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ग़ज़ल

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मैं तुम्हें समझा करूं और तुम मुझे समझा करो छोटी छोटी बात में कोई न अब शिकवा करो जिंदगी के फूल में अनुराग है सौहार्द है साथ में रहकर मेरे तुम भी ज़रा महका करो रोशनी मिलती रहेगी गर दिलों में प्यार है नेक रस्ते पर चलोगे बस यही वादा करो इस चमन का फूल बनकर हम भी मुस्काया करें सांस के हर तार पर प्रभुनाम जप जाया करो चांदनी गुलजार कर देगी तुम्हारी राह को अपनी मंजिल की तरफ चुपचाप बढ़ जाया करो गम कोई आए अगर तो तुम खुशी से झेलना दर्द भी इक है दवा इससे न घबराया करो आसुओं के रूप में जो जल बरसता जा रहा तुम नही रंजन कभी औरों को बतलाया करो आलोक रंजन इंदौरी

ग़ज़ल

दोस्ती  के  दायरे में   नफरतों  की  बू  न  हो ये दुवा करना किसी की आंख में आंसू न हो जिंदगी के हर कदम पर प्यार ही कायम रहे इक मुहब्बत के सिवा बस कोई आरजू ना हो आशिकी करने की जुर्रत करना भी बेकार है गर तुम्हारे दिल  में कोई हुस्न की खुश्बू ना हो कौन इज्जत दे सकेगा तुमको अपने दिल में अब जब तुम्हारी सोच में उसकी ही आबरू ना हो जिंदगी जब खिलखिला हट मुस्कुराहट छीन ले और भी बढ़ जाता गम जब दोस्त का पहलू हो आलोक रंजन इंदौरी

ग़ज़ल

दोस्ती  के  दायरे में   नफरतों  की  बू  न  हो ये दुवा करना किसी की आंख में आंसू न हो जिंदगी के हर कदम पर प्यार ही कायम रहे इक मुहब्बत के सिवा बस कोई आरजू ना हो आशिकी करने की जुर्रत करना भी बेकार है गर तुम्हारे दिल  में कोई हुस्न की खुश्बू ना हो कौन इज्जत दे सकेगा तुमको अपने दिल में अब जब तुम्हारी सोच में उसकी ही आबरू ना हो जिंदगी जब खिलखिला हट मुस्कुराहट छीन ले और भी बढ़ जाता गम जब दोस्त का पहलू हो आलोक रंजन इंदौरी

गीत

 एक अनूठी राग बनकर जिंदगी में छा गई मैं खुशी  से झूमता हूं गीत ऐसा गा गई मैं बहुत मजबूर था तन्हाइयों के साथ में वक्त का था मैं सताया कुछ नहीं था हाथ में रात दिन सुनसान राहों पर सफर करता रहा बेगुनाही की सजा पर आह भी भरता रहा एक खुशबू की तरह वह मुझको भी महका  गई मैं खुशी में,,,,,, जिंदगी के रूप कितने जान पाया भी नहीं कोई सिर पर हाथ रख कर के बताया भी नहीं मैं अकेला ही लड़ा लहरों की लंबी जंग को हाथ मेरा पकड़ने को कोई आया भी नहीं एक जिज्ञासा हमारे भाग्य को चमका गई मैं खुशी में,,,,, सत्य संकल्पों का दीपक हाथ में मेरे रहा दृढ़ प्रतिज्ञा का पिटारा साथ में मेरे रहा मंजिलों तक पहुंचने का ही जुनून छाया रहा कर्म पथ का आकलन भी पास में मेरे रहा मेरी किस्मत मेंहनतों के रंग से नहला गई मैं खुशी में,,,,, आलोक रंजन इंदौरी

वक्त का सिलसिला गीत

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दीप जलता रहा रोशनी के लिए पर हवाएं बुझाने की कोशिश में थी वक्त का सिलसिला यूं ही चलता रहा आंधियां घर जलाने की कोशिश मे थी वक्त का सिलसिला,,, मैं अकेला कदम साध कर चल दिया मंजिलों की तरफ मेरा संकल्प था राह में कितनी ठोकर मिली गम नही इतना कमजोर मेरा भी वो तप न था तेज काली घटाएं घिरी थी बहुत वो तो मुझ को डराने की कोशिश में थी वक्त का सिलसिला,,,, आजमाइश मेरी एक चाहत रही मेरे दिल में बसी उसकी तस्वीर है मेरे ख्वाबों की रानी मेरी दिल्लगी बस वही मेरे सपनों की जागीर है इश्क में जो कदम मेरे बढ़ते रहे वो भी दिल से लगाने की कोशिश में थी वक्त का सिलसिला,,, मुझको मेरी मुकद्दर ने धोखा दिया हार मानी न मैंने कभी राह में बनके खुशबू मुझे ऐसे वो मिल गई एक दिन आ गई थी मेरी बांह में मैं महकता रहा और हंसता रहा सारी दुनिया रुलाने की कोशिश में थी वक्त का सिलसिला,,, आलोक रंजन इंदौरी

