जमाना एक दरिंदा है


ग़ज़ल
जमाना एक दरिंदा है गरीबों को सताता है
कोई आंसू छुपाता है कोई आंसू बहाता है

नहीं कोई किसी का है यहां पर सब पराए हैं
सभी झूठे यहां रिश्ते भले कोई जताता है

नहीं है खौफ कोई भी यहां मनमानियां होती
कोई कानून का डर भी नहीं उनको डराता है

यहां मजबूरियां देखो बहुत छाई उदासी है
कोरोना काल बन करके किसी को छीन
 जाता है
सितम इतना कि अब बर्दाश्त के बाहर हुआ जाता
न रोजी रोटी है जिंदा न कोई काम आता है

आलोक रंजन इंदौरी

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