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लघुकथा (छींक)

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कहानी  ,,,,,,,,,,, लघु कथा( छींक ) ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, रात में भोजन करके राजेश जल्दी सो तो गया ,पर रात भर नींद नही आइ । कभी कभी खुशियां भी सोने नही देती । सुबह जो बैंक में सरकारी नौकरी पक्की हो गइ  उसका काल लेटर आया है ,परीक्षा में अच्छे  नम्बर आये थे तभी तो काल लेटर आया है । एक अटूट आत्म विस्वास के साथ राजेश का चेहरा खिल सा गया था दिनभर खुशी में सबको बताता रहा रात में मां नें दूध देते हुये कहा बेटा गणेश जी का दर्शन जरूर करके सुबह जाना जल्दी सो जाओ सुबह मै भी चलूंगी साथ मंदिर । ठीक है मां कहते हुये राजेश ने दूध पीया ,और लेट गया ।सुबह जल्दी नहाकर तैयार हुआ मां को साथ लेकर मंदिर में गणेश जी का दर्शन किया,और घर आया । बैग में कुछ शैक्षणिक अंक पत्र और जरूरी कागजात संभालकर रखा । पापा मम्मी का पैर छूकर भगवान को हाथ जोड़कर घर से निकलने लगा देहरी बाहर कदम बढाया हि था कि पड़ोस की दादी दिख गइ। पैर छूकर आशिर्बाद लिया , दादी ने उज्जवल भविष्य की दुहाइ देते प्यार से दुलार करके, शुभकामनायें दी । तभी राजेश को छींक आ गयी ।और एक बार नही तीन तीन बार ,दादी के मन में शंका का भू...

आज़ाद शायरी

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आजाद शायरी 🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺 इबादत का कोइ जतन ढूँढते हैं। वो अपने लिये एक रकम  ढूँढते हैं।।  जो पूछे कोइ बानगीए इबादत। तो हम सबसे पहले वतन ढूँढते हैं।। 🇮🇳🇮🇳 खुदा है रकीबों का किसने कहा है। खुदा के लिये क्या चमन ढूँढते हैं।।  वखत़ पे  मिले काम उससे चला लो। ग़रीबी में  अहले सुखन ढूँढते हैं।।  नबाबी का जलवा हमें ना दिखाओ। हमें इस जहाँ के रतन ढूँढते हैं।।  ज़रा अक्ल से काम लेके भी देखें। हर एक बात पे क्यूँ भरम ढूँढते हैं।।  हुआ इश्क़ परदा हटा दीजिये भी। यहाँ अब न कोइ शरम ढूँढते हैं।।  नही कोइ रंजन मुहब्बत भरा दिल। चलो कोइ दूजा़ हरम ढूँढते हैं।।  🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺 आलोक रंजन शास्त्री इन्दौर

जश्ने आजादी

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मेरा भारत महान 🌺🌺🌺🌺🌺 आजादी मनायें हम इस गुलशन बहार का जो हो गये शहीद सपूतों के प्यार का आजादी,,,,  रण बाँकुरे हँसके जो निछावर किये थे प्रान आजादी की खातिर हि दे दिये थे अपनी जान उन बीर भगत खुदीराम के निशार का आजादी मनायें,,,,,,, नेता सुभाष की लड़ी सेना वो याद है शेखरजी  की वो पार तड़ी देती दाद है बलिदान हो गये उन आजादी सवार का आजादी,,,,,  धरती थी खून से पटी आजाद पहरेदारों से अँग्रेजों की शक्ती घटी तूफाँ के लड़ने वालों से माहौल देश प्रेम का बना वो गजब था सर पे कफन लिये थे वो जूनून अजब था गाँधी के अहिंशा भरे भाषण पुकार का आजादी,,,, 🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺 आलोक रंजन शास्त्री इन्दौर 9425069983

ग़ज़ल

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🌷🌷 वक्त को कौन याद करता है ये तो खुद वक्त पे उभरता है अपने गम पे है हमको नाज यहाँ गम हि ये जिन्दगी बदलता है होश में हमको क्यों लाते हो तुम मेरा दिल अब नही सँभलता है काट खाने को दौड़ती दुनियाँ सूनी राहों पे कौन चलता है नीयतों में भी खोट है उनकी उनका घर बस इसी से चलता है कोइ घर मुझको बता दो यारों नेकियत का दिया भी जलता है वार पे वार करते जाते हो मेरा भी खूँन अब उबलता है देखता हू कि मेरे संग यहाँ जाने किस किस का दिल भी जलता है इंशा कितना भी बेअदब है अब अपनों के दिल पे मूँग दलता है बेमुरव्वत सा है वो शख्स यहाँ घर जलाने की बात करता है खो गये तुम कहाँ बोलो रंजन ये है दुनियाँ यहाँ सब चलता है आलोक रंजन शास्त्री इन्दौर

