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मेरे हाथों से लिखे खत को जला देना तुम

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मेरे हाथों से लिखे खत को जला देना तुम इस तरह दिल से मेरी याद भुला देना तुम जिसको तुम चाहो  हक तेरा है मेरा क्या है मैंने जो सम्मा जलाया था बुझा देना तुम मेरे गम  मुझको  कहां  चैन से  सोनें देंगे हो सके तो  मुझे रातों को  सुला देना तुम अब तो  ये जिंदगी  तन्हा गुजार लूंगा  मैं याद  आकर न मेरा  दिल दुखा देना तुम साथ में गुजरे हुए लम्हां जो कोई पूछे तो एक  रंजन  है मेरा  यार  बता  देना  तुम आलोक रंजन इंदौरी

तेरा इंतजार है

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हर लम्हा तेरा मुझको अब इन्तज़ार है तुम बस गए हो दिल में मुझे तुमसे प्यार है तनहाइयां मुझे अब सोने नहीं देती तकती हैं जिसको आंखें जाने बहार है बेचैन सा रहता हूं देखो न हर घड़ी दिल पर कहां मुझे अब इख्तियार है नासाज़ दिल कि दास्तां किसको सुनाऊं मैं तुम खुद बता दो यार ये दिल बेकरार है इस मेरी दिल्लगी की हक़ीक़त तो जान लो जीता हूं बस तेरे लिए तेरा इंतज़ार है रंजन की आशकी को ज़माना भी जानता रोते को हंसानें की हुनर मुझमें यार है आलोक रंजन इंदौरी

मुक्तक

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किनारे पर खड़े होकर नहीं तुझको मिलेगा कुछ कदम आगे बढ़ाएगा तभी हासिल करेगा कुछ नजर के सामने देखो यह दुनिया भागती कितनी सभी के साथ तुम होलो नहीं मुश्किल यहां है कुछ मेरी दीवानगी को तुम कहां पूरा समझते हो मेरे खत में लिखी बातें अधूरा समझते हो झटक कर जुल्फ तुम अपनी मेरा दिल तोड़ देते हो मुझे लगता है अपनी जुल्फ का जूडा़ समझते हो आलोक रंजन इंदौरी

मेरी कविता संग्रह

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मेरे महबूब २४ 🌺🌺🌺🌺 जिक्र तेरा न किया था हमनें कैसे चर्चे ये शरेआम  हुए लब तो ख़ामोश हि रहे मेरे कैसे महफिल में बदनाम हुए कितनी मँहगाइ बढ़ गयी देखो जुरूरतों के सब सामान हुए ग़रीब रोते हैं रोज़गार नहीं हुकूमतों में कुछ न काम हुए भींगकर आ रही है एक कली उसके चेहरे के रंग बादाम हुए सोच समझके उसनें हाँ कर दी मेरे ये गीत उसके नाम हुए इश्क मेंऔर हि एक दुनियाँ है मिले रंजन तो चर्चा आम हुए 🌺🌺🌺🌺🌺 आलोक रंजन : संवेदना 🌺🌺🌺 मेरी संवेदना गरजती सत्पथ के अनुगामी बन आहत और दुखों में डूबी आँखों का तू पानी बन नैतिक मुल्यों पर चलकर औरों को प्रेरित करता चल संस्कार सच्चे तथ्यों से अपनी झोली भरता चल पीढ़ी नई बना दे ऐसी शिक्षा तू आगामी बन आहत और,,,,,,, स्वार्थ और परमार्थ भेद को अच्छी तरह समझ ले तू एक डुबा देगा तुमको दूसरा पकड़कर चल ले तू संचित पुण्यों को कर ले अब ना आना कानी कर आहत और,,,,, अपनापन अपनाना सीखो मानवता के रस्ते से सत्कर्मों का पुंज बनों ये बात समझ तू अच्छे से सच्चे मन से मानव सेवा कर तू मत अज्ञानी बन आहत और दुखों,,,, पग पग चलता चल तूं पथ ये और सुगम हो जाये तेरा कर्म तुझे...

