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यही हे भारत देश महान

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जिस धरती का कण कण बोले, राम और घनश्याम यही है भारत देश महान गंगा यमुना की लहरों से, सिंचित जिसका प्राण यही है भारत देश महान रामकृष्ण का गुंजन होता, देवों का अभिनंदन होता पावन धरती  की रज लेकर, सब के माथे चंदन होता वेदर ई चाहे झंकृत होती, करती है गुणगान यही है भारत देश महान आदि सनातन धर्म हमारा, शुभ कर्मों का संचय सारा गौरवशाली संस्कृति अपनी, हमने इस पर तन मन वारा प्रकृति प्रदत्त खजाना अपना, करते अनुसंधान यही है भारत देश महान ब्लू पवन है ध्वजा पताका, फैले हरियाली बनकर पर्वत की चोटी लहरा कर, रहती मतवाली बनकर ऊंचा शिखर हिमालय अपना बना हुआ अभिमान, यही है भारत देश महान आलोक रंजन इंदौरवी

उसनें दिल में मुझे बसाया है

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दिल में उसने मुझे बसाया है जिसको अपनी ग़ज़ल सुनाया है दोस्त ही है मेरा कहां फिर भी फ़र्ज़ अपना नहीं निभाया है आप रिश्तों की बात करते हो मुझको तो हर कोई हमारा है देश दुनियां में कैसी हलचल है किसने हर सक्स को डराया है आप  मेरे  क़रीब आ  जाओ मैंने  हर   दर्द  आजमाया  है रास्ता कोई   भी कहां  देता मैंने   खुद रास्ता   बनाया है गम है किस बात का तुम्हें रंजन दर्द  का  गीत  गुनगुनाया  है आलोक रंजन इंदौरवी

ग़ज़ल बहुत खूबसूरत डगर हो गई

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बड़ी खूबसूरत डगर हो गई मेरे दिल पेउनकी नजर हो गई  मिले हो तो अब लग रहा है मुझे  हमारी मोहब्बत अमर हो गई   हवायें उदासी की चलने लगी  अरे जिंदगी क्यों जहर हो गई  न जाने कहां से हवा आ गई  समझ ही नहीं पाए कहर हो गई  मुहब्बत से देखा जो तुमने मुझे  मुहब्बत मेरी राहबर हो गई  मुझे इश्क का कुछ तजुर्बा नहीं  तेरी याद ही मुख्तसर हो गई इरादे मेरे नेक थे जानें क्यूं फिर ये मेरी दुआ बेअसर हो गई निरुपमा त्रिवेदी इन्दौर मप्र

अपने दिल की बात बताना अच्छा लगता है।

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अपने दिल की बात बताना अच्छा लगता है सपनों में एक ख्वाब सजाना अच्छा लगता है तेरे बारे में जब जब भी मैं लिखता हूं  धड़कन में यादों का आना अच्छा लगता है और नहीं कुछ तुझसे कुछ भी मैं चाहूंगा अपनें गम को और बढ़ाना अच्छा लगता है कैसे कैसे दिन गुजरे हैं तुम बिन भी तुम्हें हसाकर खुद  रो लेना अच्छा लगता है रंजन किसको अपना कहकर प्यार करूं तनहा अपनी धुन में रहना अच्छा लगता है आलोक रंजन इन्दौरवी

आशा की किरण

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आशा की किरण  एक किरण आशा की आई आज फिर बरषों के बाद। रश्मियां सज धज के आई आज फिर बरषों के बाद।। कनक आभूषण से मंडित  चंवर  अम्बर ने  सजाये। नयन  मूंदे  भोर  आई  आज  फिर  बरषों के बाद ।। पत्ते - पत्ते  खिल गये  दिनकर की  छवि में ढल गये। तितलियों की टोली आई  आज फिर बरषों के बाद।। गुङहल ने  ज्यों  अनुबंध  खोले  मस्त ले अंगङाइयां। सूरजमुखी भी मुसकुराई  आज फिर बरषों के बाद।। बादलों के दल सुसज्जित व्योम आच्छादित  कलश। प्रेम  रस  बरसाने  आई  आज  फिर बरषों के बाद।। चादर  लपेटे  चांदनी ज्यों आकाश की  दुल्हन बनी।  रात -रानी खिलखिलाई  आज फिर बरषों के बाद।।  जंगल में मंगल छा गया चूजों  की खुशियाँ  देखकर। चोंच  से  चुग्गा  खिलाई  आज  फिर बरषों के बाद।।  अठखेलियाँ  करती  पवन  सांसों  को  सांसे  दे गई। नूतन  नवल  संदेश  लाई  आज फिर बरषों के बाद।। ...