ग़ज़ल इशारों में कह कर बता दीजिएगा

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गजल ------- इशारों में कह कर बता दीजिएगा यही एक मुझको सज़ा दीजिएगा अगर चाहते हैं मुझे आप दिल से नइ  कोइ तोहमत लगा दीजिएगा जो वह पूछते आये गा नाम मेरा पता मेरा उसको बता दीजिएगा मैं अब सो रहा हूं ग़मों के वतन में कभी आके मुझको जगा दीजिएगा मैं समझूं ये जिंदा है मेरी मुहब्बत गले आप मुझको लगा लीजिएगा आलोक रंजन इंदौरी

जमाना एक दरिंदा है

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ग़ज़ल जमाना एक दरिंदा है गरीबों को सताता है कोई आंसू छुपाता है कोई आंसू बहाता है नहीं कोई किसी का है यहां पर सब पराए हैं सभी झूठे यहां रिश्ते भले कोई जताता है नहीं है खौफ कोई भी यहां मनमानियां होती कोई कानून का डर भी नहीं उनको डराता है यहां मजबूरियां देखो बहुत छाई उदासी है कोरोना काल बन करके किसी को छीन  जाता है सितम इतना कि अब बर्दाश्त के बाहर हुआ जाता न रोजी रोटी है जिंदा न कोई काम आता है आलोक रंजन इंदौरी

मेरे हाथों से लिखे खत को जला देना तुम

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मेरे हाथों से लिखे खत को जला देना तुम इस तरह दिल से मेरी याद भुला देना तुम जिसको तुम चाहो  हक तेरा है मेरा क्या है मैंने जो सम्मा जलाया था बुझा देना तुम मेरे गम  मुझको  कहां  चैन से  सोनें देंगे हो सके तो  मुझे रातों को  सुला देना तुम अब तो  ये जिंदगी  तन्हा गुजार लूंगा  मैं याद  आकर न मेरा  दिल दुखा देना तुम साथ में गुजरे हुए लम्हां जो कोई पूछे तो एक  रंजन  है मेरा  यार  बता  देना  तुम आलोक रंजन इंदौरी

तेरा इंतजार है

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हर लम्हा तेरा मुझको अब इन्तज़ार है तुम बस गए हो दिल में मुझे तुमसे प्यार है तनहाइयां मुझे अब सोने नहीं देती तकती हैं जिसको आंखें जाने बहार है बेचैन सा रहता हूं देखो न हर घड़ी दिल पर कहां मुझे अब इख्तियार है नासाज़ दिल कि दास्तां किसको सुनाऊं मैं तुम खुद बता दो यार ये दिल बेकरार है इस मेरी दिल्लगी की हक़ीक़त तो जान लो जीता हूं बस तेरे लिए तेरा इंतज़ार है रंजन की आशकी को ज़माना भी जानता रोते को हंसानें की हुनर मुझमें यार है आलोक रंजन इंदौरी

मुक्तक

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किनारे पर खड़े होकर नहीं तुझको मिलेगा कुछ कदम आगे बढ़ाएगा तभी हासिल करेगा कुछ नजर के सामने देखो यह दुनिया भागती कितनी सभी के साथ तुम होलो नहीं मुश्किल यहां है कुछ मेरी दीवानगी को तुम कहां पूरा समझते हो मेरे खत में लिखी बातें अधूरा समझते हो झटक कर जुल्फ तुम अपनी मेरा दिल तोड़ देते हो मुझे लगता है अपनी जुल्फ का जूडा़ समझते हो आलोक रंजन इंदौरी

मेरी कविता संग्रह

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मेरे महबूब २४ 🌺🌺🌺🌺 जिक्र तेरा न किया था हमनें कैसे चर्चे ये शरेआम  हुए लब तो ख़ामोश हि रहे मेरे कैसे महफिल में बदनाम हुए कितनी मँहगाइ बढ़ गयी देखो जुरूरतों के सब सामान हुए ग़रीब रोते हैं रोज़गार नहीं हुकूमतों में कुछ न काम हुए भींगकर आ रही है एक कली उसके चेहरे के रंग बादाम हुए सोच समझके उसनें हाँ कर दी मेरे ये गीत उसके नाम हुए इश्क मेंऔर हि एक दुनियाँ है मिले रंजन तो चर्चा आम हुए 🌺🌺🌺🌺🌺 आलोक रंजन : संवेदना 🌺🌺🌺 मेरी संवेदना गरजती सत्पथ के अनुगामी बन आहत और दुखों में डूबी आँखों का तू पानी बन नैतिक मुल्यों पर चलकर औरों को प्रेरित करता चल संस्कार सच्चे तथ्यों से अपनी झोली भरता चल पीढ़ी नई बना दे ऐसी शिक्षा तू आगामी बन आहत और,,,,,,, स्वार्थ और परमार्थ भेद को अच्छी तरह समझ ले तू एक डुबा देगा तुमको दूसरा पकड़कर चल ले तू संचित पुण्यों को कर ले अब ना आना कानी कर आहत और,,,,, अपनापन अपनाना सीखो मानवता के रस्ते से सत्कर्मों का पुंज बनों ये बात समझ तू अच्छे से सच्चे मन से मानव सेवा कर तू मत अज्ञानी बन आहत और दुखों,,,, पग पग चलता चल तूं पथ ये और सुगम हो जाये तेरा कर्म तुझे...