मेरी ग़ज़ल संग्रह आलोक रंजन इन्दौरी

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ग़ज़ल मिलते रहे सभी से मगर अजनबी रहे २१२.  २१२१.१२२१.२१२ आवारगी तुम्हारी कैसे कोइ सहे अपनी हि आशिकी में मशरूख तुम हुए आराम अब करो तुम लिखकरके शायरी ये शायरी पटल पर सजती यूं हि रहे आँखों की रोशनी तो कमजोर हो रही देता नही दिखाइ जाकर कोइ कहे बेकार की कोइ भी चिंता नही मुझे दिखती नहीं कमाइ केसे कोइ  कहे होकर अधीर बैठा हूँ थक न जाऊँ मैं रचना कई बनायी  हम खुश बहुत हुए मन की मुराद लेकर आया हूँ तेरे द्वार करना न जग हँसाइ रंजन यही कहे  आज की बेटियाँ 🌺🌺🌺🌺🌺 घर की जिम्मेदारी अब रखके अपनें कंधे पे सबके विश्वास को जगानें लगी बेटियाँ करके पढ़ाइ अब नौकरी में चारो तरफ देश और विदेश में भी जानें लगी बेटियाँ टेक्निकल के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान बस और टेक्सी चलानें लगी बेटियाँ राजनीति कूटनीति सारे संविधान जान जनता को देश की जगानें लगी बेटियाँ आइएस में टाप कर बनी बड़ी अफसर नीयम कानून समझाने लगी बेटियाँ घर से लेके बाहर की दुनियाँ जहान में अब नारियों के नाम को सजानें लगी बेटियाँ 🌺🌺🌺🌺🌺🌺 आलोक रंजन इन्दौर  मेरे महबूब ४१ 🌺🌺🌺🌺 आज तनहाइ में कुछ अश्क बहाया मैंने...

ग़ज़ल अपनें चेहरे के दाग़ तुम न दिखा पाओगे

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अपनें चेहरे के दाग़ तुम न दिखा पाओगे सामनें  आनें  में  यारा बहुत  शरमाओगे अपनी बातें जो बताते हि नही तुम हमको आइना  सामनें  होगा  तो छुपा  पाओगे इश्क के आग़ में जब जलके देख लोगे तो आखिरी बार तो मुझसे हि दिल लगाओगे पूछ लेंगी तेरी सखियाँ जो उदासी सबब थोड़ा  शरमाकेन मेरा नाम तो  बताओगे दर्द कब तक कोइ रक्खेगा छुपाकर दिल में तुम किसी रोज़ हाले दिल को सुना जाओगे ये ग़ज़ल आपकी गाना मैं चाहता रंजन क्या मुझे गाके बस इक बार तुम सुनाओगे आलोक रंजन इन्दौरी

प्यार का कैसा सलीक़ा सिखा गया कोई

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प्यार का कैसा सलीक़ा सिखा गया कोइ ढूँढनें जायें कहाँ मेरा दिल चुरा गया कोइ अब कहीं चैन न मिलता है ना करार कोइ कैसा  ये रोग वो  मुझको लगा गया कोइ छुपाके रक्खा था बेदाग़ हमारा  ये  दिल आज इस दिल का हि परदा उठा गया कोइ जहाँ में तेरे  सिवा  और  ना कोइ  मेरा बात लिखकरके हाथ में थमा गया कोइ ये कंवारे थे  मेरे हाथ  खाली खाली  से अपनें हि नाम की मेंहदी रचा गया कोइ मेरी बेताबी अब हद से भी गुज़र जायेगी शहर इन्दौर का  रंजन बता गया  कोइ आलोक रंजन इन्दौरी

ग़ज़ल बस एक लफ़्ज महज़ उसको सुनानें के लिये । न जानें कितनें खत लिखे हम जमानें के लिये ।।

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ग़ज़ल 🌺🌺 बस एक लफ़्ज महज़ उसको सुनानें के लिये न जानें कितनें खत लिखे हम जमाने के लिये वो एक खुश्बू है आती है बिखर  जाती है रात को रोज हि आती है सतानें  के लिये मेरी  मुहब्बत  हवाओं  को  संदेशे   देकर कहती रहती है उसे पास में आनें के लिये न कोइ रिश्ता न परिचय न बोलचाल कोइ कौन आया है मेरे घर को जलानें के  लिये मैं ग़म को पीनें की आदत को जगा लेता  हूँ क्या पता खुद हि वो कह दे पी जानें के लिये कहाँ कहाँ न ढूढते हैं सच्चाइ की मिशाल हमारी आदतें हैं  सबको जगानें  के   लिये 🌺🌺🌺🌺 आलोक रंजन

