रंजन
तुम मेरे गीतों में आते ५५
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रूप तेरा है सोना सोना
मैं इसमें खो जाता हूँ
तेरी यादों के पहलू में
अक्सर मै सो जाता हूँ
रूर तेरा है,,,,
जानें क्या मजबूरी मेरी
मुझको खींच रही ऐसे
तेरे बिन जीनें की तमन्ना
अब होगी बोलो कैसे
तुम तो अपना फर्ज निफाना
अपना मैं तो निभाता हूँ
रूप तेरा है,,,,,,
तू राधा मै मोहन तेरा
चारो तरफ लगायें फेरा
सात बचन के बंधन ले लें
साथ निभेगा तेरा मेरा
सच्चे मन से मै कहता हूँ
झूठ नही कह पाता हूँ
रूप तेरा है,,,,,,
घर आँगन सब रोशन होगा
तेरे कर कमलों से हि
खुश्बू मिलती रहेगी ऐसी
सुन्दर सुन्दर गमलों से हि
बग़वानी तुम मेरी सजाना
मै तुमको लिख जाता हूँ
रूप तेरा,,,,,,,,
आलोक रंजन
मेरे अरमान
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मेरे कश्ती डूबनें से बच गइ मझधार में
आ गया कोइ फरिस्ता जैसे हो अवतार में
इस बुलंदी नें दिया बौछार करके रास्ता
हर तरफ चर्चा मेरी अब छप रही अखबार में
शर्त पे हम जी नही सकते तुम्हारे वास्ते
कुछ सुकूँ है जिन्दगी में अलहदें हैं रास्ते
मैं गिला सिकवा कोइ रखता नही हूँ आपसे
ज़िन्दगी जीता हूँ मैं बस प्रेम के एहसास से
आदमी को और क्या चहिये हमेशा खुश रहे
खेलती हँसती हमेशा ज़िंदगी नाज़ुक रहे
ग़म नही कोइ यहाँ कदमों में हो बस मस्तियां
दूर तक कोइ न उसके सामनें अब दुख रहे
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आलोक रंजन इन्दौर
जय माँ सरस्वती
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ज्ञानदायिनि शुभ्र परिधन
ज्योति रूप सुहाषिनी
वेद पुस्तक धारिणी
जय जयतु वीणा वादिनी
शमन अज्ञानान्धकारिणि
शुभगवारिणि शुचिप्रदा
नवल दिब्ययुता सुधा
जय जयतु माँ वेदप्रदा
सुख प्रदात्रि त्रिदोष हारिणि
अचल निधि आशीष दो
प्रकृति मोहित विदित जग
सानिध्यता की प्रीत दो
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आलोक रंंजन इन्दौर
हे भारत
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हे भारत जग वंदित तुम हो
तेरा मैं गुणगान करूँ
तुझ पर हि अभिमान करूँ
हे भारत,,,,
आशायें हैं तुझसे अगणित
तुझ पर आश्रित कितनें आँखें
तेरा सुखद प्रेमयुत मधुवन
जिसमें चलती हैं साँसें
तेरे चरणों में नित मैं अब
शत शत् बार प्रणाम करूँ
हे भारत,,,,,,,
हृदय प्रफुल्लित हो जाता है
तेरे पावन स्पर्शों से
नव जीवन मिल जाता मुझको
तेरे अद्भुत आदर्शों से
तेरे हि सानिध्य में मै अब
निश दिन हि आराम करुँ
हे भारत,,,,,,,
शौर्य तुम्हारा आशान्वित है
युगल नयन में मेरे देखो
परिपूर्णता सजगता मेरी
तेरे हि दर्शन में देखो
संस्कार मेरे हैं तेरी
आँखों में विश्राम करूँ
हे भारत,,,,,,
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आलोक रंजन इन्दौ
तुम मेरे गीतों मे आते ६५
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आँखों से आँखें मिल जाये
मिल जाये दिल से दिल
मन से मन मिल जाये जो
तो क्या हो फिर मुश्किल
तन से तन का हो स्पर्श
प्रेम रस बरस पड़ेगा हर जीवन मस्त रहेगा
फिर तो खुशियाँ छा जायेगी
आँखें जल बरसा जायेगी
एक दूजे के नयनों में हि
नई ज्योत भी जल जायेगी
शाश्वत पथ विहँसेगा हर जीवन मस्त रहेगा
नये नये संकल्प खिलेंगे
हम दोनों जब यहाँ मिलेंगे
अद्भुत क्षण होगा कुछ ऐसा
तेरे मेरे पुष्प खिलेंगे
नित नूतन खुश्बू होगी
ये आँगन फिर से महकेगा हर जीवन मस्त रहेगा
अपनें अपनें गौरव होगें
मर्यादा के मापदंड पर
झूम उठेंगे दोनों मिलकर
अपनें इस प्यारे आनंद पर
सुख दुख अपना बाँट सकेंगे
अपना तो सर्वस्व रहेगा हर जीवन मस्त रहेगा
प्रेम रस बरष पड़ेगा जीवन मस्त रहेगा
आलोक रंजन इन्दौर
मुझसे सवाल मत कर
दिल में मलाल मत कर
मैं तुझको चाहता हूँ
मुझसे हि चाल मत कर
संयोग हि बना है
तेरा लड़कपना है
तू फिर सोच लेना
जल्दी कोइ कहाँ है
जल्दी के फैसले से
कोइ बवाल मत कर
मुझसे,,,,,,,,
ये ज़िंदगी है तेरी
तुझको हि सोचना है
सारी बुराइयों को
तुझको हि रोकना है
पढ़ लिख के नौकरी कर
मुझको बेहाल मत कर
मुझसे,,,,,,,
तू मेरा है तभी तो
समझा रहा हूँ तुमको
जीवन का अपनें अनुभव
बतला रहा हूँ तुमको
बातों को जान जानके
मेरी तू टाल मत कर
मुझसे,,,,
मम्मी की बात मानो
पापा की बात मानो
ये तुझको चाहते हैं
कुछ भावना पहचानों
बेटा तू अपनें मन से
गलती बेढाल मत कर
मुझसे,,,,
शुरूवात है तुम्हारी
ये ज़िदगी की पहली
पैसे कमाके लायेगा
बार जब तू पहली
मुझसे हिसाब कोइ
आँखें, निकाल मत कर
मुझसे,,,,,,
मै बाप हूँ तुम्हारा
चलना तुझे सिखाया
तुझको पढा लिखाकर
रस्ता तुझे दिखाया
जो त्याग मैं किया हूँ
उसको बेकार मत कर
मुझसे,,,,,,
दुनियाँ है तू हमारी
तुझपर गुरूर मुझको
देता है दिल दुवायें
मेरा जरूर तुझको
मेरे बुढापे में तू
तीखा सवाल मत कर
मुझसे,,,,,
मै हूँ आलोक रंजन
लिखता हूँ फलसफे कुछ
माँ बाप को दिया है
जिसनें यहाँ कोइ दुख
बेटे हैं वो नालायक़
तू उनकी बात मत कर
मुझसे,,,,,.