मेरी ग़ज़ल संग्रह आलोक रंजन इन्दौरी

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ग़ज़ल मिलते रहे सभी से मगर अजनबी रहे २१२.  २१२१.१२२१.२१२ आवारगी तुम्हारी कैसे कोइ सहे अपनी हि आशिकी में मशरूख तुम हुए आराम अब करो तुम लिखकरके शायरी ये शायरी पटल पर सजती यूं हि रहे आँखों की रोशनी तो कमजोर हो रही देता नही दिखाइ जाकर कोइ कहे बेकार की कोइ भी चिंता नही मुझे दिखती नहीं कमाइ केसे कोइ  कहे होकर अधीर बैठा हूँ थक न जाऊँ मैं रचना कई बनायी  हम खुश बहुत हुए मन की मुराद लेकर आया हूँ तेरे द्वार करना न जग हँसाइ रंजन यही कहे  आज की बेटियाँ 🌺🌺🌺🌺🌺 घर की जिम्मेदारी अब रखके अपनें कंधे पे सबके विश्वास को जगानें लगी बेटियाँ करके पढ़ाइ अब नौकरी में चारो तरफ देश और विदेश में भी जानें लगी बेटियाँ टेक्निकल के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान बस और टेक्सी चलानें लगी बेटियाँ राजनीति कूटनीति सारे संविधान जान जनता को देश की जगानें लगी बेटियाँ आइएस में टाप कर बनी बड़ी अफसर नीयम कानून समझाने लगी बेटियाँ घर से लेके बाहर की दुनियाँ जहान में अब नारियों के नाम को सजानें लगी बेटियाँ 🌺🌺🌺🌺🌺🌺 आलोक रंजन इन्दौर  मेरे महबूब ४१ 🌺🌺🌺🌺 आज तनहाइ में कुछ अश्क बहाया मैंने...

ग़ज़ल अपनें चेहरे के दाग़ तुम न दिखा पाओगे

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अपनें चेहरे के दाग़ तुम न दिखा पाओगे सामनें  आनें  में  यारा बहुत  शरमाओगे अपनी बातें जो बताते हि नही तुम हमको आइना  सामनें  होगा  तो छुपा  पाओगे इश्क के आग़ में जब जलके देख लोगे तो आखिरी बार तो मुझसे हि दिल लगाओगे पूछ लेंगी तेरी सखियाँ जो उदासी सबब थोड़ा  शरमाकेन मेरा नाम तो  बताओगे दर्द कब तक कोइ रक्खेगा छुपाकर दिल में तुम किसी रोज़ हाले दिल को सुना जाओगे ये ग़ज़ल आपकी गाना मैं चाहता रंजन क्या मुझे गाके बस इक बार तुम सुनाओगे आलोक रंजन इन्दौरी

प्यार का कैसा सलीक़ा सिखा गया कोई

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प्यार का कैसा सलीक़ा सिखा गया कोइ ढूँढनें जायें कहाँ मेरा दिल चुरा गया कोइ अब कहीं चैन न मिलता है ना करार कोइ कैसा  ये रोग वो  मुझको लगा गया कोइ छुपाके रक्खा था बेदाग़ हमारा  ये  दिल आज इस दिल का हि परदा उठा गया कोइ जहाँ में तेरे  सिवा  और  ना कोइ  मेरा बात लिखकरके हाथ में थमा गया कोइ ये कंवारे थे  मेरे हाथ  खाली खाली  से अपनें हि नाम की मेंहदी रचा गया कोइ मेरी बेताबी अब हद से भी गुज़र जायेगी शहर इन्दौर का  रंजन बता गया  कोइ आलोक रंजन इन्दौरी

ग़ज़ल बस एक लफ़्ज महज़ उसको सुनानें के लिये । न जानें कितनें खत लिखे हम जमानें के लिये ।।

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ग़ज़ल 🌺🌺 बस एक लफ़्ज महज़ उसको सुनानें के लिये न जानें कितनें खत लिखे हम जमाने के लिये वो एक खुश्बू है आती है बिखर  जाती है रात को रोज हि आती है सतानें  के लिये मेरी  मुहब्बत  हवाओं  को  संदेशे   देकर कहती रहती है उसे पास में आनें के लिये न कोइ रिश्ता न परिचय न बोलचाल कोइ कौन आया है मेरे घर को जलानें के  लिये मैं ग़म को पीनें की आदत को जगा लेता  हूँ क्या पता खुद हि वो कह दे पी जानें के लिये कहाँ कहाँ न ढूढते हैं सच्चाइ की मिशाल हमारी आदतें हैं  सबको जगानें  के   लिये 🌺🌺🌺🌺 आलोक रंजन