ग़ज़ल मैं कभी ग़मज़दा नही होता तू अगर बेवफा नही होता,,,,,

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हाले ग़म 🌺🌺🌺 मैं कभी ग़म ज़दा नही होता तू अगर बेवफ़ा नही होता ज़िदगी तेरा क्या यकीन करें काश मुझसे दग़ा नही होता रोज़ दुनियाँ यहाँ  बदलती है रोज़ कोइ सग़ा नही होता सच को अपनी जुबाँ पे रखते हैं उनको रिश्ते बदा नही होता आजकल वो छुपे से रहते हैं घर पे उनके पता नही होता उनकी यादें हमें सतानें लगी वरना ये रतजगा नही होता रूठ कर बैठे हो बोलो रंजन ये कोइ  क़ायदा  नही   होता 🌺🌺🌺🌺🌺 आलोक रंजन इन्दौरी

हम तुम्हारें है कैसे ये साबित करें

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मेरे महहूब ४० 🌺🌺🌺🌺🌺 हम तुम्हारे हैं कैसे ये साबित करें चीरकर दिल तुम्हें अब दिखायेंगे हम आजतक जो तुम्हें यादकरके जिये लिखके अब काग़ज़ों पर बतायेंगे हम दर्द हमनें सहे रात दिन एक कर अपनी तनहाइयों को सजायेगें हम साज़ संगीत में इश्क़ की शायरी सामनें एक महफिल लगायेंगे हम तेरी बदनाम करनें की शाज़िश मुझे झूठ से सारे परदे हटायेंगे  हम दिल का है मामला ग़म मिलेगा सही इस मुसीबत से अब दूर जायेंगे हम एक रंजन नही है बहुत लोग हैं साथ सबके दिलों को मिलायोंगे हम 🌺🌺🌺🌺 आलोक रंजन इन्दौर

हमारी शान है हिन्दी हमारी जान है हिन्दी आलोक रंजन शास्त्री इन्दौर

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हिन्दी ग़जल 🌺🌺🌺🌺 हमारी शान है हिन्दी हमारी जान है हिन्दी मेरा ईमान है हिन्दी मेरी पहचान है हिन्दी चमन में फूल सब इसके वतन में हर तरफ फैले सुभग नव गान है हिन्दी हमारी शान है हिन्दी बहारों से कहो सज़दे में इसके कुछ करें आकर सुधा रसपान है हिन्दी सुरीली गान है हिन्दी नमन इसको करूँ दिल से ये मेरी माँ भी है हिन्दी  सरल आयाम है हिन्दी कोइ वरदान है हिन्दी करें हम आरती इसकी ये वाणी है सदा मेरी बहुत आसान है हिन्दी कड़ी ब्यायाम है मेरी इसी की गोंद मे हम सब सदा खेले हैं खाये हैं मेरा सम्मान है हिन्दी मेरा अभिमान है हिन्दी न रंजन ग़म हमें अगरेजियत लगती  नही अच्छी  हमारे   नाम  है हिंदी  हमारे  धाम है  हिंदी 🌺🌺🌺🌺 आलोक रंजन इन्दौर

हिंदी सम्मान के प्रति समर्पित लेख आदरणीय डा कीर्तिवर्धन

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सम्पूर्ण विश्व के विद्वानों ने कालान्तर से ही हिंदी के महत्त्व और महत्ता को स्वीकारा है। यह हमारी विडम्बना ही कही जायेगी कि सम्पूर्ण विश्व में भारत की राष्ट्र भाषा के रूप में हिंदी का ही नाम लिया जाता है मगर अपने ही देश में आज़ादी के 68 वर्ष बाद भी हिंदी राज-भाषा के पद पर ही स्थित है। आज अमेरिका के राष्ट्रपति श्री बराक-ओबामा अपने देश में हिंदी के विकास के लिए साढ़े पाँच करोड़ अमेरिकी डॉलर का प्रावधान करते हैं तो वह हिंदी व हिन्दुस्तानियों के महत्त्व व सामर्थ्य को समझते हैं।  आज़ादी के आंदोलन में पूर्व से पच्छिम व उत्तर से दक्षिण सभी आंदोलनकारियों एवं नेताओं ने हिंदी के महत्त्व स्वीकारा था। हिंदी आज़ादी प्रमुख की भाषा बनी। विडम्बना ही कही जायेगी कि चंद स्वार्थी अंग्रेजी दा नेताओं के चलते राष्ट्र भाषा नहीं बन सकी। भारत में अंग्रेजी के पक्षधर, विकास का मापदंड अंग्रेजी, विज्ञान का आधार अंग्रेजी, नौकरी के लिए अंग्रेजी का गुणगान करने वाले मैकाले के मानस पुत्र कुछ काले भारतीय जिनकी संख्या कुल 3-4 % होगी, से पूछना चाहता हूँ कि किस आधार पर अंग्रेजी का गुणगान करते हैं ? आज भी सम्...