आलोक रंजन इन्दौर
पल पल खुशियाँ छाई होंगी
जीवन की बाग़ानों में
तुम शायद शरमा जाओगे
दिल की बात बतानें में
हम तेरे आशिक़ बन आये
मेरे दिल पर तुम छा जाते
तुम मेरे गीतों,,,,,,,
अद्भुत है श्रृंगार तुम्हारा
देख बहुत हर्षित हूँ मैं
हर पल तेरे दर्शन को हि
कितना लालायित हूँ मैंं
कोमल सारे अंग तुम्हारे
मुझको आकर्षित कर जाते
तुम मेरे,,,,,
बंधन कोइ अब न रहेगा
तेरे मेरे बीच प्रिये
सच्ची अच्छी बातें होगी
तेरी मेरी प्रीत प्रिये
आ जाना मेहमान हि बनकर
हम तेरा स्वागत कर पाते
तुम मेरे,,,,,
सुन्दर सुन्दर फूल यहाँ हैं
मेरी बग़िया के देखो
चमक रही है खुश होकरके
ये मेरी अँखिया देखो
कितनी किया प्रतिक्षा तेरी
अब तो मेरी प्यास बुझाते
तुम मेरे,,,,,
आलोक रंजन इन्दौर
: हृदय में तेरी भक्ति घर चाहता हूँ
मैं अब प्रीत तुमसे अमर चाहता हूँ
बना दो प्रभू मेरे जीवन को कुंदन
तुम्हारी शरण में बसर चाहता हूँ
मैं दुनियाँ से कितना सताया गया हूँ
बहुत बार मूरख बनाया गया हूँ
मगर एक सहारा हमेशा है तेरा
जहाँ के सितम से रुलाया गया हूँ
संभालो मुझे मैं भटक भी न जाऊँ
पुकारे तुझे साँस हर चाहता हूँ
तुम्हारी,,,,,,
बरसता है आँखों से मेरे जो पानी
ये मेरे हि अपनों की है मेहरबानी
कहाँ तक सुनाऊँ तुम्हें तो पता है
मेरी दास्ता मेरी हर वो कहानी
बहुत थक गया हूँ जमानें में तेरे
सरल अब कोइ सी डगर चाहता हूँ
तुम्हारी,,,,,
मै खुश हूँ मुझे याद तेरी है रहती
मेरी हर नज़र तेरे चरणों में रहती
बरसती है करूणा कृपा है तुम्हारी
ये आँखें तेरे दर पे तकती हि रहती
पुकारा हैं अपना तुम्हें जानकरके
भरोसा तो अब उम्रभर चाहता हूँ
तुम्हारी,,,,
आलोक रंजन इन्दौरी
: पिता
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छत्र बनकर ज़िदगी को छाँव देता है पिता
हर कदम पर अनुभवों का भाव देता है पिता
हाथ जिसके पकड़के सीखा हूँचलना मैं यहाँ
हर कदम साहस का ऐसा गाँव देता है पिता
धैर्य देकर मन को जो समझाता है वो है पिता
भावनाओं को हमारे जो सजाता है पिता
सात्वनायें जिसकीम मेरे ज़िदगी को खुशी दे
एक ऐसी भंगिमाओं को बनाता है पिता
जब बहुत थककरके मेरे डगमग होते हैं
तब पिता के हि सहारे शक्ति मिलती हैमुझे
जो मेरे आकाश को विस्तार देकर सींचता
स्वाँस में जिसके हमारी स्वाँस मिलती है मुझे
रात दिन जो एक करके मेरे जीवन के लिये
खोजता है पथ नया मेरी भलाइ के लिये हो
अपनी सब सामर्थ्यं देकर पुष्ट करता है सदा
वो पिता हि है जो बस जीता भलाइ के लिये
जिंदगी को एक नया संसार देता है पिता
हर कदम पर हि कोइ आधार देता है पिता
पंख अपना देके उड़नें की मुझे देता सलाह
क्या कहें रंचन कि कितना प्यार देता है पिता
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आलोक रंजन इन्दौर
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