प्रेम स्पंदन

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एक  प्रेम श्रृंगार  गीत सुनें ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, तुम जब मुझसे मिलने आते खूब जमाना अच्छा था मीठी मीठी बात सुनाते खूब जमाना अच्छा था खट्टी मीठी तकरारें थीं  और मोहब्बत की बातें हम तुम दोनों भीग रहे थे याद आती है बरसातें  बचपन और जवानी का एहसास कभी ना हो पाया तेरे मेरे दिल में कुछ आभास कभी ना हो पाया हम तुमको जब घर पहुंचाते खूब जमाना अच्छा था जब तुम,,,,,,,, पुरवइया की मंद हवाओं का मौसम भी प्यारा था बाग में बैठे-बैठे तुमको कितनी देर निहारा  था जुल्फों के साए में तेरा चेहरा खूब सुहाना था अपनी बात सुनाने का वो तेरा एक बहाना था पीला दुपट्टा तुम लहराते खूब जमाना अच्छा था जब तुम ,,,,,,,,, रोज सुबह तुम छत पर  आकर मुझे बुलाया करते थे अपनी खुशबू से मुझको मदमस्त बनाया करते थे बात इशारों में होती थी कोई समझ नहीं पाता कुछ बातें कॉपी में लिख कर मैं तुमको  खुद दे जाता साथ-साथ विद्यालय जाते खूब जमाना अच्छा था जब तुम,,,,,,, आलोक रंजन इंदौरवी

आनलाइन कवि सम्मेलन

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आलोक रंजन फेसबुक प्रोफाइल पर आज शाम चार बजे कवि सम्मेलन सफल रहा अनेक साहित्यिक रचनाकारों ने कार्यक्रम की सराहना करते हुये पटल पर अपनी मधुर प्रतिक्रिया ब्यक किये। कार्यक्रम का संचालन मेरठ से सु श्री उदिता शर्मा ने शानदार संचालन का कार्यभार संभाला जो बहुत ही मधुर और औचित्य पूर्ण रहा । कार्यक्रम में उदयपुर से आदरणीय प्रमिला शर्मा कानपुर से वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीय गोविंद नारायण शांडिल्य जी इन्दौर मप्र से आलोक रंजन इंदौरवी जी ने काब्य पाठ करके चार चांद लगा दिया।

ग़ज़ल सब्र का बांध तोड़ते क्यूं हो

सब्र का  बांध तोड़ते   क्यूं   हो अपना ही राज खोलते क्यूं हो इस सियासत का फायदा क्या है हर सुबह कड़वा बोलते क्यूं हो *कद्र करना तो सीख लो तुम भी* फ़र्ज़  से मुंह  को मोड़ते क्यूं हो सारी  जनता निराश हैं  तुमसे  फिर भी अब हाथ जोड़ते क्यूं हो हर बुरे  वक्त में  मैं  साथ रहा साथ मेरा  ही छोड़ते  क्यूं हो धीरे चल कर के  ये सफर देखो क्या है जल्दी भी दौड़ते क्यूं हो चाहते हो क्या सीधा सीधा कहो दिल ये रंजन टटोलते क्यूं हो आलोक रंजन इंदौरवी

स्वर्ण प्रभा

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स्वर्ण प्रभा  अंतरनाद  तरंगित करके मन वीणा को सुर मय कर दो। नतमस्तक गुणगान करूं में स्वर्ण प्रभा हरमन में भर दो।। श्रुतियों सी श्रृंगारिक रचना उच्चरण में शुद्धि करण  दो। मनवीणा को झंकृत करके नवरस राग प्रवाहित कर दो।। चुनचुन कर फूलो का मधुरस मृदुल रागिनी स्वर में भरदो। भ्रमरों की गुंजन  गुनगुन कर पीत बसन सी काया भर दो। अभ्यंतर का कलुष मिटा कर प्रेम तरंगित मन में कर दो। कण-कण आह्लादित होगा कलियों का आमंत्रण कर दो। वेदों और श्रुतियों  सा गायन हर्ष और उल्लास  प्रखर दो। हे! करुणामयी करुण स्वरों से मेरे मन की करुणा हर दो। हास्य व्यंग्य को मिश्रण करके छंदबंध मधुमय लय भरदो। ह्रदय वेदना अलंकरण कर हृदयंगम विस्मय भय हर दो।।  उद्दीपन हो हर्षित मन में कण-कण को करुणामय कर दो। हे!रसराज रसों से पुष्पित पुष्प अधर को रसमय कर दो।।                    पुष्प लता राठौर