माँ तुम मत घबराना प्रेमलता मिश्रा आगरा उ प्र

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माँ तुम ना घबराओ 🌺🌺🌺🌺🌺🌺 रो रो के अपने ग़म को बढ़ाओ न मेरी माँ जो बीत गया उसको भुलाओ न मेरी माँ दुनियाँ की रीत है ये जो मिलता बिछड़ता है इंशान जिसके  वास्ते रोता  सिसकता  है यादों में उनकें खुद को सताओ न मेरी माँ रो रो के अपने,,,,,,,, कुछ पल का साथ मिलता है सबको यही है सच किरदार निभानें के लिये  जीव है  परबस आये थे  अकेला समझ जाओ न मेरी माँ रो रो के,,,,, अब अपनी हिफाजत  का ध्यान रखना जरूरी सेहत हि करता है सभी आशाओं को पूरी हम सब तुम्हारे साथ घबराओ न मेरी मेरी माँ रो रो के,,,,,,, भगवान के दरबार में सबका हि है खाता जल्दी कोइ जाता तो कोइ देर से जाता इस सच को अपनें दिल में बिठाओ न मेरी माँ रो रो के अपनें,,,,,, 🌺🌺🌺🌺🌺 प्रेम लता मिश्रा आगरा

मेरे महबूब 23

मेरे महबूब २३ 🌺🌺🌺🌺 लौट आ जाती हैं हर बार दुवायें मेंरी मेरी किस्मत में कितनी हैं खतायें मेरी फँस गये आज हम जानें किस तूफान में जान ले लेंगी इस बार फिजायें  मेरी या खुदा कुछ तो मेरे हाल पे रहम कर दे हर सितम से हि बचा लेंगी सदायें तेरी दिल के हर कोनें में छाइ है बनके सुरूर हर मेरे दर्द की बस वो हि है दवा मेरी दोस्ती करके दग़ाबाज उसनें जाँ ले ली उससे पूछो कि  कोइ गलती बताये मेरी मेरे महबूब का खत आज मिला है देखो पढ़के ये आँख जानें क्यूँ भर आये मेरी 🌺🌺🌺🌺 आलोक रंजन

मेरे महबूब १२

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मेरे महबूब १२ 🌹🌹🌹🌹 ज़िंदगी तेरे ऊसूलों से वाकिफ़ हूँ मैं कितनें वेदर्द ग़मों का भी साजि़श हूँ मैं मौत क्या आयेगी मुझको वो मुझसे डरती है मगर अपनों की शिकायत से आजिज़ हूँ मैं बनके जो मेरे मेरे पास पास रहते हैं मुझे जो अपना बड़ा ख़ाश ख़ाश कहते हैं वक्त आनें पे बदल जाके मुखौटे उनके ऐसे रिश्तों से हि हमतो उदास रहते हैं मैं हूँ अम्बर तु जहाँ जायेगा मिल जाऊँगा तुझे साये की तरहा मैं तो नज़र आऊँगा दिल में रखता हूँ तुझे रब का बास्ता देकर एक दिन तुझको लेके अपने श़हर आऊँगा इश्क में उसनें नज़र से ग़ज़ल बनाया है हूबहू तेरे हि चेहरे को आज़माया है तेरे दीदार को तरसा है बहुत हि शायद दिल के पन्नें पे नाम लिखा डाला है बंद होंठों से उसने हाले दिल कहा मुझसे कितनें दिन दूर आजकल वो रहा मुझसे जानें कबतक  ये कोरोना हमें सतायेगा आज मिलनें गया को दूर हि रहा मुझसे 🌹🌹🌹🌹 आलोक रंजन