ग़ज़ल

दोस्ती  के  दायरे में   नफरतों  की  बू  न  हो
ये दुवा करना किसी की आंख में आंसू न हो

जिंदगी के हर कदम पर प्यार ही कायम रहे
इक मुहब्बत के सिवा बस कोई आरजू ना हो

आशिकी करने की जुर्रत करना भी बेकार है
गर तुम्हारे दिल  में कोई हुस्न की खुश्बू ना हो

कौन इज्जत दे सकेगा तुमको अपने दिल में अब
जब तुम्हारी सोच में उसकी ही आबरू ना हो

जिंदगी जब खिलखिला हट मुस्कुराहट छीन ले
और भी बढ़ जाता गम जब दोस्त का पहलू हो

आलोक रंजन इंदौरी

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