सरस्वती वंदना

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मधुर मोहक सरस स्वर से हृदय का शृंगार कर दो शारदे मां सद्गुणों का सर्वथा विस्तार कर दो कुटिलता मेरी मिटे हो प्रेम का नवसृजन अब भावमय हर वेदना हो दूर हो निस्तार कर दो मधुर मोहक,,,,,,,, हृदयपट से प्रार्थना का गान मैं करता रहूं सत्य निर्मल मंत्रणा का पान मैं करता रहूं कलुषता हर क्लेश मिट जाये सतत् आये खुशी शब्द रचना कर सकूं मैं ऐसी शक्ति प्रदान कर दो कर्म सात्विक हो मेरे जीवन की अंतिम सांस तक मां विचारों में मेरे करुणा दया का भार भर दो मधुर मोहक,,,,,,,,,, सहज हो पथ संचरण सद आचरण में लिप्यता वरद् हस्तों से भरो मां स्वांस में अब दिब्यता हर कदम सामिप्य हो तेरा जहां भी मैं रहूं वाकपटुता से रहे वाणी में मेरी पूर्णता  धर्म हो आचरण हो अज्ञानता का नाश हो कर कृपा की दृष्टि अपनी सरल सा ब्यवहार कर दो मधुर मोहक,,,,,,,,, आलोक रंजन इंदौरवी

ग़ज़ल

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मैं तुम्हें समझा करूं और तुम मुझे समझा करो छोटी छोटी बात में कोई न अब शिकवा करो जिंदगी के फूल में अनुराग है सौहार्द है साथ में रहकर मेरे तुम भी ज़रा महका करो रोशनी मिलती रहेगी गर दिलों में प्यार है नेक रस्ते पर चलोगे बस यही वादा करो इस चमन का फूल बनकर हम भी मुस्काया करें सांस के हर तार पर प्रभुनाम जप जाया करो चांदनी गुलजार कर देगी तुम्हारी राह को अपनी मंजिल की तरफ चुपचाप बढ़ जाया करो गम कोई आए अगर तो तुम खुशी से झेलना दर्द भी इक है दवा इससे न घबराया करो आसुओं के रूप में जो जल बरसता जा रहा तुम नही रंजन कभी औरों को बतलाया करो आलोक रंजन इंदौरी

ग़ज़ल

दोस्ती  के  दायरे में   नफरतों  की  बू  न  हो ये दुवा करना किसी की आंख में आंसू न हो जिंदगी के हर कदम पर प्यार ही कायम रहे इक मुहब्बत के सिवा बस कोई आरजू ना हो आशिकी करने की जुर्रत करना भी बेकार है गर तुम्हारे दिल  में कोई हुस्न की खुश्बू ना हो कौन इज्जत दे सकेगा तुमको अपने दिल में अब जब तुम्हारी सोच में उसकी ही आबरू ना हो जिंदगी जब खिलखिला हट मुस्कुराहट छीन ले और भी बढ़ जाता गम जब दोस्त का पहलू हो आलोक रंजन इंदौरी

ग़ज़ल

दोस्ती  के  दायरे में   नफरतों  की  बू  न  हो ये दुवा करना किसी की आंख में आंसू न हो जिंदगी के हर कदम पर प्यार ही कायम रहे इक मुहब्बत के सिवा बस कोई आरजू ना हो आशिकी करने की जुर्रत करना भी बेकार है गर तुम्हारे दिल  में कोई हुस्न की खुश्बू ना हो कौन इज्जत दे सकेगा तुमको अपने दिल में अब जब तुम्हारी सोच में उसकी ही आबरू ना हो जिंदगी जब खिलखिला हट मुस्कुराहट छीन ले और भी बढ़ जाता गम जब दोस्त का पहलू हो आलोक रंजन इंदौरी

गीत

 एक अनूठी राग बनकर जिंदगी में छा गई मैं खुशी  से झूमता हूं गीत ऐसा गा गई मैं बहुत मजबूर था तन्हाइयों के साथ में वक्त का था मैं सताया कुछ नहीं था हाथ में रात दिन सुनसान राहों पर सफर करता रहा बेगुनाही की सजा पर आह भी भरता रहा एक खुशबू की तरह वह मुझको भी महका  गई मैं खुशी में,,,,,, जिंदगी के रूप कितने जान पाया भी नहीं कोई सिर पर हाथ रख कर के बताया भी नहीं मैं अकेला ही लड़ा लहरों की लंबी जंग को हाथ मेरा पकड़ने को कोई आया भी नहीं एक जिज्ञासा हमारे भाग्य को चमका गई मैं खुशी में,,,,, सत्य संकल्पों का दीपक हाथ में मेरे रहा दृढ़ प्रतिज्ञा का पिटारा साथ में मेरे रहा मंजिलों तक पहुंचने का ही जुनून छाया रहा कर्म पथ का आकलन भी पास में मेरे रहा मेरी किस्मत मेंहनतों के रंग से नहला गई मैं खुशी में,,,,, आलोक रंजन इंदौरी