खुद को हिन्दुस्तान कहूँगा

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खुद को हिन्दुस्तान कहूँगा 🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷,,,,  मैं सरहद पर एक सिपाही बनकर ये ऐलान करूँगा खुद को हिन्दुस्तान कहूँगा।। दुश्मन से लड़नें की खातिर लेकर हाथों में हथियार पत्थर जैसा टिका रहँगा मारूँगा मै शत्रु हजार देश गर्व से खिल जायेगा ऐसा मैं तूफान करूंगा। खुद को हिन्दुस्तान कहूँगा ।। ललकारें भरकर सीनें में मैं दहाड़ता जाउँगा भारत माँता के झंडे को मैं सँवारता जाऊँगा मिट जायेगी हस्ती उसकी मैं ऐसा आह्वान करूँगा। खुद को हिनुस्तान कहूँगा।। आँखें जो दिखलाये हमको जाकर उसको बतला दो अब बाँकुरी निगाहों से क्या बच पायेगा ये कह दो आँख दिखाने वाले सुन लो तेरा घर शमशान करूँगा। खुद को हिन्दुस्तान कहूँगा ।। हाथों, में है आज तिरंगा ये हमको शक्ती देता अपनी मातृभूमि पर मिटनें की हमको भक्ती देता लेकर आजादी का झंडा बस इसका सम्मान करूँगा। खुद को हिन्दुस्तान कहूँगा ।। खुद को हिन्दुस्तान कहूँगा ।। खुद को हिन्दुस्तान कहूँगा ।। 🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷 आलोक रंजन शास्त्री इन्दौर 9425069983

मेरे गोपाल हम तेरी शरण

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मेरे गोपाल मै तेरी शरण 🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷 गोपाल तुम्हारी नजरों का एक बार इशारा हो जाये जीवन की बगिया महक उठे ये ये गुलशन प्यारा हो जाये सुनते हैं तुम्हारी आंखों में करूणा की बूँद बरसती है रोते हुये जीवों को तत्क्षण मुस्कान दिलाया करती है तेरी मूरत दिल में बसती आंखों का तारा हो जाये गोपाल तुम्हारी,,,,,,,, इंशान कहां समझे तेरे संसार बनाने की हिकमत सबको देते रहते हो तुम बिन माँगे तेरी है रहमत हे देवेश्वर गोपी बल्लभ चरणों का सहारा हो जाये गोपाल तुम्हारी,,,,,, साकार तुम्हारी सृष्टी है भव बंधन से छुटने के लिये मोहित होकर विस्मित इंशा जीता रहता लुटने के लिये मझधार फंसी मेरी नइया अबआज किनारा हो जाये 🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷 आलोक रंजन शास्त्री इन्दौर

आ जाओ मेरे मोहन

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मेरे मोहन आ जाओ 🍀🍀🍀🍀🍀🍀 तुम्हारे इश्क में हम हो गये पागल मेरे मोहन नजरों ने दिल को कर दिया घायल मेरे मोहन सुहानी रात ये है चांदनी महका रही समां कैसे करे हम अपने जजबात का वयां वो बंशी धुन दिलों में कर रही हलचल मेरे मोहन तुम्हारे,,,,,,, अजब सा हाल है दिल का करार आये नही देखो कही ऐसा न हो जाये निकल जाये ये दम देखो तुम्हारी याद में हम खो रहे पल पल मोरे मोहन,,,,, तुम्हारे,,,,,,,,,, नशा  छाया है अब कोइ दवा दे दो खुमारी का तेरे हि पास है इस मर्ज  की मारी बिचारी का तुम्हें हि देखते हैं आंख में भर जल मेरे मोहन तुम्हारे,,,,,,,,,, 🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷 आलोक रंजन शास्त्री इन्दौर

