ग़ज़ल सब्र का बांध तोड़ते क्यूं हो
सब्र का बांध तोड़ते क्यूं हो
अपना ही राज खोलते क्यूं हो
इस सियासत का फायदा क्या है
हर सुबह कड़वा बोलते क्यूं हो
*कद्र करना तो सीख लो तुम भी*
फ़र्ज़ से मुंह को मोड़ते क्यूं हो
सारी जनता निराश हैं तुमसे
फिर भी अब हाथ जोड़ते क्यूं हो
हर बुरे वक्त में मैं साथ रहा
साथ मेरा ही छोड़ते क्यूं हो
धीरे चल कर के ये सफर देखो
क्या है जल्दी भी दौड़ते क्यूं हो
चाहते हो क्या सीधा सीधा कहो
दिल ये रंजन टटोलते क्यूं हो
आलोक रंजन इंदौरवी
Comments