वक्त का सिलसिला गीत

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दीप जलता रहा रोशनी के लिए पर हवाएं बुझाने की कोशिश में थी वक्त का सिलसिला यूं ही चलता रहा आंधियां घर जलाने की कोशिश मे थी वक्त का सिलसिला,,, मैं अकेला कदम साध कर चल दिया मंजिलों की तरफ मेरा संकल्प था राह में कितनी ठोकर मिली गम नही इतना कमजोर मेरा भी वो तप न था तेज काली घटाएं घिरी थी बहुत वो तो मुझ को डराने की कोशिश में थी वक्त का सिलसिला,,,, आजमाइश मेरी एक चाहत रही मेरे दिल में बसी उसकी तस्वीर है मेरे ख्वाबों की रानी मेरी दिल्लगी बस वही मेरे सपनों की जागीर है इश्क में जो कदम मेरे बढ़ते रहे वो भी दिल से लगाने की कोशिश में थी वक्त का सिलसिला,,, मुझको मेरी मुकद्दर ने धोखा दिया हार मानी न मैंने कभी राह में बनके खुशबू मुझे ऐसे वो मिल गई एक दिन आ गई थी मेरी बांह में मैं महकता रहा और हंसता रहा सारी दुनिया रुलाने की कोशिश में थी वक्त का सिलसिला,,, आलोक रंजन इंदौरी

ग़ज़ल इशारों में कह कर बता दीजिएगा

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गजल ------- इशारों में कह कर बता दीजिएगा यही एक मुझको सज़ा दीजिएगा अगर चाहते हैं मुझे आप दिल से नइ  कोइ तोहमत लगा दीजिएगा जो वह पूछते आये गा नाम मेरा पता मेरा उसको बता दीजिएगा मैं अब सो रहा हूं ग़मों के वतन में कभी आके मुझको जगा दीजिएगा मैं समझूं ये जिंदा है मेरी मुहब्बत गले आप मुझको लगा लीजिएगा आलोक रंजन इंदौरी

जमाना एक दरिंदा है

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ग़ज़ल जमाना एक दरिंदा है गरीबों को सताता है कोई आंसू छुपाता है कोई आंसू बहाता है नहीं कोई किसी का है यहां पर सब पराए हैं सभी झूठे यहां रिश्ते भले कोई जताता है नहीं है खौफ कोई भी यहां मनमानियां होती कोई कानून का डर भी नहीं उनको डराता है यहां मजबूरियां देखो बहुत छाई उदासी है कोरोना काल बन करके किसी को छीन  जाता है सितम इतना कि अब बर्दाश्त के बाहर हुआ जाता न रोजी रोटी है जिंदा न कोई काम आता है आलोक रंजन इंदौरी

मेरे हाथों से लिखे खत को जला देना तुम

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मेरे हाथों से लिखे खत को जला देना तुम इस तरह दिल से मेरी याद भुला देना तुम जिसको तुम चाहो  हक तेरा है मेरा क्या है मैंने जो सम्मा जलाया था बुझा देना तुम मेरे गम  मुझको  कहां  चैन से  सोनें देंगे हो सके तो  मुझे रातों को  सुला देना तुम अब तो  ये जिंदगी  तन्हा गुजार लूंगा  मैं याद  आकर न मेरा  दिल दुखा देना तुम साथ में गुजरे हुए लम्हां जो कोई पूछे तो एक  रंजन  है मेरा  यार  बता  देना  तुम आलोक रंजन इंदौरी

तेरा इंतजार है

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हर लम्हा तेरा मुझको अब इन्तज़ार है तुम बस गए हो दिल में मुझे तुमसे प्यार है तनहाइयां मुझे अब सोने नहीं देती तकती हैं जिसको आंखें जाने बहार है बेचैन सा रहता हूं देखो न हर घड़ी दिल पर कहां मुझे अब इख्तियार है नासाज़ दिल कि दास्तां किसको सुनाऊं मैं तुम खुद बता दो यार ये दिल बेकरार है इस मेरी दिल्लगी की हक़ीक़त तो जान लो जीता हूं बस तेरे लिए तेरा इंतज़ार है रंजन की आशकी को ज़माना भी जानता रोते को हंसानें की हुनर मुझमें यार है आलोक रंजन इंदौरी

मुक्तक

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किनारे पर खड़े होकर नहीं तुझको मिलेगा कुछ कदम आगे बढ़ाएगा तभी हासिल करेगा कुछ नजर के सामने देखो यह दुनिया भागती कितनी सभी के साथ तुम होलो नहीं मुश्किल यहां है कुछ मेरी दीवानगी को तुम कहां पूरा समझते हो मेरे खत में लिखी बातें अधूरा समझते हो झटक कर जुल्फ तुम अपनी मेरा दिल तोड़ देते हो मुझे लगता है अपनी जुल्फ का जूडा़ समझते हो आलोक रंजन इंदौरी