आज फिर शाम उनकी याद आइ

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शायरी ,,,,,,,, आज फिर शाम उनकी याद आइ । मै हूं बस और मेरी तनहाइ ।। होठ चुपचाप हो गये खामोश । जाने क्यूं आंख मेरी भर आइ ।। सांस चलने लगी हुआ कुछ यूं। दिल में यादों की रोशनी छायी ।। वक्त कितना बदल भी जाता है । याद उनकी नही बदल पाइ ।। इश्क के दिन भी कितने थे रंगीन। कौन कर सकता इसकी भरपाइ ।। शोख नजरों से देखना उनका । ले लिया दिल ने फिर से अंगड़ाइ ।। देखने की अजब सी थी तरकीब । खिड़कियों से दिये वो दिखलाइ ।। हम भी तनहा कहां हैं उनके वगैर । संग मेरे है उनकी रूशवाइ ।। कौन किसके लिये यहां जीता । जिंदगी ने मुझे ये सिखलाइ ।। हम भी पाबंद हैं अपने दिल के । कोइ आलोक मेरा सौदाइ ।। आलोक त्रिपाठी (सरस) इन्दौर मप्र 9425069983

जन्माष्टमी पर मेरा कान्हा रचना पढें

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मेरा कान्हा ❤️❤️❤️❤️ जिसकी  रसीली दृष्टि सृष्टि में जहां भी देखो सबके हि मन में बसा वो श्याम काला है करता है दृष्टि तो संवर जाती जिन्दगानी सृष्टि का प्रधान मेरा कान्हा मुरलीवाला है कण कण समायी है उसी की शक्ति चहुओर मन में अपार खुशी है वो आने वाला है श्याम रंग सजता मोहक है वो लगता यशोदा का लाल नंद बाबा का दुलारा है मोहनी मूरति प्यारी जगसे है न्यारी देखो गोपियों के हिरदय बसा वो रास वाला है जग को देता है उपदेश वही गीता में कृष्ण चन्द्र नाम है सभी को बड़ा प्यारा है 🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️ 🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀 आलोक रंजन शास्त्री इन्दौर

बहार ढूढते रहे स्वप्न

स्वप्न ✍️✍️✍️✍️🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀 पंछियों को देखा आज कितनी ये मचल रही रंग भरे पंख  लेके आसमां में चल रही मस्तियां मनायें हौशलों की ये उड़ान है आ रही हैं घोसलों में देखो शाम ढल रही पंछियों में चेतना अपार ढूंढते रहे,,,,, वाटिका में,,,,,,,,,,  सत्य की डगर पे ख्वाहिशें है चलता जाऊं मैं सत्य के दिये सदा लिये हि मुस्कराऊ मै़ दुख हो या सुख हो बढूं निडर सा राह में फिर कभी मनुष्यता को अब न भूल पाऊं मैं पथ में रात दिन यही विचार ढूढते रहे वाटिका में,,,,, पाप पुन्य कर्म का हिसाब कौन कर रहा होके मस्त हर कोइ बुराइयों में पल रहा कबसे जिंदगी न जाने ले रही है करवटे वासना की आग में हर एक यहां जल रहा वासना के राग में विराग ढूढके रहे वाटिका में कांट,,,,,,, जंग जिंदगी की होगी सोचता हू अब खतम पालता रहा यही दिलों एक हि बहम बंद आंख करके राह में मै देखता रहा हो गइ थी भोर स्वप्न हो, गये मेरे खतम वादियों, में स्वप्न की कतार ढूढते रहे वाटिका में कांट,,,,,, 🍀🍀🍀🍀🍀🍀✍️✍️✍️✍️ आलोक रंजन शास्त्री इन्दौर

बहार ढूंढ़ते रहे

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बहार ढूढ़ते रहे 🍀🍀🍀🍀 वाटिका में कांट के बहार ढूंढ़ते रहे उम्र बीतती रही हम प्यार ढूंढ़ते रहे जिंदगी कहां कहां तुम्हें जहां में हर जगह चाहतों के अश्व पर सवार ढूंढ़ते रहे हर सुबह उमंग सूर्य मुझको भेजता रहा मैं खड़ा दिशाओं में स्तब्ध देखता रहा भूल भी होती रही कदम बढ़ाऊ ज्योहि मैं हलचलों को दिल में बार बार देखता रहा आरजू के मौज पर अंगार ढू़ंढ़ते रहे वाटिका में,,,,,,,,, लोरियां सुनाके कोइ मुझको सुलाता रहा गम के बेशुमार पल में खुद को भुलाता रहा मर्ज का पता न था दवाइयां तो ली बहुत आग से आग को मै कबसे बुझाता रहा बैठकर किनारे मझढार ढूढ़ते रहे वाटिका मे कांट,,,,,,, रिस्तों की बजार में आवाज कौन सुन रहा किस तरफ मैं जाऊं एक राह आज चुन रहा बंदिशों का दौर है खुलकर न बोल पा रहा दिल की ये तरंग दिल में लेके देखो गुन रहा पत्थरों के सांचे में साकार ढूढते रहे वाटिका में कांटों,,,,,, 🍀🏵️🍀🏵️🍀🏵️🍀🏵️🍀🏵️ आलोक रंजन शास्त्री इन्दौर

निर्गुन गीत

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निर्गुन 🏵️🏵️ हम जिन्दगी की राह यूं  चलते चले गये आदत पे अपनी हाथ हि मलते चले गये सोचा था प्रभू वंदन मन से किया करेगे अवसर जो आये मुझसे निकलते चले गये दुनियां है एक माया दिखता वो सच नही है झूठे दिलास मुझको यूं छलते चले गये तृष्णा की प्यास में हम भटके कहां कहां रस्ते हमारे वास्ते बढ़ते चले गये रंजन ये वासना अब देखो  डुबो रही है ढांचे तुम्हारी उम्र के ढलते चले गये ✍️✍️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️ आलोक रंजन शास्त्री इन्दौर

मेरे श्याम

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मेरे कान्हा 🌹🌹🌹🌹 नजर कर दो मेरे कान्हा मेरा जीवन सुधर जाये तुम्हारी मेहरबानी की कोइ ऐसी लहर आये।। झुका हूं तेरी चौखट पर जरा पलकें उठाओ तो,,,,, जरा पलकें उठाओ तो मेरी झोली कृपा कर दो नइ खुशियों से भर जाये।। ठोकरें बहुत खाया है जमाने में भटक करके जमाने में भटक करके,,,, लगा लो अब शरण तकदीर ये अपनी संवर जाये।। मेरी मजबूरियों को इस जहां ने हंसके टाला है,,,, जहां ने हंस के टाला है तेरे चरणों में आने का प्रभू अब तो असर आये।। सुना है भक्त पर तेरी इनायत बरसती रहती इनायत बरसती रहती,,,,,,  तेरे दर पे पड़ा रंजन हृदय के फूल बरसाये नजर कर दो,,,,,,,, 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 आलोक रंजन शास्त्री इन्दौर 9425069983

पधारे मेरे राम

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पधारे मेरे राम 🌹🌹🌹🌹 आंखों में भर आये आंसू खुशियों से छाया तन मन ।  आज राम की प्यारी नगरी सजी हुइ देखो इस क्षन।। कितनी हुइ प्रतिक्षा इसकी कितनें दुर्गम पल आये भक्तों का बलिदान हुआ था हर आंखों में जल आये संयम धैर्य और करुणा का हमनें साथ न छोड़ा था मंदिर बनने की प्रक्रिया में सोचो कितना रोड़ा था न्याय हमें मिल गया अंत में टूट अदालत का बंधन आंखों में,,,,,,,, राम हमारे मन में बसते इसको कौन नकारेगा भारत का हर जन मस्ती में राम नाम दुहरायेगा ।। आज सनातन धर्म देश दुनियां में संदेशा देगा मर्यादा पुरुषोत्तम की छवि दुनियां को दिखला देगा।। होगे अचल प्रतिष्ठित प्रभु अब विश्व कर सकेगा दर्शन आंखों, में आंसू,,,,,,,, राजनीति की गंदी चालें धर्म प्रदूषित करती हैं वोटों की खातिर दुष्टों को सदा विभूषित करती हैं धर्म भेद करके लोगों को सदा बांटते आये हैं ऐसे नेताओं ने अपने कर्मों का फल पाये हैं राजनीति की दुहरी चालें चल न सकेगी अब रंजन आंखो में,,,,,,,,,, धन्य लोग हैं संकल्पों को पूर्ण आज कर पाये हैं धन्य धरा कोशलपुर नगरीआज राम हरषायें हैं संतों की भक्ती से सारा नगर राममय दिखता है राम नाम उ...